दशक भर पहले मैं और प्रतिष्ठित वैज्ञानिक सी.वी. शेषाद्रि संगठन निर्माण के तौर-तरीकों पर चर्चा कर रहे थे. उन्होंने कुछ हल्के-फुल्के अंदाज में कहा कि उनका मन करता है कि अपने हाथों खड़े किए संगठन चेन्नै स्थित मुरुगप्पा चेट्टियार रिसर्च सेंटर को खत्म करके उसे दोबारा बनाया जाए. अपनी बात को विस्तार देने के लिए उन्होंने कहा, ‘‘सभी संस्थापकों और पुराने लोगों का हर निशान मिटा दिया जाए, बीच के औसत उत्तराधिकारियों के साथ उनके तमाम रिश्तों को खत्म कर दिया जाए.’’ शेषाद्रि की यह बात एक विडंबना का ही इजहार थी लेकिन वे इसके जरिए भारत के बारे में एक अहम समाजशास्त्रीय असलियत की ओर भी इशारा रहे थे कि यहां के लोग व्यक्ति-केंद्रित संगठन बनाने के आदी हैं.
यह विरोधाभास ही है कि कोई भी संगठन अपने संकुचित रूप में एक व्यक्ति का रूप ले लेता है. जब संस्थापक मर जाते हैं, तो हम उन्हें शाश्वत बनाए रखने की कोशिश में उत्तराधिकार, संस्थानीकरण और सांगठनिक तानेबाने के विचारों का गला घोंट देते हैं. शेषाद्रि उस वक्त विज्ञान से जुड़े संगठनों की बात कर रहे थे, लेकिन उनका कहा राजनैतिक दलों पर कहीं ज्यादा सटीक बैठता है.
व्यक्ति-केंद्रित या जिसे एकल नेतृत्व वाला दल कहा जाता है, एक अजीब परिघटना है. इसमें सामूहिकता एक व्यक्ति में अभिव्यक्त होती है और व्यक्ति का आचरण और कामकाज सामूहिकता का प्रतिबिंब होता है. इस तरह वह व्यक्ति बतौर नेता खुद-ब-खुद एक जीता-जागता संगठन बन जाता है. एक मायने में वह अवतार हो जाता है. संगठन के पास सिर्फ एक ही आख्यान अपने नेता की जीवनी होती है.
समाजशास्त्रीय संदर्भ में कहें तो करिश्मा और पदानुक्रम वाला संगठन (जैसे, नौकरशाही) विरोधाभासी हैं. समाजविज्ञानी मैक्स वेबर के मुताबिक करिश्मा अतार्किक, अस्थायी और व्यक्ति-केंद्रित होता है जबकि संगठन तार्किक, सामूहिक और निर्वैयक्तिक होता है. जब कोई संगठन अपने स्वाभाविक सामान्य कामकाज में लिप्त होता है, तो अमूमन उससे करिश्मा गायब हो जाता है. दोनों एक साथ नहीं टिक पाते. भारत में हालांकि संगठन हमेशा नेता के इर्द-गिर्द ही वजूद में आते हैं. उस नेता की ऊर्जा ही समूची पार्टी को जोड़े रखती है. नेता के पहुंचते ही संगठन अचानक बिजली की गति से सक्रिय हो जाता है. भारत में नेता एक ऐसी गर्भनाल है जिससे बाकी सभी जुड़ाव महसूस करते हैं.
इस तरह एआइएडीएमके लाखों जयललिताओं की पार्टी बन जाती है तो तृणमूल में चारों ओर ममता ही ममता होती हैं. ममता की जीवनी ही संगठन का इतिहास होता है, ममता के लक्ष्य ही संगठन के इकलौते उद्देश्य बन जाते हैं. व्यक्ति और नेता एकरूप हो जाता है. इसे राजनीति की ताकत कहिए या आदमी की याददाश्त की ताकत कि ममता का मिथक, उनकी अदद मौजूदगी ही तृणमूल को ऊर्जावान बनाए रखती है. बरसों पहले जब देवकांत बरुआ ने ‘‘इंडिया इज इंदिरा, इंदिरा इज इंडिया’’ का नारा दिया था, तो वे करिश्मे की ताकत का ही इजहार नहीं कर रहे थे, बल्कि हमारे यहां के संगठनों में चाटुकारिता की अहमियत पर भी जोर दे रहे थे. चाटुकारिता और नायक पूजा के बूते कोई नायक इतिहास रच सकता है और कई कमजोर जिंदगियों में ताकत भर सकता है.
हर कोई एक नेता वाली पार्टी का मुखिया नहीं हो सकता. आपको जनता में लोकप्रिय होने की कूवत से बढ़कर असामान्य और दुस्साहसिक कारनामे करने की संभावनाएं जगानी होंगी. जयललिता को ही लें. वे फिल्म अभिनेत्री थीं जो एमजीआर की नायिका के तौर पर जानी जाती थीं. एमजीआर की छवि दैवीय बन गई थी. भारतीय राजनीति में उन्हें चुनौती देने से पहले ईश्वर को भी दो बार सोचना पड़ जाता. मुझे याद है जब उन्होंने एक बार कोल्ड ड्रिंक पी, तो बचे हुए द्रव्य को श्रोताओं के ऊपर ऐसे छिड़का गया गोया वह पवित्र जल हो. जयललिता उसी मिथक की आभा से चमकती हैं. वे मातृत्व का एहसास दिलाती हैं, लेकिन यह भाव किसी परिवार से नहीं बल्कि पूरे समाज से जुड़ा है. उनकी लाखों किंवदंतियां हैं. भगवान ने भी मानवता का इतना कल्याण नहीं किया होगा, जितना उन्होंने किया है. जयललिता का यह मिथक व्यावहारिक राजनीति से पैदा हुआ है. वे इकलौती हैं, अकेली हैं और उनकी यह छवि एक नेता वाली पार्टी के किसी नेता को ही नसीब हो सकती है.
ममता की छवि भी ऐसी ही किंवदंतियों से मिलकर बनी है. वे गुस्सैल महिला हैं जो अकेले ही सरेआम सीपीएम के खिलाफ जंग लड़ रही है. वे गरीबों की महारानी हैं जिनकी प्रतिबद्धता पर कोई आंच नहीं है. आखिर कौन लगातार विरोध प्रदर्शनों को ही सरकार के कामकाज में बदलने का माद्दा रखता है? वे सरल हैं और उनकी अनोखी वाक्पटुता दरअसल उनकी सादगी की ताकत से ही उभरती है.
ममता और जयललिता ने ही घर नहीं बसाया है लेकिन दोनों सत्ता या उसके विरोध में चंडी का रूप धर सकती हैं. दोनों ही अच्छे-बुरे की सामान्य परिभाषा से आगे निकल जाती हैं. वे हर वक्त आपको भौचक कर सकती हैं और अपने समर्थकों से पूरी भक्ति की चाहत रखती हैं. उनके व्यक्तित्व में मिथक, रहन-सहन, क्रोध का ऐसा संगम है जो किसी साधारण आदमी, किसी बेरोजगार युवा, किसी गृहिणी या किसी छात्र को जादुई एहसास करा देता है. ऐसे ‘‘एकल नेता’’ सेकुलर या सामान्य नहीं हो सकते. उनमें किंवदंतियों, मिथक, महान गुणों और जादुई एहसास का मिश्रण होना ही चाहिए. इसके अलावा इनके साथ तीसरी दुनिया का एक गुण भी जुड़ा होना चाहिए. कैमरन, ओबामा और ट्रक्वप के बारे में सोचिए. ममता और जयललिता की विशाल होर्डिगों के सामने तो ये सब एक मामूली कटआउट जैसे दिखते हैं. उनमें आज के वक्त और भावनाओं का इजहार है. लिहाजा, उनका विश्लेषण किसी आम नेता की तरह नहीं, बल्कि मनोविज्ञान से करना जरूरी हो जाता है.
ऐसा नेता अपने आप में एक ब्रह्मांड होता है जहां उसके समर्थकों को सहज अपनापन और सार्थकता का बोध होता है. ऐसी दुनिया में पूजा, चापलूसी, भक्ति, सनक तो होगी ही क्योंकि यहां नेता निरंकुश भी है और कृपालु भी है. ऐसे नेता एकमात्र सत्ता-केंद्र होता है. साझा सत्ताएं पतित हो जाती हैं जबकि इकलौता नेता एकता और एकाग्रता का भाव पैदा करता है. मैं इस बात पर दांव लगाने को तैयार हूं कि केंद्र का चाहे जो हाल हो, लेकिन लंबे समय तक टिकने वाले तमाम क्षेत्रीय नेता इसी सांचे से निकल कर आएंगे. केंद्र जैसे-जैसे नौकरशाही के ढांचे में ढलता जाएगा, हमारे क्षेत्रीय नेता उसके विरोध में अपने दम पर अकेले खड़े होंगे, जो केंद्रीय ताकतों और संगठनों के खिलाफ होंगे. और मिथक, करिश्मा वगैरह के बगैर वे कारगर भी नहीं हो पाएंगे. लेखक शिव विश्वनाथन जिंदल लॉ स्कूल, हरियाणा में प्रोफेसर हैं.
एको अहम्, द्वितीयो नास्ति
नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी से लेकर जादुई शख्सियत वाले क्षेत्रीय नेताओं तक, भारत की राजनीति में अब राजनैतिक पार्टियों और संस्थानों पर चेहरे भारी पड़ने लगे हैं.

अपडेटेड 1 जून , 2016
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