क्या भारत की विपक्षी पार्टियों ने मिलकर लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसद आरक्षण को रोक दिया? क्या महिलाएं कभी इतनी बड़ी संख्या में इन जगहों पर नहीं पहुंच पाएंगी? अगर ऐसा है तो 2023 में बड़े हल्ले के साथ पास किया गया नारी शक्ति वंदन अधिनियम (महिला आरक्षण कानून) का क्या हुआ?
इन सवालों का संक्षिप्त जवाब यह है कि महिलाओं को 33 फीसद आरक्षण जरूर मिलेगा, लेकिन 2034 से पहले नहीं. यह जवाब पहले तो दिलासा देता है, लेकिन फिर निराश भी करता है. दरअसल, विपक्ष ने 17 अप्रैल को संसद में नरेंद्र मोदी सरकार के उस प्रयास को रोक दिया था, जिसमें इस तारीख को 2029 तक आगे बढ़ाने की बात कही गई थी.
संविधान के अनुच्छेद 81, 82 और 170 के तहत परिसीमन अनिवार्य है, जिसके जरिए निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का समय-समय पर पुनर्निर्धारण किया जाता है. ताकि जनसंख्या के अनुपात में संसद में प्रतिनिधित्व बना रहे. इसको लेकर यह सिद्धांत स्पष्ट है कि देश में एक व्यक्ति, एक वोट की एक समान वैल्यू होगी.
उत्तर प्रदेश के सांसद को लगभग उतने ही नागरिकों का प्रतिनिधित्व करना चाहिए, जितना तमिलनाडु के सांसद को. अभी से पहले भारत ने यह प्रक्रिया चार बार 1952, 1963, 1973 और 2002 में अपनाई है, जिसके परिणामस्वरूप लोकसभा सीटों की संख्या 494 से बढ़कर 522 और आज 543 हो गई.
हालांकि, 1973 के तीन साल बाद 1976 में परिसीमन को रोक दिया गया. इंदिरा गांधी सरकार ने आपातकाल के दौरान संविधान के 42वें संशोधन के जरिए सीटों के बढ़ाने की प्रक्रिया को ही रोक दिया था. इसका कारण जनसंख्या नियंत्रण बताया गया था. सरकार का कहना था कि जिन राज्यों ने अपनी जन्म दर को नियंत्रित किया, उन्हें कम सीटें देकर दंडित नहीं किया जाना चाहिए.
उत्तर प्रदेश और बिहार में जनसंख्या तेजी से बढ़ी. तमिलनाडु और केरल में ऐसा नहीं हुआ. दक्षिणी राज्य राष्ट्रीय GDP में तुलनात्मक रूप से ज्यादा योगदान करते हैं. जनगणना आधारित सीटों के बंटवारे से केंद्रीय सत्ता पर कंट्रोल उत्तरी राज्यों के पास ज्यादा हो जाता है. यही कारण है कि दक्षिण ने इसका कड़ा विरोध किया. 1971 की जनगणना से जुड़ा यह गतिरोध 2001 में समाप्त हुआ. 2002 में 84वें संशोधन ने इसे 2026 के बाद की पहली जनगणना तक के लिए बढ़ा दिया था.
मूल रूप से जो जनगणना 2031 में होनी थी, उसे सरकार ने आगे कर दिया है. कोविड की वजह से 2021 वाली जनगणना नहीं हो पाई. अब 2026 में जनगणना होगी और उसके नतीजे 2027 में आएंगे. परिसीमन का काम आमतौर पर 2-3 साल का समय लगता है. यह 2027 में शुरू हो सकता है, लेकिन 2029 के चुनाव से पहले इसे पूरा करना बहुत मुश्किल है.
2023 के कानून के मुताबिक, महिला आरक्षण परिसीमन के बाद ही लागू होगा. इसलिए इस कानून के तहत नई महिला सांसदें हमेशा 20वीं लोकसभा (2029 के बाद) के दौरान ही चुनकर आएंगी. इस बार 19वीं लोकसभा चुनाव के दौरान लोकसभा में महिलाओं की संख्या बढ़ने की कम संभावना है.
विपक्ष ने तभी कह दिया कि 10 साल बाद लागू होने वाला कानून चुनाव से पहले सिर्फ़ दिखावा है. इस कानून को 2029 चुनाव से पहले लागू करने के लिए मोदी सरकार 2026 में तीन बिल लाई. सबसे मुख्य बिल संविधान 131वां संशोधन बिल है. मीडिया इसे महिला आरक्षण बिल बता रहा है, लेकिन यह नया आरक्षण बिल नहीं है. महिला आरक्षण बिल तो 2023 में पास हो चुका है. यह बिल सिर्फ़ उसे 2029 से लागू करने की कोशिश था.
इस बिल ने परिसीमन को 2026 के बाद वाली जनगणना के आधार पर लागू करने के नियम को खत्म कर दिया था. यह बिल संसद को अपनी इच्छानुसार कोई भी जनगणना चुनने की छूट देता था. बिल में साफ लिखा था कि 2011 की जनगणना इस्तेमाल होगी. इसके साथ ही लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ाकर 850 कर दी गईं. विपक्ष का आरोप है कि सरकार ने बिना किसी फॉर्मूले या डेटा एनालिसिस के यह फैसला लिया.
इस बिल से दक्षिण के नेता घबरा गए कि उनकी हिस्सेदारी कम हो जाएगी. अमित शाह ने कहा कि हर राज्य की सीटें 50 फीसद बढ़ेंगी, दक्षिण की 24 फीसद हिस्सेदारी बनी रहेगी. हालांकि, बिल में यह फॉर्मूला लिखा ही नहीं था. 850 में से एक-तिहाई यानी करीब 281 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की गई थी, लेकिन फिर भी विपक्ष ने इसके खिलाफ वोटिंग कर इसे रोक दिया. इसका असल वजह अविश्वास है.
विपक्षी पार्टियों को संदेह है कि महिला आरक्षण के जरिए केंद्र सरकार आगामी चुनाव में लाभ हासिल करना चाहती है. परिसीमन सिर्फ यह तय नहीं करता कि प्रत्येक राज्य को कितनी सीटें मिलेंगी, बल्कि यह भी तय करता है कि चुनाव क्षेत्र की सीमाएं कहां-कहां से खींची जाएंगी.
कांग्रेस नेता राहुल गांधी असम का उदाहरण देते हैं, जहां 2023 में परिसीमन के बाद मुस्लिम-बहुल सीटें 35 से घटकर 22 रह गईं. राज्य स्तर के परिसीमन को अदालत में चुनौती दी जा सकती है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर के परिसीमन को नहीं. हालांकि अजीब बात रही कि विपक्ष की कोई पार्टी असम वाले इस परिसीमन को अदालत में चुनौती देने नहीं गई. यह एक अजीब सा मुद्दा है. इसके अलावा जाति का मुद्दा भी है.
2026 की जनगणना लगभग एक सदी बाद पहली बार अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की गिनती करेगी. OBC आबादी का शायद आधा हिस्सा हैं. जब ये आंकड़े सार्वजनिक हो जाएंगे, तो संसद में OBC के लिए आनुपातिक आरक्षण की मांग जोर पकड़ेगी. साथ ही सुप्रीम कोर्ट के जरिए लगाए गए 50 फीसद आरक्षण की सीमा हटाने का दबाव भी बढ़ेगा. सरकार ने परिसीमन को नई जनगणना से अलग करके इस मुद्दे को अभी के लिए टाल दिया है. इसके बावजूद यह ऐसी समस्या है, जिसे हमेशा के लिए टाली नहीं जा सकती.
मोदी सरकार की बात करें तो इसमें सच्चाई यह है कि मौजूदा 543 सीटों में ही महिला आरक्षण लागू करना व्यावहारिक रूप से बहुत मुश्किल और परेशानी भरा काम है. इसकी असल वजह यह तय करना है कि कौन-कौन सी मौजूदा सांसदों की सीटें महिलाओं के हिस्से में जाएंगी? क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सीट आरक्षित होगी? या लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी की सीट महिलाओं के लिए आरक्षित होगी? परिसीमन इस मुश्किल सवाल से बचाता है. नई बढ़ाई गई सीटों में से कुछ को महिलाओं के लिए आरक्षित कर दिया जाएगा, उन्हें समय-समय पर घुमाया (रोटेट) जाएगा, और किसी को भी असुविधा या झुंझलाहट नहीं होगी.
फिर भी, सरकार की इस जल्दबाजी को समझना मुश्किल है. संविधान संशोधन के लिए दो-तिहाई बहुमत (लगभग 360 वोट) जरूरी होता है. BJP की अगुवाई वाला NDA के पास लोकसभा में केवल 293 सीटें हैं, जो अभी भी जरूरत से 67 वोट कम हैं. बिना तैयारी के अचानक विशेष सत्र बुलाना, सभी दलों की समिति न बनाना और ऐसा बिल लाना जिसे सरकार खुद जानती थी कि पास नहीं होगा.
यह सब ईमानदार कानून बनाने जैसा कम, और राजनीतिक नाटक ज्यादा लगता है. सरकार की गणना यह थी कि अगर विपक्ष नहीं कहेगा, तो महिलाओं के साथ धोखा करने का ठीकरा विपक्ष के सिर पर फूटेगा. BJP ने उसी लाइन पर अब पूरा हमला बोल दिया है.
इस मामले को दोनों पक्षों ने अपने-अपने फायदे में इस्तेमाल करने की कोशिश की है. अगर सरकार को बिल गंभीरता से पास करवाना होता, तो पहले विपक्ष से बातचीत करती. अगर विपक्ष को इस बिल में कोई बदलाव चाहिए था, तो वह सीधे इनकार करने की बजाय बिल में संशोधन मांग सकता था. परिसीमन आखिरकार होगा, इस बिल के साथ या बिना इसके. सवाल यह है कि क्या भारत के राजनेता चुनावी प्रचार बंद करके इतना समय निकाल पाएंगे कि एक निष्पक्ष और उचित परिसीमन तैयार किया जा सके?

