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क्या इनकम टैक्स में छूट से बदलेगी सूरत?

घर और गाड़ी खरीदना स्थायी खपत बढ़ने के सबसे सटीक पैमाने हैं. कारों और घर की खरीदारी अच्छे दिनों की खरीदारी होती है. लेकिन इस खरीदारी के लिए सस्ते कर्ज और सस्ते घर या कार से ज्यादा जरूरी भविष्य को लेकर भरोसा होता है. व्यक्ति जब अपने भविष्य को लेकर आश्वस्त होगा तभी अगले पांच से बीस साल तक के लिए कर्ज लेने का साहस जुटा पाएगा. यही कारण है कि मकानों और कारों की सबसे ज्यादा बिक्री उस दौर में हुई थी जब महंगाई चरम पर थी और कर्ज भी महंगा.

केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण
केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण
अपडेटेड 10 दिसंबर , 2019

आने वाले बजट में सरकार आयकर छूट की सीमा बढ़ा सकती है. इस कदम के पीछे सरकार की कोशिश लोगों के हाथ में ज्यादा पैसा छोड़ने की होगी, जिससे खपत को बढ़ावा मिल सके और अर्थव्यवस्था का सुस्त पड़ा पहिया रफ्तार पकड़ सके. जीडीपी में करीब 60 फीसदी हिस्सेदारी खपत की है. 

इससे पहले भी वित्त मंत्री अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए कई ऐलान कर चुकी हैं. इसमें कॉर्पोरेट टैक्स में कटौती और रियल एस्टेट सेक्टर को दी गई राहत मुख्य थी. लेकिन इन कदमों का कोई खास असर अभी देखने को नहीं मिला है. मसलन, न तो कॉर्पोरेट टैक्स में कटौती के बाद किसी कंपनी ने बड़े पूंजीगत व्यय की घोषणा ही की और न ही किसी उत्पादों पर किसी खास छूट का ऐलान.

अटके प्रोजेक्ट और अनबिके मकानों के आंकड़े भी बहुत नहीं बदले. सस्ते कर्ज भी इस दिशा में कोई खास असर नहीं दिखा पाए. गौरतलब है आरबीआइ फरवरी से अक्तूबर के दौरान पांच बार नीतिगत दरों में 135 बेसिस प्वाइंट की कटौती कर चुका है.

सस्ता कर्ज, महंगाई काबू में, टैक्स घटाकर उत्पाद सस्ते करने की कोशिश अर्थव्यवस्था को सहारा देने के तमाम प्रयास कारगर साबित नहीं हुए. अब दांव लोगों के हाथ में ज्यादा पैसा देने पर है. यानी आयकर की छूट सीमा को बढ़ा दिया जाए और लोगों को ज्यादा पैसा देकर खर्च करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि टैक्स में मिली राहत क्या इतनी प्रेरक होगी कि लोग खर्च करने लगें?

घर और गाड़ी खरीदना स्थायी खपत बढ़ने के सबसे सटीक पैमाने हैं. कारों और घर की खरीदारी अच्छे दिनों की खरीदारी होती है. लेकिन इस खरीदारी के लिए सस्ते कर्ज और सस्ते घर या कार से ज्यादा जरूरी भविष्य को लेकर भरोसा होता है. व्यक्ति जब अपने भविष्य को लेकर आश्वस्त होगा तभी अगले पांच से बीस साल तक के लिए कर्ज लेने का साहस जुटा पाएगा. यही कारण है कि मकानों और कारों की सबसे ज्यादा बिक्री उस दौर में हुई थी जब महंगाई चरम पर थी और कर्ज भी महंगा.

लोगों के हाथ में थोड़े ज्यादा पैसे छोड़ने से क्या भरोसा लौट आएगा? क्योंकि अगर ऐसा होता तो बीते वर्षों में सातवें वेतन आयोग लागू होने से मिली राशि, जीएसटी की दर घटाने से कम हुई महंगाई के बाद कुछ असर जरूर पड़ता. ऐसा नहीं है कि लोगों के पास पैसा नहीं है. क्योंकि अगर ऐसा होता तो बाजार में निवेश के अच्छे विकल्प दिखते ही लोग बाजार में नहीं कूद पड़ते. आइआरसीटीसी का आइपीओ सफल होना, शेयर बाजार का अपने उच्चतम स्तर पर होना, म्युचुअल फंड में निरंतर निवेश इसके ताजा उदाहरण हैं.

 इस पर विचार ज्यादा जरूरी है कि जरूरत किस चीज की है लोगों के हाथ में ज्यादा पैसा छोड़ने की या अर्थव्यवस्था में भरोसा लौटाने? क्योंकि टैक्स कटौती का कदम जनता को फायदा पहुंचाएगा इसकी गारंटी नहीं लेकिन सरकारी खजाने पर इसकी चोट सौ फीसदी तय है.

अर्थव्यवस्था में भरोसा लौटे इसके लिए बुनियादी ढांचे पर बड़े सरकारी निवेश की जरूरत है. जिन कॉर्पोरेट्स को बड़ी कटौती दी गई है उन्हें अर्थव्यवस्था में पूंजीगत निवेश के लिए बाधित करने की आवश्यकता है. क्योंकि बड़े निवेश से रोजगार और मांग दोनों के रास्ते खोलेंगे. नए रोजगार पैदा होने से ही अर्थव्यवस्था में भरोसा लौटेगा और उस समय कर्ज सस्ता न होने पर भी लोग घर और गाड़ी खरीदने का साहस जुटा पाएंगे.

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