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महिलाओं को पैसे देने की स्कीम ने शुरुआत में ही शुभेंदु सरकार को चिंता में डाला!

पश्चिम बंगाल पर करीब 7.71 लाख करोड़ रुपए का कर्ज है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या शुभेंदु सरकार नई अन्नपूर्णा योजना के तहत महिलाओं को हर महीने 3,000 रुपए दे पाएगी?

पश्चिम बंगाल के CM सुवेंदु अधिकारी (फाइल फोटो)
पश्चिम बंगाल के CM सुवेंदु अधिकारी (फाइल फोटो)
अपडेटेड 20 मई , 2026

पश्चिम बंगाल में BJP सरकार ने अपने अब तक के सबसे बड़े कल्याणकारी कार्यक्रम 'अन्नपूर्णा योजना' का ऐलान किया है. इस योजना के तहत 1 जून से महिलाओं को हर महीने 3,000 रुपए देने का वादा किया गया है. हालांकि, इस योजना के ऐलान के साथ ही सरकार के अंदर राज्य की वित्तीय स्थिति को लेकर चिंता बढ़ रही है.

महिला एवं बाल कल्याण मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने 18 मई को कहा कि तृणमूल कांग्रेस सरकार की लक्ष्मीर भंडार योजना की सभी लाभार्थी महिलाओं को नई योजना का लाभ दिया जाएगा. लक्ष्मीर भंडार योजना में सामान्य श्रेणी की महिलाओं को हर महीने 1,500 रुपए मिलते थे, जबकि आरक्षित श्रेणी (SC/ST/OBC) की महिलाओं को 200 रुपए ज्यादा यानी 1,700 रुपए मिलते थे.

अन्नपूर्णा योजना के अलावा BJP ने सत्ता में आते ही 1 जून से सरकारी बसों में महिलाओं के लिए मुफ्त यात्रा की भी घोषणा की है. ऐसे में अब इन योजनाओं के लिए पैसा खर्च करना राज्य सरकार के सामने किसी चुनौती से कम नहीं है. पॉल ने कहा कि मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (SIR) के दौरान जिन महिलाओं के नाम हटा दिए गए थे, उनकी समीक्षा व्यक्तिगत रूप से की जाएगी.

हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के तहत नागरिकता के लिए आवेदन करने वाली या SIR निवारण के लिए सर्वोच्च न्यायालय के जरिए नियुक्त न्यायाधिकरणों से संपर्क करने वाली महिलाओं को बिना किसी रुकावट के लाभ मिलते रहेंगे.

पिछली सरकार के दौरान तैयार किए गए अनुमानों के मुताबिक, लगभग 2.21 करोड़ महिलाओं को लक्ष्मी भंडार योजना का लाभ मिल रहा था. अगर BJP सरकार इसी तरह लाभार्थियों की संख्या को बनाए रखते हुए प्रति माह 3,000 रुपए का भुगतान करती है तो इस कल्याणकारी योजना पर सालान खर्च लगभग 80,000 करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है. ऐसे में साफ है कि पहले से ही 7.71 लाख करोड़ रुपए के कर्ज से दबे राज्य के लिए इतना खर्च करना एक बहुत बड़ा बोझ होगा.

शुभेंदु अधिकारी सरकार के साथ काम कर रहे एक व्यक्ति ने बताया है, "यह योजना बिल्कुल भी टिकाऊ नहीं है. मुख्यमंत्री ने वित्त सचिव समेत वरिष्ठ अधिकारियों को इस पर चर्चा करने और इसका कोई हल निकालने के लिए कहा है." वरिष्ठ अधिकारियों ने संकेत दिया कि कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है लेकिन सरकार आखिर में वित्तीय बोझ को कम करने और लाभार्थियों की संख्या को कम करने के लिए पात्रता संबंधी फिल्टर या नई शर्तें लागू कर सकती है.

सरकार के जरिए राज्य कर्मचारियों से किए गए वादों ने प्रशासन के भीतर वित्तीय चिंता को और बढ़ा दिया है. पॉल ने 18 मई को घोषणा की कि मंत्रिमंडल ने राज्य सरकार के कर्मचारियों के लिए 7वें वेतन आयोग की स्थापना को मंजूरी दे दी है. हालांकि, सरकार ने आयोग की सिफारिशें पेश करने या उन्हें लागू करने के लिए कोई समयसीमा तय नहीं की है.

इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि पॉल ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान महंगाई भत्ते के बकाया के भुगतान पर कोई स्पष्ट घोषणा नहीं की. यह एक ऐसा मुद्दा है जो हाल के वर्षों में राजनीतिक अभियानों और कर्मचारी विरोध प्रदर्शनों के कारण खूब चर्चा में रहा है.

अधिकारियों का मानना ​​है कि सरकारी खजाने में होने वाली बचत का एक हिस्सा BJP सरकार के जरिए जून से धर्म आधारित भत्तों को बंद करने के फैसला से हो सकता है. तृणमूल सरकार के शासनकाल में इमामों, मुअज्जिनों और हिंदू पुजारियों को मासिक मानदेय दिया जाता था, जिसकी राशि विधानसभा चुनावों से पहले इस वर्ष बढ़ा दी गई थी. नए प्रशासन का तर्क है कि राज्य कल्याण को धर्म से नहीं जोड़ा जाना चाहिए और व्यापक नीतिगत बदलाव के तहत ऐसे भत्तों को समाप्त करने की दिशा में कदम उठाया है.

इसी बीच मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने 18 मई को घोषणा की है कि उनकी सरकार मेधावी लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों के लिए स्वामी विवेकानंद मेरिट-कम-मीन्स छात्रवृत्ति को दोबारा नए सिरे से शुरू करने की योजना बना रही है. यह स्कॉलरशिप उच्च माध्यमिक से लेकर स्नातकोत्तर स्तर तक के छात्रों को वित्तीय सहायता प्रदान करती है.

BJP सरकार दोहरी रणनीति अपना रही है. एक तरफ कल्याणकारी योजनाओं का विस्तार और दूसरी ओर प्रशासनिक और वित्तीय स्तर पर पैसा जुटाने का प्रयास. प्रशासन के भीतर भी अधिकारी निजी तौर पर स्वीकार करते हैं कि वेतन में बदलाव, पेंशन देनदारियों और नई सामाजिक योजनाओं के साथ-साथ ऐसे व्यापक वादों को निभाना अधिकारी के पहले साल के कार्यकाल की सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है.

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