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'10 मिनट में डिलीवरी' का जानलेवा खेल कैसे हुआ बंद?

ब्लिंकिट ने चुपचाप अपनी मार्केटिंग से '10 मिनट' का ब्रांड प्रॉमिस हटा दिया है और अब वे 'मिनटों में डिलीवरी' की बात कर रहे हैं

डिलीवरी की भागदौड़ के बीच सुस्ताता एक गिग वर्कर
डिलीवरी की भागदौड़ के बीच सुस्ताता एक गिग वर्कर
अपडेटेड 14 जनवरी , 2026

10 मिनट में डिलीवरी'... सुनने में यह कोई मैजिकल फैसिलिटी लगती है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस जादुई 10 मिनट की असली कीमत क्या है. हाल ही में भारत के 'क्विक कॉमर्स' जगत से एक बड़ी खबर आई है— ब्लिंकिट ने चुपचाप अपनी मार्केटिंग से '10 मिनट' का ब्रांड प्रॉमिस हटा दिया है और अब वे 'मिनटों में डिलीवरी' की बात कर रहे हैं. इस बदलाव के पीछे की सबसे बड़ी वजह है केंद्रीय श्रम मंत्री मनसुख मांडविया की मीटिंग, जो उन्होंने ब्लिंकिट, जेप्टो और स्विगी जैसी कंपनियों के सीईओ के साथ की थी.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मीटिंग में मनसुख मांडविया ने साफ कर दिया था कि 'स्पीड' के चक्कर में गिग वर्कर्स की 'सेफ्टी' से समझौता किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. यह कार्रवाई उन बढ़ते सड़क हादसों का नतीजा है जो इन 10-मिनट के वादों की वजह से हो रहे हैं. यह मुद्दा सिर्फ ब्लिंकिट का नहीं, बल्कि उन तमाम प्लेटफॉर्म्स का है जिन्होंने हमें '10 मिनट्स डिलीवरी' की ऐसी आदत डाल दी है जिसके पीछे किसी की जान दांव पर लगी होती है.

भारत में क्विक कॉमर्स का मॉडल 'डार्क स्टोर्स' के भरोसे चलता है, लेकिन सरकार की नजर अब इनके काम करने के तरीके पर है. सूत्रों के मुताबिक, श्रम मंत्री मनसुख मांडविया ने मीटिंग में साफ तौर पर पूछा कि क्या ये कंपनियां अपने डिलीवरी पार्टनर्स को सोशल सिक्योरिटी, इंश्योरेंस और सेफ वर्किंग एनवायरनमेंट दे रही हैं. उन्होंने सवाल उठाया कि क्या 10 मिनट की डेडलाइन को पूरा करने के लिए डिलीवरी पार्टनर्स पर ट्रैफिक नियम तोड़ने का दबाव बनाया जाता है. इसी मीटिंग का असर है कि अब ब्लिंकिट ने अपना 10-मिनट का टैग हटाना शुरू कर दिया है. यह बदलाव सिर्फ एक बिजनेस स्ट्रैटेजी नहीं, बल्कि उस भारी दबाव और कानूनी कार्रवाई का नतीजा है जो गिग वर्कर्स की सुरक्षा को लेकर इन कंपनियों पर पड़ रहा है.

श्रम मंत्री की मीटिंग से पहले गिग वर्कर्स के मुद्दे को संसद के शीतकालीन सत्र में भी जोरदार तरीके से उठाया गया. बीते 5 दिसंबर को आम आदमी पार्टी के सांसद राघव चड्ढा ने न केवल संसद के भीतर इन वर्कर्स के लिए सोशल सिक्योरिटी और कड़े कानूनों की वकालत की, बल्कि उन्होंने इस समस्या को जमीन पर जाकर समझने की कोशिश भी की. आपको याद होगा, राघव चड्ढा ने खुद एक ब्लिंकिट डिलीवरी पार्टनर के स्कूटर पर पीछे बैठकर दिल्ली की सड़कों पर सफर किया था और सोशल मीडिया पर उसका वीडियो भी शेयर किया था. उस राइड के दौरान उन्होंने महसूस किया कि आप जैसे किसी डिलीवरी पार्टनर को किन मुश्किलों से गुजरना पड़ता है— तपती धूप, भारी ट्रैफिक और हर पल ऐप की वह नोटिफिकेशन जो उन्हें तेज भागने पर मजबूर करती है. राघव चड्ढा ने संसद में स्पष्ट रूप से कहा था कि इन करोड़ों युवाओं को, जो हमारी सुविधा के लिए दिन-रात एक करते हैं, हम सिर्फ 'पार्टनर' कहकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकते. आपको कानूनी सुरक्षा, बीमा और सम्मान मिलना ही चाहिए.

संसद में गिग वर्कर्स का मुद्दा उठाते हुए राघव चड्ढा ने कहा, "लाल बत्ती पर खड़ा एक डिलीवरी बॉय यही सोचता रहता है कि लेट हुआ तो रेटिंग गिर जाएगी, इंसेंटिव कट जाएगा और ऐप आईडी ब्लॉक कर देगी. इसीलिए 10 मिनट की डिलीवरी के लिए वो ओवर स्पीडिंग करता है, लाल-बत्ती जम्प करता है और अपनी जान जोखिम में डालता है."

इसके अलावा उन्होंने कस्टमर के गुस्से को भी संसद में उठाया. आप सांसद का कहना था कि कस्टमर की प्रताड़ना का डर भी डिलीवरी पर्सन्स के मन में होता है. जैसे ही आर्डर 5 से 7 मिनट्स लेट होता है, कस्टमर फ़ोन कर डांटता है और जब आर्डर डिलीवरी के टाइम भी धमकी दी जाती है कि रेटिंग ख़राब कर दी जाएगी.

बीते क्रिसमस और न्यू ईयर पर भी गिग वर्कर्स ने सोशल सिक्योरिटी और बढ़ते दबाव को लेकर हड़ताल की थी जिससे इन प्लेटफार्म का बिज़नेस एफेक्ट हुआ था. हालाँकि इन कम्पनीज ने रिकॉर्ड सेल का दावा भी किया था मगर गिग वर्कर्स की हड़ताल से उनकी बिज़नेस पर पड़ा डेंट साफ़ था.

इंडिया टुडे से बातचीत में एक डिलीवरी बॉय ने कहा कि 5-6 मिनट तो स्टोर से सामान लेने में ही निकल जाता है, ऐसे में बाकी बचे 5 मिनट में डिलीवरी कैसे होगी. वहीं एक दूसरे डिलीवरी बॉय सनोज ने बताया, "5 किलोमीटर की डिलीवरी के लिए महज 25 रुपए मिलते हैं. ऐसे में हमें नुक्सान होता है. दिनभर काम करने के बाद बस 700-800 रुपए की कमाई होती है और उसमें पेट्रोल भी अपनी जेब से डलवाना होता है."

जब हम गिग वर्कर्स की बात करते हैं, तो हमें यह समझना होगा कि आप वो लोग हैं जो आज के नए भारत की इकोनॉमी को अपने कंधों पर उठाए हुए हैं. चाहे वो स्विगी के डिलीवरी पार्टनर हों जो आपके घर का खाना लाते हैं, या जेप्टो के वो डिलीवरी पर्सन जो इमरजेंसी में 'कपकेक्स' पहुंचाते हैं— वे सभी सम्मान के हकदार हैं. उन्हें 'डिलीवरी पर्सन' या महज एक सर्विस प्रोवाइडर की तरह नहीं देखना चाहिए. इनके पास न तो कोई फिक्स्ड वर्किंग ऑवर है और न ही कोई छुट्टी. आज का सिस्टम ऐसा है जहाँ इंसान को एक मशीन की तरह ट्रीट किया जाता है, जहाँ उसकी सुरक्षा से ज्यादा जरूरी सामान की 'ऑन-टाइम' डिलीवरी होती है. अगर डिलीवरी में एक मिनट की भी देरी होती है, तो उनकी रेटिंग गिर जाती है, जिससे सीधे उस दिन की कमाई पर असर पड़ता है. यह एल्गोरिदम का गुलाम बनने जैसा है.

ब्लिंकिट और अन्य प्लेटफॉर्म्स पर यह दबाव सोशल मीडिया के दौर में और बढ़ गया है. कई बार ग्राहक सिर्फ 2 मिनट की देरी होने पर सोशल मीडिया पर ब्रांड को टैग करके शिकायत कर देते हैं. इस 'कस्टमर सैटिस्फैक्शन' की होड़ में कंपनियां अपने डिलीवरी पार्टनर्स पर दबाव बढ़ाती हैं. ब्लिंकिट ने अब '10 मिनट' का टैग हटाया है क्योंकि वे समझ चुके हैं कि अब सुरक्षा चिंताओं को और नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. स्विगी और जेप्टो भी अब अपनी सुरक्षा नीतियों को लेकर मंथन कर रहे हैं. लेकिन असली सवाल एल्गोरिदम का है. क्या ये कंपनियां अपने ऐप के भीतर उन जुर्माने या पेनल्टी को हटाएंगी जो देरी होने पर लगाई जाती हैं. जब तक एक डिलीवरी पार्टनर के मन से 'पैसे कटने का डर' नहीं निकलेगा, तब तक सड़क पर उनकी रफ्तार कम नहीं होगी.

यहां ये भी समझना ज़रूरी है कि 10 मिनट्स डिलीवरी सिर्फ गिग वर्कर्स की जान खतरे में नहीं डाल रही, इससे ट्रैफिक में मौजूद दूसरे लोगों की जान भी खतरे में पड़ती है. किसी भी एक दिन दफ्तर में डेडलाइन के प्रेशर में हम परेशान हो जाते हैं, लेकिन गिग वर्कर्स को हर दिन या हर मिनट यही प्रेशर झेलना पड़ता है. ऐसे में ना तो उसे अपनी जान दिखती है और ना ही सड़क पर चलते दूसरे लोगों की.

ऐसे में हमारी जिम्मेदारी क्या है? क्योंकि सवाल हम और आप जैसे ग्राहकों से भी है. क्या हमें वाकई एक पैकेट दूध या ब्रेड के लिए 10 मिनट की इतनी सख्त जरूरत है कि हम किसी की जिंदगी को खतरे में डाल दें. इस मामले में सरकार की सख्ती और ब्लिंकिट की तरफ से 10 मिनट का प्रॉमिस छोड़ना एक सकारात्मक शुरुआत हो सकती है, लेकिन यह तभी सफल होगा जब हम समाज के तौर पर महज गिग वर्कर्स ही नहीं, किसी भी सर्विस प्रोवाइडर को इंसान समझेंगे और उनके प्रति संवेदनशील बनेंगे. हमें यह स्वीकार करना होगा कि 'फैसिलिटी' से ऊपर किसी की जान है. अगली बार जब आपका ऑर्डर 5 मिनट देरी से आए, तो याद रखिए कि शायद उस पार्टनर ने अपनी जान बचाने के लिए वह देरी की है.

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