आज जब भारतीय तेजी से संपत्ति बना रहे हैं और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित करना चाहते हैं. ऐसे वक्त में एक बेहद जरूरी वित्तीय विषय पर परिवारों में कम चर्चा होती है, वह है वसीयत (Will) बनाना. ज्यादातर लोग इसकी अहमियत समझते हैं लेकिन इसके बावजूद बहुत कम लोग वसीयत बनवाते हैं.
हाल ही में मुंबई में आयोजित इंडिया टुडे स्मार्ट मनी फाइनेंशियल समिट में 'बिना वसीयत के आपकी संपत्ति का क्या होगा?' विषय पर हुई चर्चा में विशेषज्ञों ने कहा कि वसीयत सिर्फ अमीर लोगों के लिए नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए जरूरी है जिसके पास कोई संपत्ति है या जिस पर परिवार की जिम्मेदारी है.
वसीयत यह सुनिश्चित करता है कि किसी व्यक्ति की संपत्ति उसकी इच्छा के आधार पर बिना कानूनी परेशानियों के सही लोगों तक पहुंचे.
वसीयत बनाने की लागत बहुत कम होती है लेकिन वसीयत न बनाने की कीमत बहुत भारी पड़ सकती है. विलजिनी सक्सेशन सर्विसेज के संस्थापक और सीईओ जतिन पोपट ने कहा, "एक व्यक्ति के पास 29 से ज्यादा तरह की संपत्तियां हो सकती हैं. अगर वह वसीयत नहीं बनाता है तो परिवार को कई बार उसकी संपत्ति ढूंढ़ने के लिए भटकना पड़ता है."
सरकारी और वित्तीय संस्थानों में करीब 3 लाख करोड़ रुपए की ऐसी संपत्ति पड़ी है जिस पर किसी ने दावा नहीं किया. इसकी वजह यह है कि परिवारों को पता ही नहीं होता कि संपत्ति कहां है या फिर उनके पास जरूरी दस्तावेज नहीं होते. पोपट ने कहा, "भारत सरकार के सिस्टम में करीब 3 लाख करोड़ रुपए की बिना दावे वाली संपत्ति पड़ी है क्योंकि लोगों ने अपने परिवार को यह नहीं बताया कि उनकी संपत्ति कहां है."
यह सिर्फ अमीरों और बुजुर्गों के लिए नहीं, बल्कि आमलोगों के लिए है
वसीयत का मतलब सिर्फ मृत्यु के बाद की व्यवस्था नहीं है. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आपकी इच्छा का सम्मान हो और आपका परिवार सुरक्षित रहे. सबसे बड़ी गलतफहमी यही है कि वसीयत केवल बुजुर्गों या बहुत अमीर लोगों के लिए होती है.
विशेषज्ञों का कहना है कि जिस किसी के पास वित्तीय संपत्ति, घर, निवेश, बीमा पॉलिसी या परिवार की जिम्मेदारी है, उसे वसीयत बनानी चाहिए. आजकल युवा भी कम उम्र में घर खरीद रहे हैं. म्यूचुअल फंड में निवेश कर रहे हैं, डीमैट खाते खोल रहे हैं और डिजिटल संपत्तियां जमा कर रहे हैं लेकिन इसके बावजूद उत्तराधिकार की योजना नहीं बनाते.
कोविड-19 महामारी ने कई परिवारों को यह एहसास कराया कि अचानक मृत्यु और जरूरी दस्तावेजों की कमी कितनी बड़ी परेशानी पैदा कर सकती है. लीगालॉजिक कंसल्टिंग के सह-संस्थापक विवेक साधले ने कहा, "उम्र मायने नहीं रखती. अगर आपके पास संपत्ति है और जिम्मेदारियां हैं तो वसीयत जरूरी है."
बदलते समय की नई वास्तविकता
भारत का सामाजिक ढांचा तेजी से बदल रहा है. अंतरधार्मिक विवाह, विदेशों में रहने वाले परिवार, लिव-इन रिश्ते, LGBTQ+ पार्टनर, तलाकशुदा या अलग रह रहे पति-पत्नी और दिव्यांग बच्चों वाले परिवार जैसी परिस्थितियों ने उत्तराधिकार को पहले से ज्यादा जटिल बना दिया है. ऐसे मामलों में सही तरीके से बनाई गई वसीयत या ट्रस्ट विवाद की संभावना को काफी कम कर सकता है.
विशेषज्ञों ने बताया कि यदि वसीयत नहीं होती तो संपत्ति का बंटवारा उत्तराधिकार कानूनों के अनुसार होता है लेकिन यह जरूरी नहीं कि वह व्यक्ति की इच्छा या उसके परिवार की परिस्थितियों के अनुसार हो. इनहेरिटेंस नीड्स सर्विसेज के संस्थापक रजत दत्ता ने कहा, "अगर आपने अपने परिवार के लिए संपत्ति बनाई है, तो उसके लिए उत्तराधिकार की योजना भी बनाइए." उन्होंने यह भी कहा कि वसीयत जैसे कानूनी दस्तावेज न बनाने की कीमत बहुत भारी पड़ सकती है.
महिलाओं को भी देनी चाहिए प्राथमिकता
चर्चा में महिलाओं के लिए वसीयत की अहमियत पर भी जोर दिया गया. भारत में कई परिवारों में पति-पत्नी संयुक्त रूप से संपत्ति रखते हैं लेकिन अक्सर महिलाओं को परिवार के निवेश, बीमा, संपत्ति के दस्तावेज या अन्य वित्तीय जानकारी पूरी तरह नहीं होती. पति की मृत्यु के बाद यह स्थिति गंभीर आर्थिक परेशानी पैदा कर सकती है.
विशेषज्ञों ने कहा कि वसीयत महिलाओं के लिए आर्थिक रूप से सशक्त बनने का भी एक महत्वपूर्ण माध्यम है. इससे वे यह तय कर सकती हैं कि उनकी संपत्ति उनकी इच्छा के अनुसार किसे मिले. रजत दत्ता ने बताया कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के तहत अगर किसी निःसंतान विधवा की मृत्यु हो जाती है, तो उसके माता-पिता से विरासत में मिली संपत्ति को छोड़कर बाकी संपत्ति उसके मायके वालों की बजाय पति के वारिसों को मिलती है.
विशेषज्ञों ने इस कार्यक्रम में सबसे बड़ा मैसेज यही दिया कि वसीयत बनाने में देरी करना महंगा साबित हो सकता है. उन्होंने सलाह दी कि सबसे पहले अपनी सभी संपत्तियों- बैंक खाते, निवेश, बीमा पॉलिसियां, अचल संपत्ति, डिजिटल संपत्तियां और क्रिप्टोकरेंसी की पूरी सूची तैयार करें. इसके बाद वसीयत बनाना काफी आसान हो जाता है.
विवेक साधले ने कहा, "सबसे ज्यादा समय वसीयत लिखने में नहीं बल्कि अपनी सभी संपत्तियों की सूची तैयार करने में लगता है." उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा, "टालमटोल करना बहुत महंगा साबित हो सकता है." अनुमान है कि अगले दस वर्षों में भारत में करीब 100 लाख करोड़ रुपए की संपत्ति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होगी. ऐसे में उत्तराधिकार की योजना देश के सबसे महत्वपूर्ण वित्तीय विषयों में से एक बनने जा रही है. संपत्ति बनाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि वह सही समय पर सही लोगों तक बिना विवाद के पहुंचे.
कुछ महत्वपूर्ण बातें :
वसीयत सिर्फ अमीरों या बुजुर्गों के लिए नहीं है: जिस किसी के पास संपत्ति, परिवार की जिम्मेदारी या आश्रित हैं, उसे वसीयत बनानी चाहिए. संपत्ति बनते ही उत्तराधिकार की योजना भी शुरू कर देनी चाहिए.
वसीयत न होने पर कानून से संपत्ति तय होता है: अगर कोई व्यक्ति बिना वसीयत के मरता है तो उसकी संपत्ति का बंटवारा कानून के अनुसार होता है, जो जरूरी नहीं कि उसकी इच्छा के अनुरूप हो.
बदलते पारिवारिक ढांचे के कारण वसीयत पहले से कहीं अधिक जरूरी: अंतरधार्मिक विवाह, विदेशों में रहने वाले परिवार, लिव-इन रिश्ते, LGBTQ+ जोड़े, मिश्रित परिवार और विशेष जरूरतों वाले बच्चों की वजह से उत्तराधिकार की योजना अधिक महत्वपूर्ण हो गई है.
महिलाओं को भी उत्तराधिकार की योजना में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए: पति-पत्नी दोनों की अलग-अलग वसीयत होने से आर्थिक सुरक्षा और स्पष्टता बढ़ती है.
वसीयत परिवार की संपत्ति को सुरक्षित रखने का सबसे प्रभावी माध्यम: उत्तराधिकार की योजना सिर्फ संपत्ति बांटने के लिए नहीं, बल्कि विवाद रोकने, लाभार्थियों की सुरक्षा करने और संपत्ति का सुचारु हस्तांतरण सुनिश्चित करने के लिए भी जरूरी है.

