उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों एक फ़िल्मी किरदार ने असल बहस छेड़ दी है. 'धुरंधर: द रिवेंज' की रिलीज़ के बाद से इसका एक किरदार आतिफ़ अहमद सिर्फ सिनेमाघरों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने राजनीतिक गलियारों में भी हलचल पैदा कर दी है.
यह किरदार मारे गए गैंगस्टर-राजनेता अतीक अहमद से कथित समानताओं के कारण विवाद के केंद्र में है, और जैसे-जैसे फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफलता के नए रिकॉर्ड बना रही है, वैसे-वैसे यह विवाद भी गहराता जा रहा है.
सिनेमा से नैरेटिव तक
फिल्म के शुरुआती दृश्यों से ही आतिफ़ का प्रस्तुतीकरण दर्शकों को अतीक अहमद की याद दिलाता है. प्रयागराज के चकिया जैसे लोकेशन, सफेद कपड़ों में बाहुबली की छवि, और एक संगठित आपराधिक नेटवर्क का चित्रण- ये सभी तत्व उस वास्तविक राजनीतिक-अपराधिक कहानी से मेल खाते दिखते हैं, जिसे उत्तर प्रदेश की राजनीति लंबे समय से झेलती आई है. फिल्म निर्माताओं ने भले ही डिस्क्लेमर देकर इसे काल्पनिक बताया हो, लेकिन राजनीतिक दलों का मानना है कि यह समानता महज़ संयोग नहीं है.
समाजवादी पार्टी (सपा) ने इस पूरे प्रकरण को सीधे राजनीतिक षड्यंत्र से जोड़ा है. पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने आरोप लगाया है कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) चुनावों से पहले फिल्मों के जरिए एक 'मनगढ़ंत नैरेटिव' गढ़ रही है. उनका तर्क है कि आतिफ के जरिए अतीक अहमद की छवि को इस तरह पेश किया गया है कि वह न केवल एक माफिया सरगना लगे, बल्कि अंतरराष्ट्रीय आतंकी नेटवर्क से भी जुड़ा हुआ दिखाई दे. इससे मतदाताओं की सोच प्रभावित हो सकती है.
सपा के गाजीपुर सांसद अफज़ल अंसारी ने भी फिल्म पर सवाल उठाते हुए कहा कि फिल्म इंडस्ट्री अक्सर “डिस्क्लेमर” की आड़ में वास्तविक पात्रों का इस्तेमाल करती है. उनके मुताबिक, यह एक सोची-समझी रणनीति हो सकती है, जिससे जनता के बीच पहले से मौजूद धारणाओं को और मजबूत किया जाए. उनका सवाल यह भी है कि आखिर ऐसे चित्रण हमेशा चुनिंदा चेहरों के इर्द-गिर्द ही क्यों बनाए जाते हैं.
“पॉलिटिकल मैसेजिंग” पर उठे सवाल
विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू फिल्म में दिखाया गया आतंकी कनेक्शन है. आतिफ़ को पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI और आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा से जुड़ा दिखाया गया है. यह चित्रण राजनीतिक बहस को और तीखा बना देता है. हालांकि, अतीक अहमद के खिलाफ दर्ज मामलों और पुलिस चार्जशीट में कुछ बयानों के आधार पर ऐसे संबंधों का उल्लेख जरूर हुआ था, लेकिन आधिकारिक स्तर पर ऐसे किसी नेटवर्क का ठोस और निर्णायक सबूत सामने नहीं आया है- खासतौर पर नकली करेंसी जैसे मामलों में. इसी बिंदु पर राजनीतिक और पूर्व पुलिस अधिकारियों के बीच मतभेद भी सामने आते हैं.
उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह और जम्मू-कश्मीर के पूर्व डीजीपी एसपी वैद जैसे अधिकारी फिल्म के चित्रण का बचाव करते हुए कहते हैं कि जांच एजेंसियों ने अतीक के अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क की ओर संकेत किए थे. वैद ने एक पॉडकास्ट में कहा था कि अतीक के संपर्क लश्कर-ए-तैयबा और ISI से जुड़े लोगों तक थे, और फिल्म उसी पृष्ठभूमि को नाटकीय रूप में प्रस्तुत करती है. लेकिन सपा और उसके समर्थक इस तर्क को खारिज करते हैं. उनका कहना है कि बिना पुख्ता सबूतों के ऐसे गंभीर आरोपों को सिनेमाई कहानी के रूप में पेश करना न केवल भ्रामक है, बल्कि राजनीतिक रूप से प्रेरित भी हो सकता है. उनके अनुसार, यह रचनात्मक छूट नहीं बल्कि “पॉलिटिकल मैसेजिंग” का एक नया माध्यम बनता जा रहा है.
BJP के नैरेटिव को बूस्ट?
इस पूरे विवाद ने 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के संदर्भ में नई परत जोड़ दी है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि BJP लंबे समय से 'माफिया-मुक्त उत्तर प्रदेश' के नैरेटिव पर काम कर रही है, और अतीक अहमद जैसे चेहरों के खिलाफ की गई कार्रवाई को अपनी उपलब्धि के रूप में पेश करती रही है. ऐसे में, जब एक लोकप्रिय फिल्म उसी कहानी को नए रूप में पेश करती है, तो उसका असर चुनावी विमर्श पर पड़ना तय माना जा रहा है.
राजनीतिक विश्लेषक और मेरठ विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर विवेक नौटियाल का मानना है, “BJP पिछले कुछ सालों से कानून-व्यवस्था को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश कर रही है. ऐसे में अगर एक लोकप्रिय फिल्म उसी थीम को भावनात्मक और दृश्य रूप में दोहराती है, तो यह चुनावी माहौल में नैरेटिव रीइन्फोर्समेंट यानी किसी धारणा को मजबूती देने का काम करती है.” वे जोड़ते हैं कि सिनेमा का असर खासतौर पर उन युवा मतदाताओं पर ज्यादा होता है, जो 2012 या उससे पहले की राजनीति को सीधे तौर पर नहीं जानते, लेकिन फिल्मों के जरिए उसकी एक छवि बना लेते हैं.
पीड़ित बनाम राजनीति
इस बहस में एक और अहम आवाज़ सामने आई है और वह है BSP नेता रहे दिवंगत राजू पाल की पत्नी पूजा पाल की. उन्होंने फिल्म के चित्रण का समर्थन करते हुए सपा पर गंभीर आरोप लगाए हैं. उनका कहना है कि अतीक अहमद ने न केवल उनके पति की हत्या करवाई, बल्कि हजारों परिवारों को तबाह किया. पूजा पाल का यह भी दावा है कि अगर वर्तमान में योगी आदित्यनाथ की सरकार न होती, तो वे खुद भी सुरक्षित नहीं होतीं.
पूजा पाल के बयान इस पूरे विवाद को और भावनात्मक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर तीखा बना देते हैं. जहां एक ओर सपा इसे अपनी छवि को नुकसान पहुंचाने की साजिश मानती है, वहीं दूसरी ओर BJP समर्थक और कुछ पीड़ित परिवार इसे 'सच्चाई का सिनेमाई रूप' बताते हैं. अतीक अहमद का राजनीतिक अतीत इस विवाद को और जटिल बना देता है. 1996 में विधायक बनने से लेकर 2004 में फूलपुर से सांसद बनने तक, उनका सफर हमेशा विवादों से घिरा रहा. हत्या, अपहरण और रंगदारी जैसे दर्जनों मामलों के चलते वह एक ऐसे प्रतीक बन गए थे, जिसे BJP अक्सर सपा सरकारों पर हमला करने के लिए इस्तेमाल करती रही है.
15 अप्रैल 2023 को पुलिस हिरासत में अतीक और उसके भाई अशरफ की हत्या ने इस कहानी को एक नाटकीय मोड़ दिया, लेकिन उनकी राजनीतिक प्रासंगिकता खत्म नहीं हुई. आज भी उनका नाम उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था और राजनीतिक नैरेटिव में बार-बार उभरता है. 'धुरंधर-2’ ने उसी स्मृति को फिर से जीवित कर दिया है, लेकिन एक नए, अधिक नाटकीय और विवादित रूप में.

