अरावली रेंज की नई परिभाषा को लेकर बीते दिनों सरकार पर कई तरह के आरोप लगे. इन सभी का लुब्बेलुबाब यह है कि सरकार अब अरावली की विशाल पहाड़ियों को पूरी तरह खनन के लिए खोल देगी.
इस मसले पर पर्यावरण कार्यकर्ताओं से लेकर आम लोगों तक के बीच भारी आक्रोश देखा गया और सफाई देने के लिए आखिरकार सरकार को सामने आना पड़ा.
इस पूरे विवाद की शुरुआत तब हुई जब सुप्रीम कोर्ट ने सरकार द्वारा प्रस्तावित अरावली की नई परिभाषा को स्वीकार कर लिया. इसके मुताबिक केवल वे पहाड़ियां जो स्थानीय तल से 100 मीटर ऊंची होंगी, उन्हें 'अरावली पहाड़ियां' माना जाएगा. एक-दूसरे से 500 मीटर के दायरे में दो या अधिक ऐसी पहाड़ियां और उनके बीच की जमीन को अरावली पर्वतमाला माना जाएगा.
ये पहाड़ियां राजस्थान, गुजरात, हरियाणा और दिल्ली में फैली हुई हैं.विवाद के केंद्र में कुछ सरल लेकिन भावनात्मक सवाल हैं: अरावली पर्वतमाला ठीक-ठीक क्या है? ऊंचाई कैसे तय की जाएगी? क्या पहाड़ियों के 90 फीसदी हिस्से को खनन और निर्माण के लिए खोल दिया जाएगा?
22 दिसंबर को प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने आरोपों के पहाड़ पर सफाई देने की कोशिश की. मंत्री ने कुछ संतोषजनक जवाब तो दिए, लेकिन अवैध खनन को लेकर कुछ प्रमुख चिंताओं से बचते नजर आए. कुछ जवाब तो पूरी तरह से गोलमोल जवाब साबित हुए.
आरोपों पर मोदी सरकार के जवाब :
आरोप : अरावली को केवल ऊंचाई के आधार पर परिभाषित करने से बेजा खनन और निर्माण गतिविधियां शुरू हो जाएंगी.
केंद्र का बचाव: भूपेंद्र यादव ने जोर देकर कहा कि वैज्ञानिक प्रबंधन योजना तैयार और मंजूर होने तक अरावली में कहीं भी नए खनन पट्टे जारी नहीं किए जाएंगे. उन्होंने कहा कि अरावली के कुल 1.44 लाख वर्ग किमी क्षेत्र में से केवल 0.19 फीसदी ही खनन के लिए योग्य है. इसमें भी खनन को केवल असाधारण और वैज्ञानिक रूप से उचित परिस्थितियों में ही अनुमति दी जाएगी. उन्होंने रणनीतिक खनिजों और परमाणु ऊर्जा संबंधी जरूरतों के लिए अपवाद की बात भी कही. यादव ने कहा कि कोई 'रियल एस्टेट शार्क' को नहीं छोड़ा जाएगा.
इसे संतोषजनक जवाब कहा जा सकता है. मंत्री ने स्पष्ट रूप से कहा कि कोई नई लाइसेंस जारी नहीं होंगे और पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र में बड़े पैमाने पर खनन की आशंकाओं को कम किया.
आरोप : कार्यकर्ताओं ने 100 मीटर की परिभाषा से बाहर होने वाले क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर अवैध खनन और भविष्य में खनन की आशंका जताई है.
केंद्र का बचाव : पर्यावरण मंत्री ने कहा कि नई व्यवस्था अवैध खनन पर अंकुश लगाने और "कानूनी रूप से टिकाऊ खनन" की अनुमति देने के लिए है. उन्होंने कहा कि ड्रोनों के इस्तेमाल से अवैध गतिविधियों पर सख्त निगरानी होगी.
इसे आधा-अधूरा जवाब कहा जाएगा. अवैध खनन को कैसे रोका जाएगा, भूपेंद्र यादव इस पर संतोषजनक जवाब नहीं दे पाए और सीधा जवाब टाल गए. इसके बजाय उन्होंने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि पिछली सरकार ने राजस्थान में बड़े पैमाने पर अवैध खनन की अनुमति दी थी.
आरोप : पर्यावरण कार्यकर्ताओं की सबसे बड़ी चिंता यह है कि नई परिभाषा से पर्वतमाला का बहुत बड़ा हिस्सा (लगभग 90 फीसदी) अब अरावली नहीं माना जाएगा. इससे बड़े पैमाने पर गैर-वन गतिविधियों के दरवाजे खुल जाएंगे.
केंद्र का बचाव: प्रेस कॉन्फ्रेंस में भूपेंद्र यादव ने सिर्फ इतना कहा कि वर्तमान में अरावली क्षेत्र का केवल 217 वर्ग किमी ही खनन के लिए योग्य है. उन्होंने यह भी जोर दिया कि नई परिभाषा के अनुसार, पूरे भू-आकार, जिसमें पहाड़ी का आधार, ढलान और संबंधित विशेषताएं शामिल हैं, न कि केवल निरपेक्ष ऊंचाई, को संरक्षित किया जाएगा.
यह गोलमोल जवाब था. मंत्री यह स्पष्ट जवाब नहीं दे पाए कि कितनी पहाड़ियां संरक्षित होंगी और कितनी प्रभावित. कोई निश्चित संख्या नहीं दी गई. वास्तव में, वन सर्वेक्षण ऑफ इंडिया की 2010 की रिपोर्ट में खुलासा हुआ था कि पर्वतमाला में लगभग 12,000 पहाड़ियों में से केवल 8 फीसदी ही 100 मीटर से ऊंची हैं. तो बाकी 92 फीसदी पहाड़ियों का क्या होगा?
इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में भूपेंद्र यादव ने अरावली मामले से जुड़े विवादास्पद मुद्दों को स्पष्ट करने की कोशिश की. हालांकि, उनके कुछ जवाब संतोषजनक थे, कुछ आधे-अधूरे लगे. इसके अलावा, उन्होंने अवैध खनन से जुड़ी चिंताओं को पूरी तरह से दूर नहीं किया.

