27 जनवरी 2026 को भारत और यूरोपीय संघ (EU) ने मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की बातचीत पूरी कर इसकी घोषणा की. इसका सबसे ज्यादा फायदा भारत के कपड़ा (टेक्सटाइल) उद्योग को होने की संभावना है. खासकर तब, जब यह सेक्टर अमेरिका के बढ़े हुए आयात शुल्क से परेशान है.
इस समझौते के तहत भारतीय कपड़ा, गारमेंट्स, फैशन एसेसरीज और फुटवियर जैसे उत्पादों को EU बाजार में ज्यादातर मामलों में शून्य ड्यूटी (बिना आयात शुल्क) एंट्री मिलेगी. अभी भारतीय कपड़ा निर्यातकों को EU में 10-12 फीसद तक ड्यूटी देनी पड़ती है.
EU भारतीय कपड़ों के निर्यात के लिए अमेरिका के बाद दूसरा सबसे बड़ा बाजार है. इस सेक्टर के कुल निर्यात रेवेन्यू में EU का करीब 20-22 फीसद हिस्सा आता है. 2024 में EU ने पूरी दुनिया से 263.5 अरब डॉलर (करीब 23.8 लाख करोड़ रुपये) मूल्य के वस्त्र एवं परिधान आयात किए.
इससे साफ है कि भारतीय टेक्सटाइल कंपनियों के लिए EU एक बहुत बड़ा बाजार है. भारत दुनिया के अलग-अलग देशों में हर साल करीब 3.19 लाख करोड़ रुपये (35.3 अरब डॉलर) मूल्य का कपड़ा निर्यात करता है. इसमें से भारतीय कंपनियां EU को सालाना करीब 62,700 करोड़ रुपये (6.9 अरब डॉलर) मूल्य के कपड़ों का निर्यात करती हैं.
भारत-EU मुक्त व्यापार समझौता भारतीय निर्यातकों के लिए 27 देशों का विशाल बाजार खोलेगा. साथ ही, टेक्सटाइल निर्यात में बांग्लादेश (जो अभी भारत का सबसे बड़ा प्रतिस्पर्धी है) के साथ समान अवसर मिलेगा क्योंकि अब भारत को भी इन देशों में जीरो ड्यूटी एक्सेस मिलेगा.
बांग्लादेश को अभी अल्प विकसित देश (LDC) का दर्जा प्राप्त है. इसके कारण यहां बनने वाले लगभग सभी प्रोडक्ट को EU में बिना कोई टैक्स चुकाए एंट्री मिल जाती है. जबकि FTA के पहले तक भारतीय कपड़ा निर्यातकों को उसी सामान को यहां बेचने के लिए 10 से 12 फीसद टैरिफ देना होता था. इससे EU के बाजार में भारतीय कपड़ा महंगा हो जाता था और बांग्लादेश के कपड़ों का मुकाबला करना मुश्किल हो जाता था.
फेडरेशन ऑफ इंडियन माइक्रो एंड स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज (FISME) के पूर्व अध्यक्ष अनिमेष सक्सेना कहते हैं, "अब EU देशों में बांग्लादेश की तरह भारतीय कपड़ा निर्यातकों को भी शून्य शुल्क देना होगा, जिससे यहां कपड़ा क्षेत्र को तत्काल बढ़ावा मिलेगा और इससे देश में महत्वपूर्ण व्यापार आने की संभावना है."
सक्सेना ने आगे कहा, “भारतीय टेक्सटाइल निर्यातक जापान के साथ हुए मुक्त व्यापार समझौते का लाभ नहीं उठा सके क्योंकि वहां उनकी मजबूत उपस्थिति नहीं थी. जापान के विपरीत भारतीय खिलाड़ियों की यूरोपीय संघ में पहले से ही मजबूत पकड़ है और इसलिए, इस क्षेत्र में उनके पास एक स्थापित ग्राहक आधार होने के कारण उन्हें शुरुआती बढ़त मिलने की संभावना है.”
EU को भारत के वस्त्र निर्यात में रेडीमेड कपड़ों का दबदबा है, जो कुल निर्यात का लगभग 60 फीसद है. इसके बाद सूती वस्त्र (17 फीसद) और मानव निर्मित रेशे से बने वस्त्र (12 फीसद) आते हैं. अन्य श्रेणियों में हस्तशिल्प (4 फीसद), कालीन (4 फीसद), जूट उत्पाद (1.5 फीसद), ऊनी उत्पाद (0.6 फीसद), हथकरघा (0.6 फीसद) और रेशमी उत्पाद (0.2 फीसद) शामिल हैं.
भारतीय वस्त्र उद्योग परिसंघ (CITI) की महासचिव चंद्रिमा चटर्जी का कहना है कि गैर-टैरिफ संबंधी शर्तें अभी जारी नहीं की गई हैं और इनसे यह तय होगा कि आयात पर कोई अतिरिक्त शर्तें लागू होंगी या नहीं. हालांकि, उनका यह भी कहना है कि भारत पहले से ही वैश्विक मानकों के अनुरूप चल रहा है. देश ने हाल ही में अपनी कार्बन क्रेडिट नीति को मंजूरी दी है, श्रम मानकों को तय किया है. इसके अलावा, भारत कपड़ा एवं घरेलू वस्त्रों के लिए नए अनिवार्य लेबलिंग नियमों को लागू करने जा रहा है, जिसके तहत निर्माताओं को फाइबर की मात्रा, उत्पत्ति स्थान और देखभाल संबंधी जानकारी आसानी से मिल सकेगा.
CITI के अध्यक्ष अश्विन चंद्रन ने आगाह किया है कि भारतीय निर्यातकों को यूरोपीय संघ के मुक्त व्यापार समझौते (FTA) का पूरा लाभ उठाने के लिए लगातार और सख्त प्रयास करने की जरूरत होगी. उन्होंने कहा, "इससे हमारे निर्यातकों को मूल्य श्रृंखला में आगे बढ़ने और बेहतर राजस्व प्राप्ति में मदद मिलेगी." उन्होंने यह भी कहा कि हालांकि FTA नए अवसर खोलते हैं, लेकिन वे व्यक्तिगत कंपनियों के लिए अधिक व्यवसाय की गारंटी नहीं देते.
पिछले साल दिसंबर में भारत ने ओमान के साथ व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (CEPA) पर हस्ताक्षर किए और न्यूजीलैंड के साथ मुक्त व्यापार समझौता वार्ता को अंतिम रूप दिया. जुलाई में भारत ने यूनाइटेड किंगडम के साथ व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. इस तरह भारत लगातार पिछले कुछ महीनों में एक के बाद एक व्यपार समझौते कर अपने पड़ोसियों पर बढ़त हासिल करने की कोशिश कर रहा है.

