scorecardresearch

धार्मिक कार्यक्रमों में हाथियों की मौजूदगी क्यों है खतरनाक! इससे कैसे बचा जा सकता है?

अहमदाबाद में रथ यात्रा के दौरान हजारों लोगों की भीड़ में तीन हाथियों का उत्पात मचाना धार्मिक जुलूसों में हाथियों के इस्तेमाल के खतरों को उजागर करता है

जगन्नाथ यात्रा में हाथी हुआ बेकाबू
जगन्नाथ यात्रा में हाथी हुआ बेकाबू
अपडेटेड 2 जुलाई , 2025

अहमदाबाद की जगन्नाथ रथ यात्रा में हर साल करीब 15 लाख श्रृद्धालु शामिल होते हैं. इस साल 27 जून को जगन्नाथ रथ यात्रा के दौरान उस समय अफरा-तफरी मच गई, जब जुलूस में शामिल तीन हाथी बेकाबू हो गए.

अहमदाबाद के खड़िया इलाके में तेज संगीत और सीटी बजने की वजह से 14 साल का एक नर हाथी बैरिकेड तोड़कर संकरी गली में घुस गया, उसके साथ दो घबराई हुई मादा हाथी भी भीड़ के बीच से गली की ओर भागने लगीं.

वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि हाथी पर सवार महावत इन्हें नियंत्रित करने के लिए संघर्ष कर रहे थे. तीन में से एक हाथी भीड़ के बीच से होकर भागा, जिसे अपनी ओर आते देख जुलूस में शामिल होने आए लोग इधर-उधर भागने लगे.

पुलिस, चिड़ियाघर के अधिकारी और वन कर्मचारियों ने तुरंत कार्रवाई की. 15 मिनट के भीतर नर हाथी को शांत कर दिया और मादा हाथियों को वहां से भगा दिया गया.

भले ही इस घटना में कोई हताहत नहीं हुआ, लेकिन एक महिला पुलिस अधिकारी समेत दो लोगों को मामूली चोटें आईं. नर हाथी को अनंत अंबानी के नेतृत्व वाली वन्यजीव कल्याण पहल वनतारा की सहायता से जगन्नाथ मंदिर ट्रस्ट के पिराना स्थित फार्महाउस में रखा गया है. रथ यात्रा में शामिल होने के लिए आए शेष 14 हाथियों ने 16 किलोमीटर लंबी यात्रा जारी रखी.

यात्रा से पहले की गई नियमित पशुचिकित्सा जांच में नर हाथी में मनोवैज्ञानिक संकट के लक्षण दिखे थे. उसके शरीर हिलाने और सिर हिलाने से उसके तनाव में होने का संकेत मिल रहा था. काफी हद तक यह संभव है कि पर्यावरणीय तनाव, तेज संगीत और भीड़ के कारण हाथी तनाव महसूस कर रहा हो.  

हाथी अत्यधिक बुद्धिमान और सामाजिक होते हैं. यह विशालकाय जानवर शोर और कैद के प्रति संवेदनशील भी होते हैं. हैदराबाद में ‘सेंटर फॉर सेल्युलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी’ द्वारा 2019 में किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि लंबे, थकाऊ धार्मिक समारोहों में शामिल होने के दौरान बंधनों में रहने के कारण हाथियों में तनाव के हॉर्मोन बढ़ जाते हैं.

इससे हाइपरग्लाइसेमिया यानी ब्लड शुगर लेवल बढ़ने से न्यूरोनल कोशिका की मृत्यु हो जाती है. इस परिस्थिति में हाथी का स्वभाव उग्र हो जाता है. अक्सर ऐसा  जंजीरों में जकड़े जाने और लंबे समय तक काम करने की वजह से होता है. अहमदाबाद में भी इन्हीं वजहों से हाथी के बेकाबू होने की बात कही जा रही है. आमतौर पर ऐसी स्थिति में जानवरों का व्यवहार अप्रत्याशित हो सकता है, जिससे भीड़भाड़ वाले वातावरण में जोखिम पैदा हो सकता है. खासकर उन जगहों पर जहां भागने के रास्ते सीमित होते हैं.

जानवरों पर काम करने वाली संस्था ‘पेटा इंडिया’ ने एक बयान में हाथियों को शोरगुल और भीड़ भरे वातावरण में जाने के खतरे के बारे में चेतावनी दी है. पेटा ने इस बात पर जोर दिया है कि अहमदाबाद में हुई घटना में बड़े पैमाने पर जनहानि हो सकती थी.

भारत में हिंदू परंपरा में हाथियों को पूजनीय माना जाता है. हाथी बुद्धि, शक्ति और दैवीय संबंधों के प्रतीक माना जाता है. विशेष रूप से भगवान गणेश से इसके जुड़े होने की बात कही जाती है. मंदिर के जुलूसों में हाथी की मौजूदगी को भव्यता और आध्यात्मिक से जोड़कर देखा जाता है. ये परंपराएं सदियों पुरानी रीति-रिवाजों में निहित हैं, जिसमें हाथी देवताओं को ले जाते हैं या रथों का नेतृत्व करते हैं.

देश भर के मंदिरों में हाथियों को बंदी बनाकर रखा जाता है. पशु अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि 1977 में जानवरों को पकड़ने पर प्रतिबंध के बावजूद उन्हें अक्सर जंगल से लाया जाता है. हालांकि, इन कानूनों के लूपहोल्स का इस्तेमाल कर आज भी हाथी को उपहार के तौर पर भेंट करने की परंपरा है.  

इन हाथियों को आम तौर पर जंजीरों में बांधकर रखा जाता है. इन्हें कठोर प्रशिक्षण दिया जाता है और शोरगुल व भीड़-भाड़ वाली जगहों पर लंबे समय तक रहने के लिए मजबूर किया जाता है.

इससे कई बार हाथी के पैरों में चोट लग जाती है और उसमें मानसिक तनाव के लक्षण दिखने लगते हैं, जिसमें पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर जैसे लक्षण शामिल हैं. ऐसे लक्षण अफ्रीकी हाथियों में उनके आवास में हुए नुकसान के बाद देखने को मिलते रहे है.

इन सभी खतरों का जिक्र करते हुए पशु कल्याण संस्था हेरिटेज एनिमल टास्क फोर्स ने रिपोर्ट दी है कि 2007 से 2024 के बीच त्योहारों के दौरान हाथियों के उत्पात मचाने के कारण केरल में 540 लोगों की मौत हुई है.

2024 में पूरे भारत में कम से कम 14 ऐसी घटनाएं सामने आईं, जिनमें बंदी हाथियों ने हिंसक रूप धारण कर लिया. 2025 के पहले कुछ महीनों में केरल में धार्मिक जुलूसों में इस्तेमाल किए गए 20 से ज्यादा बंदी हाथी परेशान और आक्रामक हो गए, जिसके चलते छह लोगों की मौत हो गई और कई लोग घायल हो गए.

जनवरी में एक तनावग्रस्त नर हाथी पाक्कथ श्रीकुट्टन ने केरल के एक त्यौहार के दौरान 24 लोगों को घायल कर दिया और एक को मार डाला. मई में त्रिशूर पूरम में दो हाथियों ने उत्पात मचाया, जिससे 42 लोग घायल हो गए.

2013 में केरल के एक मंदिर द्वारा पाले जा रहे भारत के सबसे ऊंचे हाथी चिकोट्टुकावु रामचंद्रन ने एक धार्मिक उत्सव के दौरान तीन महिलाओं को मार डाला था. इसी तरह के व्यवहार के कारण पहले भी इस हाथी पर प्रतिबंध लगाया गया था.

ये त्रासदियां हाथियों की अप्राकृतिक वातावरण से निपटने में असमर्थता के कारण होती हैं. शांत और फैले हुए जंगल को इन हाथियों के रहने के लिए सबसे अच्छा निवास स्थान माना जाता है, जहां कम-से-कम मानवीय दखल हो.

विशेषज्ञ इस तरह के धार्मिक समारोह में मैकनिकल हाथियों के इस्तेमाल करने के विकल्पों की वकालत करते हैं. जानवरों पर काम करने वाली संस्था पेटा ने इसकी शुरुआत की है. हाथी की हरकतों की नकल करने में सक्षम ये सजीव रोबोट दक्षिण भारत के कम से कम 19 मंदिरों द्वारा अपनाए गए हैं. इनमें से दस जगहों पर यह हाथी पेटा इंडिया द्वारा दान किए गए हैं.

रबर, स्टील और फाइबर से बने यांत्रिक हाथी तीन मीटर लंबे होते हैं और उनका वजन 800 किलो होता है. पेटा के बयान में कहा गया है, "ये मैकनिकल हाथी असली हाथी की तरह अपनी सूंड उठा सकते हैं, कान फड़फड़ा सकते हैं, पूंछ हिला सकते हैं और मूर्तियों या व्यक्तियों को समारोह के दौरान एक स्थान से दूसरी स्थान ले जा सकते हैं. एक अच्छी बात यह है कि व्हीलबेस पर लगे और बिजली से चलने वाले ये हाथी जुलूसों के दौरान किसी की जान के लिए खतरा नहीं हो सकते.”

ऐसा ही देवी दासन नाम का एक हाथी इस मार्च में तिरुवनंतपुरम के श्री बलभद्रकाली मंदिर में लॉन्च किया गया था. विशेषज्ञों का तर्क है कि इस तरह के इनोवेशन से जानवरों की पीड़ा खत्म होती है और साथ ही अनुष्ठान की प्रामाणिकता भी बनी रहती है.

रथ यात्रा की घटना के बाद PETA इंडिया ने गुजरात सरकार से सार्वजनिक जुलूसों में हाथियों के उपयोग पर रोक लगाने की मांग की है. इसके साथ ही पेटा ने सरकार द्वारा चुने गए किसी भी मंदिर में संस्था द्वारा आदमकद यांत्रिक हाथी निःशुल्क दान करने की पेशकश की है. बशर्ते मंदिर यह वादा करे कि जीवित हाथियों को कभी नहीं पालेगा या उन्हें किराये पर नहीं लेगा.

इससे पहले ‘पेटा इंडिया’ ने हाथियों के उपयोग पर सख्त नियम लगाने की मांग की थी. जानवरों के लिए अनिवार्य आराम करने के समय पर इन जानवरों को कार्यक्रमों में ले जाने पर भी पाबंदी लगाने की मांग की गई थी. दरअसल, 2024 में हाथी ने एक महावत को मार डाला था. इसके बाद ही पेटा इंडिया ने सरकार से ये मांग की थी. ‘पेटा इंडिया’ की यह कोशिश भारत की धार्मिक परंपराओं में हाथियों के उपयोग की नैतिक और व्यावहारिक चुनौतियों का समाधान करती है.

Advertisement
Advertisement