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भारत की व्यवस्था को लीलता नेता-बाबू गठजोड़

उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री के तौर पर मायावती ने एक अफसर का दर्जन भर से ज्यादा बार तबादला किया. वे कहते हैं, "मैं कुछ साफ कपड़ों से भरा अपना सूटकेस और अहम कागजों से भरा एक बैग हमेशा तैयार रखा करता था, पता नहीं, कब और कहां मेरा अगला तबादला कर दिया जाए.''

नेता-बाबू गठजोड़
नेता-बाबू गठजोड़
अपडेटेड 24 सितंबर , 2018

जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल और अपराधी-राजनैतिक-अफसरशाह गठजोड़ पर 1993 की वोहरा (समिति) रिपोर्ट के लेखक एन.एन. वोहरा ने 2016 की अपनी किताब सेफगार्डिंग इंडियाः एसेज ऑन गवर्नेंस ऐंड सिक्योरिटी में लिखा था, "किसी भी कीमत पर सत्ता में बने रहने के लिए राजनैतिक कार्यपालिका जान-बूझकर दब्बू और लचीले अफसरों का चयन करती है.''

ज्यादातर अफसरशाहों का कहना है कि राज्यों के दो अहम पदों—मुख्य सचिव और मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव—के चयन में राजनीतिकरण अपनी सबसे भद्दी और खतरनाक शक्ल में दिखता है.

मुख्य सचिव रैंक के एक अफसर तफसील से बताते हैं, "दब्बू और आज्ञाकारी अफसर वरिष्ठता को नजरअंदाज करके इन्हीं दो पदों के लिए चुने जाते हैं. कोई भी राजनैतिक आकाओं पर सवाल खड़े करता है, तो उसे लूप लाइन में शंट कर दिया जाता है, यानी आम तौर पर राजस्व बोर्ड में डाल दिया जाता है.

व्यवस्था कनिष्ठ प्रशासनिक को भी जल्दी ही लील लेती है, क्योंकि राज्यों में मुख्य सचिव उनकी वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट या एसीआर तैयार करते हैं.''

सचिव स्तर के एक अधिकारी कहते हैं, "कोई भी यह नहीं कह रहा है कि मुख्यमंत्री मुख्य सचिव की नियुक्ति करने में आंखों पर पट्टी बांधकर वरिष्ठता का पालन करें या यह कि एक बार नियुक्त होने के बाद मुख्य सचिव रिटायर होने तक उसी ओहदे पर रहें.

लेकिन अगर कोई मुख्यमंत्री तीन महीने के अंतराल में तीन मुख्य सचिव नियुक्त करता है और वरिष्ठता का जबरदस्त उल्लंघन करता है, तो सियासी वजहों से दखलअंदाजी तो होगी ही, जो ईमानदार अफसरशाहों को अलग-थलग कर देती है.''

सेवानिवृत्त आइएएस अफसर तथा योजना आयोग के पूर्व सचिव नरेश चंद्र सक्सेना अहम ओहदों के ऐसे राजनीतिकरण को "प्रतिबद्ध'' अफसरशाही की कुकुरमुत्तों की तरह बढ़ोतरी कहते हैं.

इकोनॉमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली में वे लिखते हैं, "मैं उनकी तादाद कुल अफसरों के 25 फीसदी से 50 फीसदी के बीच रखूंगा, जो राज्य पर निर्भर करती है.''

संविधान के तहत राज्य स्तर के नेता आइएएस अफसरों को हटा नहीं सकते, क्योंकि उनकी भर्ती केंद्र सरकार करती है. यही कारण है कि राजनैतिक आकाओं के कहे का पालन करने से इनकार करने वाले प्रशासनिक अफसरों और पुलिस अधिकारियों का बार-बार तबादला या निलंबन करके उनसे बदला लिया जाता है.

2003-04 में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर अपने आठ महीने के कार्यकाल में उमा भारती ने राज्य के 296 आइएएस अफसरों में से 240 का तबादला कर दिया था.

उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री के तौर पर मायावती ने एक अफसर का दर्जन भर से ज्यादा बार तबादला किया. वे कहते हैं, "मैं कुछ साफ कपड़ों से भरा अपना सूटकेस और अहम कागजों से भरा एक बैग हमेशा तैयार रखा करता था, पता नहीं, कब और कहां मेरा अगला तबादला कर दिया जाए.''

हर बार जब कोई नया मुख्यमंत्री आता है, ज्यादातर अफसरशाहों का एक से दूसरे जिले में, एक से दूसरे मंत्रालय में तबादला कर देता है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मार्च 2017 में कमान संभालने के एक महीने के भीतर 138 आइएएस और आइपीएस अफसरों के तबादले किए थे.

सक्सेना कहते हैं, "कहा जाता है कि उत्तर प्रदेश में पिछले 10 साल में एक आइएएस अफसर का एक ओहदे पर औसत कार्यकाल छह महीने जितना कम रहा है. आइपीएस में तो यह और भी कम है, जिसे लेकर ये फब्तियां कसी जाती हैं कि "अगर हमें हफ्तों के लिए तैनात किया जाता है, तो हम बस इतना कर सकते हैं कि अपनी हफ्ते की घूस वसूल लें''.''

पूर्व आइएएस अफसर और ऐंटी-करप्शन एक्टीविस्ट टी.आर. रघुनंदन अपने ब्लॉग द लोनलीनेस ऑफ द ईथिकल में लिखते हैं, "पूरे देश में ऐसे कई उदाहरण हैं जिनमें प्रशासनिक अधिकारियों के तबादले किए गए या और भी कड़ी सजा भोगनी पड़ी, केवल इसलिए कि वे कहीं ज्यादा ऊंचे नैतिक मानदंडों पर चलने की बात कहते हैं.''

आइएएस अफसर अशोक खेमका से पूछिए, जिन्होंने रॉबर्ट वाड्रा-डीएलएफ के सौदे से परदा उठाया थाः वे अपनी 51वीं पोस्टिंग पर तैनात हैं. सेवानिवृत्त अफसर पी.के. दोरैस्वामी कहते हैं, "हमें सिखाया गया था कि आइएएस का मतलब है ईमानदारी, गुमनामी और सेवा. आज के मुख्यमंत्रियों में ज्यादातर इस सेवा के सात दशकों के वजूद के बाद भी आइएएस से यही उम्मीद करते हैं कि वे "जी, सर'' से ज्यादा कुछ न कहें.''

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