दिल्ली चुनाव में आम आदमी पार्टी की भव्य जीत ने यह सिद्ध कर दिया कि शाहीन बाग, हिंदू मुस्लिम जैसे मुद्दों से ज्यादा मुफ्त बिजली पानी ने जनता को लुभाया. आम आदमी पार्टी ने भी चतुराई से शाहीन बाग जैसे मुद्दों से खुद को न दूर बता न पास जाकर कोई साफ बात कही और अपने पूरे चुनावी कैम्पेन में मुफ्त बिजली, पानी स्वास्थ्य, शिक्षा का जोर शोर से प्रचार किया. मुफ्त चीजें असर करती हैं इसमें कोई दोराय नहीं.
2019 के चुनाव में किसानों के खाते में सीधा पैसा पहुंचा तो उसका असर चुनाव में दिखा. अगर ध्यान हो तो किसानों को पैसा देने का फैसला मोदी सरकार ने पिछली तारीख से लागू करके चुनावों से ठीक पहले दिया. इसकी घोषणा तत्कालीन वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने की थी. यह समझने की बात है कि जब सरकार घर बनवाने, शौचालय बनवाने को पहले से पैसा दे रही थी, मुफ्त इलाज के लिए आयुष्मान योजना लागू थी, घर-घर बिजली और गैस सिलेंडर के लिए भी उज्जवला और सौभाग्य जैसी स्कीम चलाई जा रहीं थी तो फिर किसानों को सम्मान निधि के रूप में 6000 रुपए देने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या पहले से चल रही स्कीमें नाकाफी थीं?
तेलंगाना में केसीआर, 2019 में नरेंद्र मोदी और बड़े बहुमत के साथ वापसी और अब दिल्ली में केजरीवाल की बरकरार धमक यह दिखाती है कि जनता को अगर हाथ में कुछ मुफ्त मिलता वो भी बिना नियम शर्तों के तो इसका फायदा सीधा सत्ताधारी सरकार को होता है.
गौर करने वाली बात यह है कि इससे पहले राज्य में जो सरकारें देती थी उनमें कोई न कोई नियम या शर्त लगी होती थी. मसलन, छोटे किसानों का कर्ज माफ, बेरोजगारी भत्ता आदि. कर्ज माफी और बेरोजगारी भत्ते जैसी घोषणाओं के बाद कई छिपी हुई नियम शर्तें इसका असर कम कर देती हैं. इसके अलावा योजनाओँ के लिए कौन पात्र है या नहीं इस छानाबीनी में भी कई भष्टाचार हो जाते हैं.
राजनैतिक दल भी इसे भलिभांति समझ गए हैं. यहीं कारण है कि घुमा फिरा कर कोई योजना देने के बजाय सीधा लोगों के खाते में पैसा पहुंचाने या मुफ्त सेवाएं बांटने पर सरकारों का जोर बढ़ रहा है. आने वाले दिनों में दिल्ली का प्रयोग अन्य राज्यों में भी होता दिखेगा. यह बात अलग है कि दिल्ली की तरह सारे राज्य मुफ्त बिजली पानी का खर्चा वहन नहीं कर सकते. उन्हें अपने राज्य के हिसाब से सहुलियत का इंतजाम करना होगा.
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