
“प्राइवेट कंपनियों की तुलना में सरकार 95 फीसद नौकरियों के लिए पांच गुना अधिक सैलरी दे रही है, जबकि उसके कामकाज की चाल अभी भी 1950 के दशक की एम्बेसडर कार जैसी ही है.”
यह बात भारतीय अर्थशास्त्री और कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर कार्तिक मुरलीधरन ने कही है. हालांकि, उनकी इस बात से कोई सहमत या असहमत हो सकता है.
कुछ रिसर्च तो ये भी दावा करती हैं कि प्राइवेट कर्मचारियों की सैलरी सरकारी कर्मियों से ज्यादा होती है. सरकारी रिपोर्ट के जरिए इसकी भी सच्चाई जानेंगे, लेकिन उससे पहले 8वें वेतन आयोग के बारे में जानते हैं -
8वां वेतन आयोग कब से लागू होने की संभावना है?
7वें वेतन आयोग का कार्यकाल 31 दिसंबर 2025 को खत्म हो चुका है. 1 जनवरी 2026 से 8वें वेतन आयोग के लागू होने की संभावना जताई जा रही थी. हालांकि, 3 नवंबर को भारत सरकार ने 8वें वेतन आयोग पर रिपोर्ट देने के लिए एक कमेटी बनाई है. इस कमेटी को 18 महीने में रिपोर्ट सौंपना है. उम्मीद है कि 2027 में यह कमेटी रिपोर्ट पेश कर दे.
इस रिपोर्ट के जमा होने के करीब 3 से 6 महीने बाद 8वां वेतन आयोग लागू हो सकता है. मतलब साफ है कि 2027 के अंत या 2028 की शुरुआत में 8वां वेतन आयोग लागू हो सकता है. हालांकि, 7वें वेतन आयोग के गठन के बाद भी इसे लागू होने में दो साल का समय लगा था.
यहां ये जानना जरूरी है कि वेतन आयोग एक सरकारी समिति होती है, जो सरकार को महंगाई भत्ता, हाउस रेंट अलाउंस, पेंशन आदि में बदलाव का सुझाव देता है.
8वें वेतन आयोग से केंद्रीय कर्मियों की वेतन में कितनी वृद्धि हो सकती है?
8वें वेतन आयोग के बाद सैलरी कितनी बढ़ेगी, इसको लेकर अलग-अलग अनुमान लगाया जा रहा है. छठे वेतन आयोग के बाद औसत सैलरी 40 फीसद तक बढ़ी थी. वहीं, 7वें वेतन आयोग के बाद औसत सैलरी 25 फीसद तक बढ़ी.
यहां ध्यान रखने वाली बात ये है कि सैलरी कितनी बढ़ेगी ये फिटमेंट फैक्टर पर निर्भर करता है. पिछली बार ये 2.56 था, जबकि इस बार फिटमेंट फैक्टर 1.83 से 2.46 तक रहने की संभावना है.
इस लिहाज से कुछ एक्सपर्ट्स का कहना है कि केंद्रीय कर्मियों की सैलरी 35 फीसद तक बढ़ सकती है. एंबिट कैपिटल और कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज ने कुछ महीने पहले जो रिसर्च रिपोर्ट जारी की है, उनके मुताबिक प्रभावी वेतन वृद्धि 13 फीसद से 34 फीसद तक हो सकती है. इससे सरकारी खजाने पर हर साल अतिरिक्त ₹2.4 लाख करोड़ से ₹3.2 लाख करोड़ तक अनुमानित बोझ पड़ेगा. यह देश के GDP का लगभग 0.6-0.8 फीसद है.
क्या सरकारी कर्मियों की सैलरी प्राइवेट कर्मचारियों से ज्यादा होती है?
इसको लेकर एक्सपर्ट्स की अलग-अलग राय हैं. सातवें वेतन आयोग से पहले IIM अहमदाबाद ने एक रिसर्च रिपोर्ट जारी की थी, जिसके आधार पर ही 7वें वेतन आयोग ने सरकारी कर्मियों की सैलरी तय की थी.
इस रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्र सरकार के निचले स्तर के स्थाई कर्मचारियों को प्राइवेट सेक्टर के उसी काम को करने वाले कर्मचारियों की तुलना में काफी ज्यादा सैलरी मिलती है. हालांकि, ग्रेड A या उच्च स्तर के कर्मचारियों के मामले में स्थिति इसके ठीक उलट है.
2015 में की गई इस स्टडी के मुताबिक, उस समय सरकारी ड्राइवर का औसत वेतन करीब 18 हजार रुपये था, जो तब मार्केट के हिसाब से करीब दोगुना था. लेकिन लेवल 10 सरकारी अधिकारियों की सैलरी की बात करें, तो उनकी तुलना में कॉर्पोरेट मैनेजर आगे थे.
इस रिसर्च में सरकारी और गैर-सरकारी क्षेत्र में काम करने वाले नर्सों, शिक्षकों, वैज्ञानिकों, इलेक्ट्रीशियनों, ड्राइवरों और क्लर्कों समेत 40 तरह के काम करने वाले कर्मचारियों की सैलरी की तुलना की थी.

95 फीसदी सरकारी कर्मियों को ज्यादा पैसा देने से खजाने पर असर
अर्थशास्त्री कार्तिक मुरलीधरन ने भारत के सरकारी क्षेत्र के कर्मचारी भर्ती मॉडल की कड़ी आलोचना करते हुए कहा है कि सरकार 95 फीसद नौकरियों के लिए प्राइवेट से पांच गुना ज्यादा भुगतान कर रही है, जबकि उसका कामकाज अभी भी पुराने जमाने की तर्ज पर चल रहा है. हालांकि, मुरलीधरन मानते हैं कि सरकार के 5 फीसद बड़े सरकारी अधिकारियों जैसे- कैबिनेट सचिव, सचिव आदि की तुलना में प्राइवेट कंपनियों के सीईओ, मैनेजर को ज्यादा सैलरी मिलती है.
उन्होंने समझाया कि सरकारी संस्थाओं का आउटपुट कम होने और कर्मचारियों को ज्यादा वेतन देने से कई तरह की समस्याएं पैदा हो सकती हैं. जैसे सरकारी संसाधन का बड़ा हिस्सा कुछ ही कर्मचारियों पर खर्च हो जाता है, जिससे सरकारी खजाने में और कर्मचारियों को नियुक्त करने के लिए पैसे नहीं बचते.
मुरलीधरन ने कहा कि भारत के शीर्ष अधिकारी दुनिया के सर्वश्रेष्ठ अधिकारियों में से हैं, जिनका चयन सबसे कठिन परीक्षाओं के माध्यम से होता है. उनके पास शासन का शानदार अनुभव है. फिर भी इन अधिकारियों को पुरानी संरचनाओं के भीतर काम करने के लिए मजबूर किया जाता है, जिससे सरकार के आउटपुट पर असर होता है.
उदाहरण के लिए एजुकेशन सेक्टर को लीजिए, प्राइवेट की तुलना में सरकारी शिक्षकों को अच्छा वेतन मिलता है, लेकिन उनमें से आधे काम पर नहीं आते. 25 फीसदी अनुपस्थित रहते हैं और 25 फीसदी जो स्कूल में होते हैं वे पढ़ाते नहीं.
सरकारी नौकरी में वेतन के अलावा भी कई सुविधाएं
सरकारी नौकरियों में महीने की सैलरी के अलावा भी कई लाभ मिलते हैं. इनमें जॉब सिक्योरिटी, पेंशन की गारंटी, हाउस रेंट अलाउंस आदि शामिल हैं, जो निजी क्षेत्र के कर्मचारियों को अक्सर नहीं मिलतीं.
आयोग का मानना था कि ये अतिरिक्त लाभ सरकारी नौकरी के महत्व को और ज्यादा बढ़ा देते हैं. अकेले पेंशन ही नौकरी के बाद बड़ी वित्तीय सहायता प्रदान करती है. इसके अलावा अगर जॉब सिक्योरिटी के लिहाज से देखें तो पूरा जॉब पैकेज बहुत मजबूत हो जाता है. यही कारण है कि सरकारी नौकरी को सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़कर भी भारतीय लोग देखते हैं.
क्या 8वें वेतन आयोग से सरकारी और प्राइवेट नौकरियों के वेतन में और असमानता बढ़ेगी?
7वें वेतन आयोग के लिए कराए गए IIM अहमदाबाद की रिपोर्ट से तो ऐसा ही लगता है. 95 फीसद नौकरियों में 8वें वेतन आयोग के लागू होने के बाद प्राइवेट नौकरियों से और ज्यादा वेतन बढ़ जाएगा.
इससे मिडल और जूनियर लेवल की नौकरियों में वेतन असमानता बढ़ेगी. हालांकि, सरकार के 5 फीसदी बड़े अधिकारियों का वेतन फिर भी प्राइवेट कंपनियों के सीईओ या मैनेजर से कम होगा. यह बात अलग है कि सरकारी नौकरी में जॉब प्रेशर प्राइवेट की अपेक्षा कम होते हैं.
संभवत: यह एक कारण हो सकता है कि भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने बीते दिनों देश की प्राइवेट कंपनियों से कर्मचारियों का वेतन बढ़ाने की अपील की है.
यह अपील ऐसे समय में की गई है, जब उपभोग में भारी गिरावट आई है. उन्होंने कहा कि कंपनियों की आय बढ़ी है, लेकिन उस अनुपात में प्राइवेट कर्मियों की सैलरी नहीं बढ़ी. इससे समाज के निम्न और मध्यम वर्ग के लोगों की आमदनी नहीं बढ़ी है. इसे ठीक करने के लिए कंपनियों को बी और सी ग्रेड के कर्मियों की सैलरी बढ़ानी होगी.
इतना ही नहीं वार्षिक आर्थिक सर्वेक्षण 2025 में कहा गया है, "समझदारी और दीर्घकालिक सोच के लिए प्राइवेट कंपनियों को अपने हर लेवल के कर्मचारियों के वेतन को बढ़ाना चाहिए.”
प्राइवेट और सरकारी नौकरियों की सैलरी तुलना करने पर आपत्ति क्यों?
कुछ लोगों को सरकारी और गैर-सरकारी सेक्टर की सैलरी तुलना करने पर आपत्ति है. ऐसा इसलिए क्योंकि छठे वेतन आयोग ने इस मामले में साफ कहा था कि प्राइवेट कंपनियों का मुख्य फोकस लाभ कमाना होता है, जबकि सरकारी संस्थाओं का यह लक्ष्य नहीं है. इसलिए यह तुलना सही नहीं है.
इसका अर्थ यह है कि चूंकि निजी कंपनियां मुख्य रूप से लाभ कमाने पर ध्यान केंद्रित करती हैं, इसलिए उनकी वेतन संरचनाएं और लक्ष्य सरकार से मौलिक रूप से भिन्न होते हैं.
मतलब साफ है कि प्राइवेट कंपनी ज्यादा लाभ कमाएगी तो उसे एक ही काम के लिए सरकारी कर्मचारियों की तुलना में ज्यादा सैलरी देना चाहिए. लेकिन, ऐसा नहीं है तो गलत है. भारत में एक ही काम के लिए 95 फीसद नौकरियों में सरकारी संस्थाएं कम लाभ कमाकर भी ज्यादा सैलरी देती हैं. वहीं, प्राइवेट कंपनियां ज्यादा लाभ कमाकर भी कम सैलरी देती हैं.
ध्यान रखने वाली बात ये है कि 5 फीसदी बड़े अधिकारी लंबे समय से प्राइवेट की तर्ज पर सैलरी बढ़ाने की मांग करते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि उन्हें लगता है कि प्राइवेट कंपनी के मैनेजर से उन्हें कम पैसा मिलता है. हालांकि, इनके वेतनमानों में संशोधन करने की मांग पर आयोग ने इस बात पर जोर दिया कि इन भिन्न उद्देश्यों के कारण प्रत्यक्ष, एकसमान तुलना करना स्वभाविक रूप से गलत है.
इस तरह के सवालों पर एक जवाब इंस्टीट्यूट फॉर फिस्कल स्टडीज (IFS) ने भी दिया है. IFS के मुताबिक, उच्च शिक्षित पेशेवर को श्रम बाजार में उच्च वेतन मिलता है. इसलिए सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की औसत आय की तुलना करने में समस्या यह है कि उच्च शिक्षित पेशेवरों से अधिक आय की उम्मीद की जाती है.
अर्थशास्त्री कार्तिक मुरलीधरन का कहना है कि भारत के सरकारी नौकरी में भर्तियों के लिए परीक्षा होती है, उन परीक्षाओं में प्रोफेशनल स्किल टेस्ट नहीं लिया जाता. ऐसे में अधिकारियों तक की नौकरी में जाने वाले युवा कम प्रोफेशनल होते हैं. इसलिए इनकी सैलरी अनुभवी प्रोफेशनल की तुलना में कम होती है. ऐसा सिर्फ 5 फीसद बड़े स्तर के पदों पर होता है. बाकी 95 फीसद नौकरियों में प्राइवेट सेक्टर के कर्मचारियों की सैलरी कम है.
भारत में प्राइवेट और सरकारी दोनों नौकरियों में आय की असमानता
आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) डेटा के मुताबिक, देश में प्राइवेट और सरकारी दोनों ही नौकरियों में आय की असमानता है. व्यक्तिगत आय को चार आय श्रेणियों में बांटा गया है- 1. शीर्ष एक फीसदी आय वाले लोग 2. शीर्ष 10 फीसदी आय वाले लोग 3. निचले 50 फीसदी आय वाले लोग 4. सबसे कम 10 फीसदी आय वाले लोग.
यह रिसर्च भारत के श्रम बाजार में आय असमानता के रुझानों को और साफ करता है. औसत आय 2017-18 में ₹102,000 से बढ़कर 2023-24 में ₹144,000 हो गई, जो 5.92 फीसद की वार्षिक वृद्धि दर से बढ़ी.
इन आंकड़ों से परे जाकर देखें तो आय का असमान वितरण साफ नजर आता है. शीर्ष 1 फीसदी आय वर्ग में आने वालों की मासिक आय ₹50,000 से बढ़कर ₹75,000 हो गई (6.99% की CAGR), जबकि शीर्ष 10 फीसदी आय वर्ग में आने वालों की आय ₹25,000 से बढ़कर ₹32,000 हो गई, जो 4.20% की CAGR से बढ़ी.
इसके विपरीत, निम्नतम 50 फीसदी आय सीमा में अपेक्षाकृत मामूली वृद्धि हुई, जो ₹8,500 से बढ़कर ₹12,000 (5.92% CAGR) हो गई, जबकि सबसे कम 10 फीसद आय सीमा में सबसे कम वृद्धि दर्ज की गई, जो ₹3,200 से बढ़कर ₹3,900 (3.35% CAGR) हो गई.
CAGR, चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर को शॉर्ट में कहते हैं. इसका इस्तेमाल आमतौर पर यह निर्धारित करने के लिए किया जाता है कि कोई व्यवसाय अत्यधिक प्रतिस्पर्धी बाजार में कितना अच्छा प्रदर्शन कर रहा है.

