एक जमाने से सिंगापुर आइ, सेंटोसा द्वीप, लिटिल इंडिया और ऑरचर्ड स्ट्रीट इस द्वीप की प्रसिद्धि के प्रतीक रहे हैं. 2010 में शिक्षा के क्षेत्र में सरकार के आठ करोड़ सिंगापुरी डॉलर (360 करोड़ रु.) का निवेश देखकर लगता है कि सिंगापुर अपनी प्रसिद्धि की सूची में एकाध उपलब्धियां और जोडऩे की चाहत रखता है.
सिंगापुर के 18 विश्वविद्यालय और अकादमिक संस्थान विश्वस्तरीय हैं. नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर (एनयूएस) को क्यूएस 2012 के सर्वे में एशिया का दूसरा सबसे बढिय़ा संस्थान बताया गया है और 2011 में क्यूएस इनसीड बिजनेस स्कूल को एशिया-प्रशांत क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ बिजनेस स्कूल का खिताब दे चुका है. इनसीड ने भारतीय प्रबंधन संस्थान, अमदाबाद को दूसरे स्थान पर धकेल दिया था.
हर साल 5,000 से ज्यादा भारतीय छात्र सिंगापुर में उच्च शिक्षा के लिए जाते हैं, लेकिन वे सिर्फ संस्थानों की रैंकिंग से आकर्षित नहीं होते. साठ से ज्यादा समुद्र तट, बेहतरीन परिवहन व्यवस्था और अलग-अलग छात्र समुदाय के कारण यहां छात्रों का आकर्षण कई गुना बढ़ जाता है. सिंगापुर इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट में बीबीए की पढ़ाई कर रहे 19 वर्षीय फराज पीरभाई कहते हैं, ‘‘सिंगापुर छात्रों को उनके नेतृत्वकारी गुणों को मांजने का अवसर देता है और असली दुनिया के लिए तैयार करता है.’’
मलेशिया के करीब होने से यहां तमिल का भी असर है और चीन का तो है ही, इस वजह से छात्रों को यहां की सांस्कृतिक विविधता भाती है. नान्यांग टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी (एनटीयू) से पढ़ चुकीं 27 वर्षीया कीर्ति जाडेजा कहती हैं, ‘‘आप कनाडियन बी फ स्टू खा सकते हैं, जापानी चावल की वाइन पी सकते हैं, नाइजीरियाई छात्रों के साथ पढ़ाई कर सकते हैं और ब्राजीलवासियों के साथ पार्टी कर सकते हैं-और ये सब कुछ सिर्फ एक ही दिन में. ऐसा लगता है कि दुनिया की सैर पर निकले हों और साथ ही एक विश्वस्तरीय डिग्री भी मिल रही हो. ’’ कुछ लोगों को यहां का अंतरराष्ट्रीय माहौल भाता है तो कुछ दूसरों को उदारवादी शिक्षा भाती है. एनयूएस की छात्रा वसुधा थिरानी कहती हैं, ‘‘एनयूएस में मुझे मुख्य विषय अर्थशास्त्र के साथ ही क्वान्टम मेकैनिक्स से लेकर शीत युद्ध के इतिहास तक जैसे कई पाठ्यक्रमों को पढऩे की आजादी मिल गई है. यह काफी प्रेरणादायक है.’’
मुंबई स्थित एजुकेशन कंसल्टेंसी फर्म एडवाइस इंटरनेशनल के निदेशक सुशील सुखवाणी कहते हैं, ‘‘सिंगापुर में पढऩे के लिए एप्लाई करने वाले भारतीय छात्रों की संख्या 2009 से लगातार बढ़ रही है. ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि सिंगापुर ग्लोबल फाइनेंशियल सेंटर बन चुका है और कई बहुराष्ट्रीय कंपनियों का एशिया मुख्यालय यहीं है. खासकर बिजनेस और मैनेजमेंट में पढऩे वाले छात्रों के लिए सिंगापुर बढिय़ा शुरुआती मंच उपलब्ध कराता है.’’
सिंगापुर में 16 से ज्यादा अग्रणी विदेशी विश्वविद्यालयों ने अपना सेंटर ऑफ एक्सिलेंस खोल लिया है जिनकी मदद से सिंगापुर में बैठे-बैठे छात्र अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया की डिग्रियां हासिल कर सकते हैं. सुखवाणी कहते हैं, ‘‘फाइनांस, मैनेजमेंट, बिजनेस प्रशासन, लेखा, लॉ और अर्थशास्त्र पढऩे के इच्छुक छात्रों के लिए सिंगापुर लोकप्रिय जगह बन चुका है. स्कॉलरशिप और एजुकेशन लोन के रूप में भारतीय छात्रों को काफी आर्थिक मदद भी दी जा रही है.’’
सिंगापुर सस्ता शहर कतई नहीं है, लेकिन यहां पढऩे की फीस और रहने का खर्च पश्चिम के मुकाबले अब भी किफायती है. इसके आकर्षण की एक और वजह यह है कि यह भारत से करीब है. एशियाई देश होने के कारण भारतीय छात्रों को यहां के वातावरण में खुद को ढालने में आसानी होती है. एनटीयू में अंतरराष्ट्रीय मामलों के उपनिदेशक प्रोफेसर एर मेंग प्रा कहते हैं, ‘‘एनटीयू के पास प्रोफेशनल सेवाओं और कंसल्टेंट्स का एक नेटवर्क है जो विदेशी छात्रों को यूनिवर्सिटी के माहौल से एकाकार होने में मदद करता है और यह सुनिश्चित करता है कि उनकी पढ़ाई ज्यादा से ज्यादा उपयोगी और तनावरहित हो. छात्र मामलों के दफ्तर में इंटरनेशनल स्टुडेंट सेंटर पहली जगह है जहां अंतरराष्ट्रीय छात्रों को संपर्क करना होता है. यह केंद्र प्रशासनिक मामलों, परिचय और रोजमर्रा की जरूरत के सामान प्राप्त करने के बुनियादी तरीके बताता है.’’
पाठ्यक्रम के दौरान प्रोफेशनल कंसल्टेंट्स की सेवाएं नि:शुल्क ली जा सकती हैं. अधिकतर कॉलेजों और छात्रावासों में संरक्षक होते हैं जो छात्रों की मदद करते हैं और उनके कल्याण का काम देखते हैं. सिंगापुर की पीएसबी एकेडमी से एमबीए कर रहे 27 वर्षीय संतोष कुमार कहते हैं, ‘‘सिंगापुर के एक संस्थान में दो साल की पढ़ाई के अनुभव ने मेरे अकादमिक विकास, चरित्र निर्माण और नेतृत्व क्षमता पर भारी असर डाला है.’’
भारतीय विश्वविद्यालयों के साथ और ज्यादा टाइ-अप के लिए तैयार हो रहे यहां के शिक्षण संस्थानों के मद्देनजर सिंगापुर इस उपमहाद्वीप में अपनी मौजूदगी के विस्तार की भी कोशिश कर रहा है. एनयूएस में अकादमिक मामलों के उपनिदेशक तान एंग चाइ कहते हैं, ‘‘सिंगापुर और भारत गहरे दोस्त हैं, जो एनयूएस और भारतीय संस्थानों के बीच शैक्षणिक और रिसर्च समझौतों से दिखाई भी देता है. हम भारत के साथ रिश्ता मजबूत करने को तत्पर हैं.’’ भारतीय छात्र उम्मीद कर सकते हैं कि वे भी पैड थाई व्यंजन चख सकेंगे, विश्वस्तरीय प्रयोगशालाओं में काम कर सकेंगे और सिंगापुर के किसी शैक्षणिक परिसर में अठखेलियां करते मकाव चिडिय़ा के जोड़े को देख सकेंगे.

