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जंग के बीच दुनिया भर के बाजारों में गिरावट लेकिन अमेरिकी हथियार कंपनियां कमा रहीं बड़ा मुनाफा!

अमेरिका-इजरायल के ईरान पर हमले के बाद शुरू हुई जंग के कारण एक तरफ दुनिया भर के बाजारों में तेज गिरावट हो रही है. वहीं, दूसरी ओर हथियार बेचने वाली 5 बड़ी अमेरिकी कंपनियों के शेयर तेजी से बढ़े हैं

जंग के बीच अमेरिकी डिफेंस कंपनियों के शेयरों की कीमतें बढ़ रही हैं
जंग के बीच अमेरिकी डिफेंस कंपनियों के शेयरों की कीमतें बढ़ रही हैं
अपडेटेड 13 मार्च , 2026

अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी जंग का असर पूरी दुनिया में दिखने लगा है. भारत के अलग-अलग शहरों में लोग LPG गैस सिलेंडर के लिए लंबी कतारों में खड़े नजर आ रहे हैं. कहीं तेल, कहीं गैस तो कहीं खाने-पीने के सामानों की सप्लाई पर काफी बुरा असर पड़ा है.

नतीजा यह है कि दुनियाभर के शेयर बाजारों में तेजी से गिरावट हो रही है, लेकिन इसके ठीक उलट अमेरिकी डिफेंस कंपनियों के स्टॉक तेजी से बढ़ रहे हैं. जंग शुरू होने के बाद शुरुआती एक हफ्ते में ही अमेरिकी एयरोस्पेस और डिफेंस कंपनी नॉर्थरॉप ग्रुमन के शेयर में करीब 5-6 फीसद की बड़ी वृद्धि हुई.

वहीं, डिफेंस कंपनी RTX के शेयर में 4.5-4.7 फीसद और लॉकहीड मार्टिन के शेयर में 3-3.4 फीसद का इजाफा हुआ. इन कंपनियों के शेयर तब बढ़ रहे थे, जब दुनियाभर के बाजार को मंदी का डर सता रहा था. इन आंकड़ों ने एक बार फिर इस बहस को तेज कर दिया है कि क्या हर बार की तरह इस बार भी अमेरिका जंग भड़काकर मुनाफा कमाना चाहता है? डिफेंस सेक्टर से जुड़े डेटा और एक्सपर्ट्स के जरिए इस सवाल का जवाब जानने की कोशिश करते हैं-

हथियार कंपनियों के अधिकारियों के साथ ट्रंप की बैठक

7 मार्च को अमेरिका-ईरान जंग शुरू हुए एक सप्ताह हो गए थे. अमेरिकी हमले के जवाब में अमेरिकी बेस पर ईरान की ओर से जोरदार मिसाइल हमले हो रहे थे. जंग को महज कुछ दिनों में खत्म करने का दावा करने वाली अमेरिकी सरकार अब जंग कुछ महीने तक चलने की बात कह रही थी. इसका असर दुनियाभर के बाजारों पर दिख रहा था.

इन सबके बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस में हथियार कंपनियों के CEO के साथ एक बैठक की. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस बैठक में सरकार और कंपनियों की ओर से हथियारों के उत्पादन को चार गुना करने पर सहमति जताई गई.

इस बैठक में डिफेंस सेक्टर से जुड़ी कंपनी RTX (पूर्व में रेथियॉन), लॉकहीड मार्टिन, बोइंग, नॉर्थरॉप ग्रुमन, BAE सिस्टम्स, एल3हैरिस मिसाइल सॉल्यूशंस और हनीवेल एयरोस्पेस के मुख्य कार्यकारी अधिकारी शामिल हुए. ये कंपनियां अमेरिकी GDP ग्रोथ में अहम भूमिका निभाती हैं. दुनियाभर के बाजारों में इन कंपनियों का दबदबा है. इतना ही नहीं इन कंपनियों के मार्केट कैप तो कई देशों की GDP से भी ज्यादा हैं.

उदाहरण के लिए नेपाल की GDP 2025-2026 में 49 अरब डॉलर और म्यांमार की GDP 2024-25 में 79 अरब डॉलर थी. जबकि 2024 में ही अमेरिकी हथियार कंपनी लॉकहीड मार्टिन का मार्केट कैप 115 अरब डॉलर से ज्यादा था.

अमेरिकी हथियार कंपनियों के शेयरों में तेजी

जंग के बाद बाजार में किसी और सामान की बिक्री हो या न हो, लेकिन हथियारों की बिक्री जरूर बढ़ती है. यही कारण है कि जंग के बाद सिर्फ अमेरिका नहीं, बल्कि दुनियाभर की हथियार कंपनियों के शेयर बढ़ते हैं. चूंकि दुनिया के बाजार में अमेरिकी हथियार कंपनियों का दबदबा है, इसलिए उन्हें इसका ज्यादा फायदा मिलता है.

डिफेंस सेक्टर से जुड़ी वेबसाइट SIPRI ने भी दावा किया है कि 2021 से 2025 के बीच अमेरिका ने दुनिया में सबसे ज्यादा हथियार बेचे हैं. अमेरिकी कंपनियों का दुनिया के 42 फीसद डिफेंस मार्केट पर कब्जा है. जंग के बाद अमेरिकी हथियार कंपनियों को कितना फायदा मिला, इसे उन कंपनियों के शेयर की कीमत से समझ सकते हैं.

31 दिसंबर 2025 को LMT कंपनी के एक शेयर की कीमत अमेरिकी बाजार में करीब 483 डॉलर थी, जो 11 मार्च को करीब 649 डॉलर हो गई. मतलब साफ है कि महज ढाई महीने में करीब 35 फीसद का इजाफा हुआ. अमेरिका ने जनवरी से ही जंग का माहौल (तनाव) बनाना शुरू कर दिया था, तभी से इन कंपनियों के शेयर बढ़ने लगे थे.

इसी तरह एक अन्य हथियार कंपनी नॉर्थरॉप ग्रुमन कॉर्पोरेशन का शेयर 31 दिसंबर को 570 डॉलर पर था, जो अब 733 डॉलर के करीब है. मतलब इस कंपनी के शेयर में करीब 28 फीसद की वृद्धि हुई. RTX कंपनी का शेयर करीब 14 फीसद और अमेरिकी हथियार कंपनी LHX के शेयर में 25 फीसद का इजाफा हुआ है. इसके अलावा, जनरल डायनेमिक्स कॉर्पोरेशन कंपनी के शेयर में 5 फीसद की वृद्धि हुई है.

सबसे ज्यादा रक्षा बजट वाले 5 देश
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क्या अपने फायदे के लिए जंग भड़काता है अमेरिका?

रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल जेएस सोढ़ी का कहना है कि चीन की इकोनॉमी मैनुफैक्चरिंग बेस्ड है, जबकि अमेरिका की इकोनॉमी डिफेंस एक्सपोर्ट बेस्ड है, जिसे वॉर इकोनॉमी भी कहते हैं. दुनिया के किसी भी हिस्से में जंग शुरू हो, अमेरिका सबसे पहले उसमें कूदता है. अमेरिका शांति के बजाय जंग चाहता है क्योंकि जंग के दौर में हथियार की बिक्री बढ़ती है. हथियार बेचने वाली 10 में से 6 बड़ी कंपनियां अमेरिका की है.

1776 जब से अमेरिका आजाद हुआ, तब से आज तक 214 से ज्यादा जंग में अमेरिका ने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर हिस्सा लिया है. हर जंग में उसने किसी न किसी पक्ष को हथियार सप्लाई किए हैं. अमेरिका की इकोनॉमी को वॉर इकोनॉमी इसलिए भी कहते हैं क्योंकि अमेरिकी हथियार कंपनियां हर साल 10 करोड़ डॉलर से ज्यादा का चंदा जमा करती हैं.

चंदे का यह पैसा औपचारिक यानी कानूनी तौर पर हथियारों को बेचने की लॉबिंग में खर्च होता है. इन लॉबिंग में अमेरिकी सांसद भी शामिल होते हैं. मतलब यह कि हथियार बेचने के लिए अमेरिका में लॉबिंग किया जाना कानूनी तौर पर वैध है. सोचिए यही हथियार किसी देश में किसी बच्चों, महिलाओं और वृद्धों की जान लेते हैं. अमेरिका की इकोनॉमी हथियार बेचकर चलती हैं. वहां राष्ट्रपति चाहे कोई भी हों, लेकिन दुनिया के किसी ना किस्सी हिस्से के जंग में अमेरिका जरूर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष शामिल होता है.

खासकर दूसरे कार्यकाल में अमेरिकी राष्ट्रपति जमकर जंग को बढ़ावा देते हैं, क्योंकि अमेरिकी संविधान में एक नेता सिर्फ दो बार ही राष्ट्रपति बन सकते हैं.

वहीं, डिफेंस एक्सपर्ट मनोज जोशी ने कहा, मुझे नहीं लगता अमेरिका हथियार बेचने के लिए जंग भड़काता है. इसके कई और जियो पॉलिटिकल कारण भी होते हैं." उन्होंने अमेरिकी इकोनॉमी को वॉर इकोनॉमी मानने से इनकार किया.

उनका कहना है कि फ्रांस या दूसरे यूरोपीय देशों की तरह अमेरिका में हथियार कंपनियों और हथियार बेचने के मामले में सरकार का सीधा दखल नहीं होता. इतना ही नहीं अमेरिका किसी भी देश को हथियार कई नियमों के साथ देता है. अमेरिका हर देश को हथियार बेचता भी नहीं है. अगर भारत की ही बात करें तो अमेरिका ने भारत को ज्यादातर डिफेंसिव हथियार दिए हैं.

जोशी के मुताबिक, अमेरिका ने ज्यादातर देशों को आक्रमण करने वाले हथियार नहीं दिए हैं. पाकिस्तान को अगर F16 दिए भी हैं तो कड़े नियम और पाबंदी के साथ. हालांकि, जोशी मानते हैं कि जंग के कारण दुनिया में हथियारों की खरीद बढ़ती है और इसका बड़ा हिस्सा अमेरिकी कंपनियों तक पहुंचता है.

क्या अमेरिका ने इससे पहले किसी जंग में फायदा हासिल किया है?

रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल जेएस सोढ़ी के मुताबिक, 1980 दशक की शुरुआत में ईरान और इराक के बीच जंग शुरू हुई. इराक का आरोप था कि ईरान उसके यहां मौजूद कुर्द विद्रोहियों को पैसा और हथियार दे रहा है. इसी आरोप के तहत ईरान और इराक के बीच भीषण जंग शुरू हुई.

सोढ़ी आगे बताते हैं कि ज्यादातर पश्चिमी देश इस जंग से दूर थे, लेकिन अमेरिका ने इस जंग में अप्रत्यक्ष तौर पर दखल देना शुरू कर दिया. येल रिव्यू ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के मुताबिक, अमेरिका ने एक तरफ इराक का समर्थन किया. दूसरी तरफ ईरान सरकार को हथियार बेचना शुरू कर दिया.

1985 में यह घटना ईरान-कॉन्ट्रा कांड के तौर पर सामने आई, तो दुनिया हैरान रह गई. दरअसल, 1980 के दशक में ही अमेरिकी महाद्वीप के देश निकारागुआ में गृहयुद्ध शुरू हो गया. सोमोजा तानाशाही के पतन के बाद निकारागुआ में वामपंथी सैंडिनिस्टा (FSLN) सरकार के खिलाफ विद्रोह शुरू हुआ. अमेरिकी समर्थित दक्षिणपंथी विद्रोही समूह कॉन्ट्रास ने इस विरोध की शुरुआत की.

ऐसा माना जाता है कि निकारागुआ में वामपंथी सरकार ने कई अमेरिकी लोगों को गिरफ्तार कर लिया था. उन्हें छुड़ाने के लिए अमेरिका ने विद्रोही समूह कॉन्ट्रास से हाथ मिलाया. इतना ही नहीं ईरान को हथियार बेचकर भी अमेरिका ने इन समूह को आर्थिक मदद दी थी. इस तरह अमेरिका ने ईरान-इराक युद्ध के दौरान एक बड़ी ही विरोधाभासी भूमिका निभाई. परिणाम यह हुआ कि जंग से ईरान-इराक को तो भारी नुकसान उठाना पड़ा वहीं अमेरिका को सामरिक और मुनाफे के लिहाज से काफी फायदा हुआ.

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