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'बूथ से बहुमत तक' बंगाल का असली एक्शन प्लान जिसने BJP को दिलाई जीत

200 से ज्यादा सीटों के साफ और मजबूत जनादेश के साथ, सुनील बंसल ने संघ के अनुशासन, डेटा और लगातार जमीनी मेहनत को इस तरह जोड़ा कि BJP ने पश्चिम बंगाल में एक ऐतिहासिक जीत दर्ज कर ली

BJP Sees Advantage in Two-Phase Bengal Assembly Polls
पश्चिम बंगाल में BJP की एक रैली के दौरान सुवेंदु अधिकारी
अपडेटेड 4 मई , 2026

BJP और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूरे नेटवर्क के लिए यह नतीजा सिर्फ सीटों का खेल नहीं है. यह श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जमीन है, वही जमीन जिसने उस सोच को जन्म दिया जिससे पार्टी की पहचान बनी. कभी इसे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का मजबूत गढ़ माना जाता था, जहां से देश की राजनीति को दिशा मिलती थी.

लेकिन समय के साथ BJP के भीतर यह भावना बनी कि यह विरासत पहले 34 साल के वामपंथी शासन और फिर 2011 से ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के दौर में कमजोर पड़ गई. ऐसे में 4 मई का यह नतीजा सिर्फ जीत नहीं, बल्कि एक तरह की वैचारिक वापसी के रूप में देखा जा रहा है. पूर्व केंद्रीय मंत्री रवि शंकर प्रसाद इसे “कोर समर्थकों के लिए भावनात्मक पल” बताते हैं, जिसकी तुलना अनुच्छेद 370 हटाने और राम मंदिर आंदोलन से की जा रही है.

यह भावना अब सीधे आंकड़ों में भी दिखती है. 294 सीटों वाली विधानसभा में BJP ने 190 से ज्यादा सीटें जीत ली हैं. 2021 में जहां उसके पास 77 सीटें थीं, वहां यह 110 से ज्यादा सीटों की छलांग है. वोट शेयर भी करीब 38.1 प्रतिशत से बढ़कर 44.5 से 45.5 प्रतिशत के बीच पहुंच गया है, यानी लगभग 6 से 8 प्रतिशत का उछाल. दूसरी तरफ तृणमूल कांग्रेस, जिसने पिछली बार 213 सीटें और करीब 48 प्रतिशत वोट हासिल किए थे, उसका दबदबा तेजी से घटा है. खास बात यह है कि 2021 में लगभग 100 सीटें ऐसी थीं जहां जीत-हार का अंतर 5,000 वोट से भी कम था. ऐसे में इतना बड़ा स्विंग सिर्फ मुकाबलों को नहीं बदलता, पूरी तस्वीर उलट देता है.

बंगाल के बाहर BJP का प्रदर्शन मिला-जुला रहा. असम में पार्टी ने 75 से ज्यादा सीटों के साथ अपनी पकड़ और मजबूत की और सहयोगियों के साथ 126 में से 100 से ज्यादा सीटें हासिल कर लगातार तीसरी बार सरकार बनाई. यहां वोट शेयर मिड-40 प्रतिशत के आसपास रहा. तमिलनाडु में पार्टी अब भी छोटी ताकत है, जहां उसे सिंगल डिजिट सीटें और करीब 6-8 प्रतिशत वोट मिले, लेकिन बदलती राजनीति में उसकी भूमिका बढ़ रही है, खासकर अभिनेता से नेता बने विजय की तमिलगा वेत्री कझगम (TVK) और एआईएडीएमके (AIDMK) को एनडीए (NDA) में जोड़ने की कोशिशों में. केरल में 2 सीटें और करीब 15 प्रतिशत वोट शेयर के साथ पार्टी ने धीरे-धीरे अपनी मौजूदगी बढ़ाने के संकेत दिए हैं. पुडुचेरी में उसने 5 सीटों और करीब 11 प्रतिशत वोट शेयर के साथ सहयोगी भूमिका बनाए रखी. इन सबके बीच साफ है कि बंगाल की जीत कोई आम लहर का हिस्सा नहीं थी, बल्कि अलग तरह की संगठनात्मक सफलता थी.

दिलचस्प यह है कि BJP ने खुद इतनी बड़ी जीत की उम्मीद नहीं की थी. उसकी आंतरिक योजना 135 से 160 सीटों के बीच की थी. रणनीति साफ थी...अपने वोटर को संभालना, 40 से 50 करीबी सीटों को पलटना और धीरे-धीरे बढ़त लेना. अंदाजा था कि 3 से 5 प्रतिशत का स्विंग या हर बूथ पर करीब 10 नए वोट जोड़ना काफी होगा. लेकिन असल नतीजे इससे कहीं आगे निकले. स्विंग 6 से 8 प्रतिशत तक पहुंच गया और कई सीटों पर हर बूथ पर 15 से 20 नए वोट जुड़े. अनुमान है कि पार्टी ने 2021 के मुकाबले 1.2 से 1.5 करोड़ वोट बढ़ाए. जो रास्ता एक सीमित जीत के लिए तैयार किया गया था, वह एक बड़े चुनावी तूफान में बदल गया.

लेकिन सुनील बंसल की समझ यहीं से शुरू होती है. उन्हें पता था कि जीत का रास्ता संगठन से होकर जाता है. पहले संगठन मजबूत करना होगा, कार्यकर्ताओं का भरोसा जीतना होगा और यह भरोसा भी देना होगा कि नेतृत्व उन्हें राजनीतिक हिंसा से बचाएगा. टिकट बांटते समय इस बात का ध्यान रखा गया कि सिर्फ गंभीर और जमीनी लोग आगे आएं-न कि सेलिब्रिटी चेहरे, आधे-अधूरे नेता या मौके पर दल बदलने वाले. इसके बाद अमित शाह, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने राजनीतिक हिंसा के मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाया. चुनाव आयोग ने भी सुरक्षा के लिए केंद्रीय बलों की तैनाती की. बंसल ने पूर्व केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा को वॉर रूम की जिम्मेदारी दी, जहां से हर स्थिति पर नजर रखी जा रही थी.

दरअसल यह कहानी भाषणों से ज्यादा संगठन की है. जब सुनील बंसल ने जिम्मेदारी संभाली, तब BJP बंगाल में बढ़ तो रही थी, लेकिन अंदर से बंटी हुई थी. तृणमूल कांग्रेस से आए नेताओं ने पहुंच तो बढ़ाई, लेकिन पुराने और नए कार्यकर्ताओं के बीच दूरी भी पैदा कर दी. बंसल ने सबसे पहले इसी पर काम किया. उन्होंने संगठन को फिर से संतुलित किया, पुराने कार्यकर्ताओं को जगह दी और टिकट व जिम्मेदारियों में अनुशासन लाया. उनकी सोच साफ थी-पार्टी को एक मजबूत ढांचे के साथ खड़ा करना, न कि अलग-अलग लोगों के ढीले समूह की तरह चलाना.

उनकी अपनी पृष्ठभूमि भी इसी दिशा में बनी है. संघ के प्रचारक रहे बंसल ने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में काम करते हुए जमीनी संगठन की बारीकियां सीखी थीं. 2014 लोकसभा चुनाव से पहले उन्हें उत्तर प्रदेश में पार्टी को मजबूत करने की जिम्मेदारी मिली. इसके बाद जो नतीजे आए, वे अब BJP की राजनीतिक कहानी का अहम हिस्सा हैं- 2014 में 80 में से 71 सीटें, 2017 में 403 में से 312 सीटें, 2019 में 62 लोकसभा सीटें और 2022 में 255 विधानसभा सीटें. लेकिन इन आंकड़ों से ज्यादा महत्वपूर्ण वह तरीका था, जिसमें बूथ स्तर पर काम और डेटा का इस्तेमाल किया गया.

अगस्त 2022 में बंसल को BJP का राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया और पश्चिम बंगाल, ओडिशा और तेलंगाना की जिम्मेदारी सौंपी गई. ओडिशा में 2024 में BJP ने 21 में से 20 लोकसभा सीटें जीतकर और 147 में से करीब 78 सीटों के साथ सरकार बनाकर अपनी ताकत दिखा दी. लेकिन असली परीक्षा बंगाल थी.

बंगाल में उनकी रणनीति एकदम साफ थी- चुनाव भीड़ और शोर से नहीं, सिस्टम से जीता जाएगा. बूथ ही असली मैदान बना. करीब 80,000 बूथों में से 44,000 को खास फोकस में रखा गया और उन्हें मजबूत, कमजोर और स्विंग श्रेणियों में बांटा गया. हर बूथ पर माइक्रो स्तर के कार्यकर्ता लगाए गए, जहां पन्ना प्रमुखों को 30 से 60 वोटरों की जिम्मेदारी दी गई. यह सिर्फ संपर्क नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का मॉडल था. हर कार्यकर्ता कुछ परिवारों से सीधे जुड़ा और मतदान तक लगातार संपर्क बनाए रखा. BJP, जिसे पहले बाहरी पार्टी माना जाता था, अब घर-घर की मौजूदगी बन गई.

इस माइक्रो स्तर के काम को बड़े पैमाने का साथ मिला. पार्टी ने 1.5 लाख से ज्यादा छोटी बैठकें और कार्यक्रम किए. ये भले ही सुर्खियों में नहीं आए, लेकिन इन्होंने लोगों के साथ लगातार जुड़ाव बनाए रखा. साथ ही, कार्यकर्ताओं को ट्रेनिंग दी गई ताकि वे मतदान और मतगणना के दौरान सटीक तरीके से काम कर सकें. पूरा अभियान वॉर रूम की तरह चला, जहां हर स्तर से जानकारी आती रही और उसी के हिसाब से रणनीति बदली जाती रही.

इस पूरी कोशिश की खास बात यह थी कि सिर्फ उत्तर प्रदेश मॉडल की नकल नहीं हुई, बल्कि उसे बंगाल के हिसाब से ढाला गया. अनुभवी लोग जरूर लाए गए, लेकिन मुद्दे पूरी तरह स्थानीय रखे गए. सांस्कृतिक पहचान, सीमा से जुड़े सवाल और स्थानीय समस्याओं को अभियान का हिस्सा बनाया गया. 2021 के मुकाबले इस बार भाषा और तरीका भी बदला. आक्रामकता को थोड़ा पीछे रखकर संतुलन लाया गया. भ्रष्टाचार, कानून-व्यवस्था और खराब प्रशासन के मुद्दों के साथ-साथ केंद्र की योजनाओं से फायदा पाने वाले लोगों को भी जोड़ा गया.

यही वजह है कि चुनाव दो स्तरों पर लड़ा गया. एक तरफ विकास और कल्याण योजनाओं की बात से नए और उम्मीद रखने वाले वोटर जुड़े, दूसरी तरफ नागरिकता, सीमा और पहचान के मुद्दों ने खास सोच वाले वोटरों को अपनी तरफ खींचा. इस मिश्रित रणनीति ने पार्टी का दायरा बढ़ा दिया. संघ के नेटवर्क के जुड़ने से यह और मजबूत हुआ. स्वयंसेवक बूथ स्तर पर सक्रिय रहे और सहयोगी संगठन अलग-अलग समुदायों में काम करते रहे. इससे विचार और चुनावी रणनीति का मजबूत मेल बना.

अभियान की रफ्तार बंसल की अपनी मेहनत में भी दिखती है. दो साल में उन्होंने 294 सीटों में से हर एक का कम से कम 10 बार दौरा किया, यानी करीब 3,000 दौरे. समन्वय की जिम्मेदारी संभाल रहे भूपेंद्र यादव ने आखिरी छह से आठ महीनों में हर सीट का कम से कम दो बार दौरा किया. यह सिर्फ औपचारिकता नहीं, बल्कि लगातार निगरानी थी.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय नेतृत्व ने बड़ी रैलियों और प्रचार से माहौल जरूर बनाया, लेकिन बंगाल में फर्क यह रहा कि नेतृत्व संगठन का विकल्प नहीं बना, बल्कि उसे और ताकत दी. जो सामने दिख रहा था, उसके पीछे दो साल की लगातार मेहनत थी.

नतीजे इस पूरी रणनीति को साफ तौर पर साबित करते हैं. BJP ने उत्तर बंगाल और जंगलमहल में अपनी पकड़ मजबूत की और गांवों व छोटे शहरों में भी बढ़त बनाई. 85 से 90 प्रतिशत तक पहुंचे मतदान ने उसका साथ दिया, क्योंकि मजबूत संगठन उसे सीधे वोट में बदल सका.

सुनील बंसल ने पश्चिम बंगाल में जो किया, वह किसी फिल्मी कहानी की तरह नहीं था. यह ठोस, सोची-समझी और लगातार की गई मेहनत का नतीजा था. उन्होंने अंदर की अव्यवस्था को खत्म किया, संगठन को मजबूत किया और BJP को एक सिस्टम पर चलने वाली चुनावी मशीन में बदल दिया. यह जीत किसी एक मुद्दे, एक नेता या किसी एक लहर की नहीं, बल्कि संगठन, माइक्रो स्तर की पकड़ और साफ रणनीति के मेल का नतीजा है. संघ से निकले, एबीवीपी में सीखे, उत्तर प्रदेश में आजमाए और ओडिशा में साबित किए गए बंसल के लिए बंगाल अब तक की सबसे बड़ी परीक्षा भी थी और सबसे बड़ी सफलता भी. BJP के लिए यह एक ऐसी सीमा पार करना है, जो कभी मुश्किल लगती थी. और भारतीय राजनीति के लिए यह एक साफ संदेश है-अब चुनाव सिर्फ लड़े नहीं जाते, उन्हें बारीकी से तैयार करके जीता जाता है.

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