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दीवारें बोलती हैं: 'स्वतंत्रता सेनानियों’ के शहर में मुफ्तखोरी और खैरात की सियासत

दिल्ली की मूल शक्तियां हैं लोभ, महत्वाकांक्षा और आक्रामक व खुरदरी संवेदनहीनता जो देश के किसी और शहर में देखने को नहीं मिलती. आपको पता है कि उसे क्या नहीं करना है. बीजेपी अपने पुराने तौर-तरीकों पर कायम है जबकि कांग्रेस यहां से पूरी तरह गायब.

अपडेटेड 14 अगस्त , 2015

करीब एक दशक से ज्यादा वक्त हुआ जब मैंने देश के विभिन्न और सुदूर हिस्सों में चुनावों के दौरान अपनी सघन यात्राएं शुरू की थीं जिसमें मैं कभी-कभार पड़ोसी देशों तक में गया. वहां से इकट्ठा अनुभवों को मैं अपने स्तंभ 'दीवारें बोलती हैं’ में लिखता रहा हूं. जैसा कि नाम से स्पष्ट है, ये दीवारों पर लिखी इबारतें ही होती हैं. इनमें अक्सर भित्तिचित्र, साइनबोर्ड, होर्डिंग, विज्ञापनों की बात होती है जो आपको किसी बदलते हुए इलाके को समझने में मदद करते हैं. यह सब मिलकर हालांकि एक मुहावरा भी गढ़ते हैं जिसे पाने के लिए आपको पुराने किस्म की रिपोर्टिंग के तौर-तरीके अपनाकर घूमना होता है, पढऩा होता है, लोगों से बात करनी होती है और अपनी इंद्रियां खुली रखकर अनुभवों को आने देना होता है. इस श्रृंखला में समूचे हिंदीभाषी क्षेत्र, उत्तर, पूरब, पश्चिम और दक्षिण में हुए बदलावों को समयबद्ध तरीके से दर्ज किया गया है और सभी अहम राज्य इसके दायरे में आ चुके हैं. इसका इकलौता अपवाद दिल्ली है जहां मैं रहता हूं और वोट डालता हूं.

सवाल उठता है कि क्या दिल्ली एक अहम राज्य है? वह राज्य भी है क्या? इसका बेशकीमती लुटियंस वाला हिस्सा केंद्र सरकार के अधीन है. इसकी जमीन और पुलिस (जिन दो चीजों से हर मुख्यमंत्री अपना प्रभाव जमाता है) भी केंद्र के अधीन हैं. लोकसभा में दिल्ली सिर्फ सात सांसद चुनकर भेजती है जो संख्या पड़ोस के छोटे-से राज्य हरियाणा में संसदीय सीटों के आधे से कुछ ज्यादा है जबकि पड़ोसी उत्तर प्रदेश के दसवें हिस्से से भी कम है. दिल्ली के भीतर शहरी सत्ता और जिम्मेदारी का अधिकांश चुने हुए नगर निगमों के अधीन है. इस तरह से दिल्ली की चुनी हुई सरकार एक किस्म से बोनसाई है, जिसके पास एक सरकार जितनी सारी बाध्यताएं तो हैं लेकिन जिसकी पहुंच और ताकत एक वास्तविक राजनैतिक इकाई के जितनी नहीं है. फिर भी वह दिल्ली की सरकार है इसलिए अहम है, जैसा कभी आकाशवाणी में बजने वाला एक गाना था—दिल्ली है दिल हिंदुस्तान का....

पिछले दिनों में जो बात बौद्धिकता और विचारों पर लागू होती थी, आज वह राजनैतिक सत्ता पर लागू होती है. मसलन, हम कभी कहा करते थे कि बंगाल आज जो सोचता है, भारत वही कल सोचता है. इसी तर्ज पर हम कह सकते हैं कि आज दिल्ली पर जो राज करेगा, वही कल भारत पर राज करेगा. जाहिर है, इस मुहावरे में समय के साथ होने वाले बदलाव बेशक दर्ज होंगे. सत्तर के दशक के मध्य से लेकर आज तक सिर्फ  एक अपवाद को छोड़ दें तो हम पाते हैं कि जिस भी पार्टी ने दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रसंघ का चुनाव जीता है, उसी की झेली में दिल्ली की सात में से ज्यादातर लोकसभा सीटें आई हैं. ऐसा भी शायद ही हुआ हो कि जिस पार्टी को दिल्ली में जीत मिली, वह भारत पर राज नहीं कर सकी.

यहां तक कि 1999, 2004, 2009 और अब 2014 में भी यही सीधा-सपाट चलन कायम रहा है. अब हमें इसमें एक अतिरिक्त शर्त जो जोड़नी होगी वह अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी का उभार है जो बीजेपी के साथ सीधे मुकाबले में है. यह कहना तो बेतुका होगा कि अतीत का चलन खुद को दोहराएगा और अगर आम आदमी पार्टी की दिल्ली में जीत हुई तो भविष्य में वह भारत पर राज करेगी. यह जरूर हो सकता है कि वह जीत के बाद खुद में बड़ा बदलाव करे और एक वैकल्पिक राष्ट्रीय ताकत के रूप में खुद को स्थापित करते हुए मध्यमार्गी वाम वैचारिक लोकप्रिय स्पेस से कांग्रेस को बेदखल कर डाले तथा नरेंद्र मोदी के लिए कहीं ज्यादा बड़ा संकट खड़ा कर दे. जीत बीजेपी की हुई, तो उससे मोदी की सत्ता को ताकत मिलेगी, यह पुष्टि होगी कि मोदी की लहर कायम है और फिर वे कांग्रेस से ज्यादा ताकतवर चुनौतियों को भी दरकिनार कर पाने में सक्षम होंगे.

दिल्ली इतनी अहम है और केजरीवाल इतने कठोर प्रतिद्वंद्वी हैं कि उन्होंने मोदी को अपनी रणनीति और समीकरण बदलने को बाध्य कर दिया है. मोदी के नेतृत्व में ऐसा पहली बार हुआ है कि उनकी पार्टी उनके नाम पर वोट मांगने की बजाए एक मुख्यमंत्री का चेहरा सामने रखकर चुनाव में उतर रही है. इससे दोहरा उद्देश्य सधेगा. एक तो दिल्ली को किरण बेदी के रूप में केजरीवाल के बराबर निजी प्रतिष्ठा वाला उम्मीदवार मिला है. दूसरे, प्रतिकूल स्थिति आने पर मोदी के पास विकल्प अपनाने की गुंजाइश भी मौजूद है.

दिल्ली राष्ट्रीय राजनीति के व्यापक तर्ज पर चलती तो उसका आकलन करना ज्यादा आसान होता. तब मोदी के लिए यह चुनौती भी नहीं पेश कर पाती. चार राज्यों के चुनाव समेत पिछले 15 महीनों में हुए हर चुनाव में दिल्ली के मतदाता ने मोदी और उनकी पार्टी को जमकर वोट दिया है, फिर चाहे वह कहीं से भी आता हो, उसकी कोई भी जाति या जातीयता रही हो. आज की दिल्ली में ज्यादातर प्रवासी हिंदीभाषी राज्यों और हरियाणा से हैं और कुछ पुराने पंजाबी यहां रहते हैं. यह प्रति व्यक्ति आय के मामले में देश का सबसे अमीर राज्य भी है और सबसे अच्छी सड़कों (सबसे कम खराब भी कह सकते हैं), मेट्रो, दसियों हजार बसों, हरित क्षेत्र, स्कूलों, कॉलेजों  के मामले में यह सबसे आगे है. दिल्ली में हालांकि पहचान कोई ज्यादा मायने नहीं रखती है. ऐसा इस कारण से नहीं है कि यहां के शहरीकरण ने किसी समावेशी वातावरण को जन्म दिया हो बल्कि यह इसलिए हुआ है क्योंकि दिल्ली की राजनीति को यहां की आर्थिकी तय करती है.{mospagebreak}

दुकानदारी पर पलता शहर
दिल्ली की सही तस्वीर खींचने के लिए सुकेतु मेहता जैसी दृष्टि और विवरणात्मक ताकत चाहिए ताकि इस पर एक मोटी किताब लिखी जा सके. मैं तो सिर्फ दीवारों पर लिखी इबारतें देखने तक सीमित हूं, लिहाजा मेरे ज्ञान चक्षु खोलने के लिए पूर्वी दिल्ली में अक्षरधाम मेट्रो स्टेशन के सामने लगा खंभा ही काफी है जिससे मैं समझ पाता हूं कि दिल्ली आखिर सबसे अलग क्यों है. इस खंभे पर एक डेवलपर का विज्ञापन लगा है जो दुकानें बेचता है और जिस पर एक संदेश लिखा है: रुपया पेड़ों पर नहीं उगता, दुकानों में उगता है. आप पूर्वी दिल्ली स्थित निर्धनतम जमनापार इलाके में ट्रैफिक और लोगों की भीड़ को चीरते हुए घुसते जाइए और वहां जाकर सब्जी, आइसक्रीम, पकौड़े बेचने वालों, प्रॉपर्टी एजेंटों और छोटे दुकानदारों और ऑटो चालकों से बात करिए. इस इलाके में तकरीबन सभी लोग दफ्तर के बाद कुछ न कुछ बेचते हैं. दिन में ये नौकरियां करते हैं लेकिन उससे कमाई बहुत कम होती है. परिवार, बढ़ते हुए बच्चे, शादी-ब्याह और बेहतर जिंदगी बिताने की अदम्य महत्वाकांक्षा के लिए ज्यादा पैसा चाहिए. यह एक तरीके से संभव नहीं है. सरकारी नौकरियों में लगे तमाम लोग, यहां तक कि चपरासी, दफ्तरी और चौकीदार भी कुछ न कुछ नकद लेकर घर आते हैं. यह राजधानी एक भ्रष्ट शहर है जहां एक फाइल ले जाने, एक दरवाजा खोलने और किसी से फोन पर बात करवाने की भी एक कीमत होती है.

यहां प्रॉपर्टी के धंधे में लगे लोग बताएंगे कि निचले और मध्यम दर्जे के सरकारी कर्मचारी कितने भ्रष्ट हैं. एक विश्वसनीय अनुमान के मुताबिक करीब पांच लाख सरकारी कर्मचारी रोजाना अपनी जेब में 5,000 रु. औसतन लेकर घर लौटते हैं. ये पैसे उन्हें खर्च करने हैं लेकिन वे इसे बैंक नहीं ले जा सकते. वे अपनी जीवनशैली भी नहीं बढ़ा सकते वरना लोगों को शक हो जाएगा. जो बचते हैं, उनमें या तो मुट्ठी भर ईमानदार सरकारी कर्मचारी होते हैं या फिर कम तनख्वाह पाने वाले निजी क्षेत्र के कर्मी—ये लोग दूसरों को वह नकद खर्च करने में मदद करते हैं. यह पैसा खाने-पीने में, मनोरंजन में, नए-नए फैंसी फोन में और ब्यूटी पार्लरों में खपता है. आप दिल्ली के निम्न और निम्न मध्यवर्गीय इलाकों में चले जाएं तो आप पाएंगे कि यहां हर आदमी एक दुकानदार है. हर घर से एक धंधा चल रहा है—खाने-पीने से लेकर दर्जीगिरी और ट्यूशन से लेकर होमियोपैथी तक. दिल्ली दोहरी आय वाला शहर है और यह दूसरी आय रिश्वत अथवा बख्शीश से नहीं आती तो घरेलू उद्यम से आती है. दिल्ली में पैसा इसी कारोबार और दुकानदारी से प्रवाहित होता है और इसके ग्राहक वे लोग हैं जिनकी आय नकदी में है. अब आप समझ गए होंगे कि वह खंभा क्यों आंखें खोलने वाला है: पैसे पेड़ों पर नहीं उगते, दुकानें में उगते हैं. दिल्ली में उद्योग या संसाधन कम हैं. यहां नकद का सबसे बड़ा स्रोत सरकार है और यहां का सबसे बड़ा पेशा दुकानदारी है.{mospagebreak}

बाबूगिरी और मुफ्तगिरी
यही वजह है कि दिल्ली की संचालक ताकतें हैं लोभ, महत्वाकांक्षा और एक आक्रामक, खुरदरी संवेदनहीनता जो देश के किसी और शहर में नहीं मिलती. दिल्ली के पूर्वी कोने में मंडावली में रहने वाला चौथे दर्जे का एक कर्मचारी नेता कहता है, “सरजी, हम स्वतंत्रता सेनानियों के शहर के रहने वाले हैं.” उसके शब्दकोश में स्वतंत्रता सेनानी का मतलब वह व्यक्ति है जो हर चीज मुफ्त चाहता हो, परिवहन से लेकर बिजली, शिक्षा, पानी और यहां तक कि वाइ-फाइ भी. दिल्ली में केजरीवाल के उभार की वजह यह है कि उन्होंने दिल्ली के गरीब-गुरबों का दिमाग अच्छे से पढ़ लिया है: यहां के वोटरों के लिए पैसे की अहमियत वही है जो बाकी जगहों के वोटरों के लिए पहचान की है. इन्हें हर माल या सेवा सरकार से मुफ्त में चाहिए. इसीलिए समूचे शहर में नि:शुल्क वाइफाइ का उनका विचार बेहतरीन है. बेशक वे इसके और फायदे गिनाते हैं: जैसे कि हर महिला के मोबाइल फोन पर वाइफाइ से जुड़ा एक ऐप्लिकेशन होगा ताकि वह किसी भी खतरे की आशंका में सबसे करीबी पुलिस स्टेशन को सूचना दे सके. इसमें हालांकि यह मानकर चला गया है कि सड़क पर चलने वाली, परिवहन से चलने वाली और कार्यस्थल पर मौजूद हर महिला के पास मोबाइल फोन होगा. वैसे दिल्ली कोई गरीब शहर नहीं है, इसलिए यह मुफ्त के नाम पर लुभाने वाली राजनीति भी नहीं है.

कांग्रेस ने सबसे पहले इस बात को समझा था जब उसने मतदाताओं की इस खुराक को पूरा करने के लिए माफिया के साथ गठजोड़ करके करोड़ों लोगों को सरकारी जमीन लूटने का मौका दिया, जिन पर अवैध कॉलोनियां बसा दी गईं और जहां आज आधी से ज्यादा दिल्ली रहती है. दिल्ली का 2008 का चुनाव कांग्रेस इन्हीं कॉलोनियों को नियमित करने के वादे पर जीत पाई थी, लेकिन 2013 में उसने कोई ताजा कोशिश नहीं की जब लोग बिजली, पानी और परिवहन की बढ़ती कीमतों से त्रस्त हो चुके थे. उनका मानना है कि इन सेवाओं की न्यूनतम कीमत वसूली जानी चाहिए. केजरीवाल इस बात को समझ् गए, लिहाजा वोट बटोरने के लिए उन्होंने सस्ती बिजली, मुफ्त पानी, शिक्षा, हर परिवार के लिए एक मकान का नारा दे डाला. मुफ्त वाइफाइ इसी कड़ी में ऊपर के तबके को लुभाने वाला नारा है. उनकी होर्डिगों पर लिखा है: डिग्री, आय, वाइफाइ. इसका मतलब यह हुआ कि आज की दिल्ली में रोटी, कपड़ा और मकान का मतलब शिक्षा, पैसा और संपर्क संचार है. केजरीवाल सबसे पहले इस रहस्य को खोल पाए इसीलिए आज वे इतनी मजबूत चुनौती बने हुए हैं. लोकप्रिय राजनीति के धंधे में उन्होंने कांग्रेस जैसे पुराने धुरंधरों को काफी पीछे छोड़ दिया है. अब कांग्रेस घरों में मुफ्त सीवर कनेक्शन देने का वादा कर रही है. इसकी आप डिग्री, आय और वाइफाइ से तुलना कीजिए, फर्क समझ में आ जाएगा.

पैसा अगर दिल्लीवालों की पहचान का सबसे बड़ा पैमाना है तो वह पैसा ही है जो दिल्ली को भूगोल और वास्तु के लिहाज से बांटता भी है. दक्षिणी दिल्ली रईसों और कुलीनों की है. दक्षिण-मध्य दिल्ली सबसे अमीर और ताकतवर है. पश्चिमी दिल्ली संपन्न है जिसके पास सिर्फ  पैसा है और पैसे की भूख है. इसके बाद बारी आती है निर्धन उत्तरी और पूर्वी दिल्ली की. इन सबके बीच थकी-हारी परकोटे वाली पुरानी दिल्ली है जो ढहने के कगार पर है. दिल्ली में मुंबई के हिसाब से झुग्गियां नहीं हैं. इसके अधिकतर वोटों पर केजरीवाल का कब्जा है. वे खुद मानते हैं कि दिल्ली में पचास लाख के करीब झुग्गियां हैं हालांकि वास्तविक पैमाने पर जिन्हें यहां झुग्गी माना जाता रहा है और जिन्हें जे.जे. कॉलोनी कहा जाता रहा है, उनकी संख्या इसकी आधी ही होगी. इनके अलावा दिल्ली में अवैध कॉलोनियों की व्यापक भरमार है—दक्षिणी दिल्ली में संगम विहार से लेकर उत्तरी दिल्ली में बुराड़ी तक—और कुछ तो सिर्फ नाम की वैध कॉलोनियां हैं, जैसे पूर्वी दिल्ली में मंडावली-विनोद नगर.{mospagebreak}

मैक्सिमम सब-सिटी
अपने देश में और पाकिस्तान में दीवारों पर लिखी इबारतों की तलाश में मैंने बड़ी बेतकल्लुफी के साथ अपने फोन पर तस्वीरें खीचीं हैं ताकि अपने इलस्ट्रेटर को चित्र बनाने में मदद कर सकूं, और बदले में इस कौतूहल से ज्यादा खराब और कोई प्रतिक्रिया मुझे नहीं मिली है: यह कौन मूर्ख है जो होर्डिगों, दीवार पर बने चित्रों की तस्वीरें खींच लाता है और यह तो कोई जापानी भी नहीं लगता? लेकिन अपनी दिल्ली में तस्वीर खींचने के लिए हर बार फोन उठाते ही लोग मुझे संदेह से देखने लग जाते हैं. लगभग हर व्यक्ति ने अवैध रूप से निर्माण या अपने घरों में विस्तार किया हुआ है और वे इस चिंता से घिर जाते हैं कि मैं कहीं किसी सरकारी अधिकारी या कोर्ट द्वारा नियुक्त निरीक्षण कमेटी के लिए सबूत तो नहीं जुटा रहा हूं. जमीन को लेकर घटिया शासन और कांग्रेस-स्टाइल की चुनावी राजनीति ने शहर की तीन-चौथाई आबादी को किसी न किसी रूप में अवैध की तरह रहने पर मजबूर कर दिया है. लिहाजा, कुछ तो निहायत अवैध इलाके हैं—सबसे गरीब बुराड़ी से लेकर संपन्नतम सैनिक फाम्र्स तक. अर्ध-वैध गैर-अभिजात्य तबका दिल्ली के विशाल निचले वर्ग का निर्माण करता है और वह केजरीवाल से बहुत प्रेम करता है. दिल्ली की अवैध कॉलोनियां एक मायने में मुंबई के स्लम का जवाब हैं. आम झुग्गी बस्तियों से बेहतर लेकिन अवैध, सुविधाओं से महरूम और माफियाओं द्वारा संचालित. अपनी आसान सहूलियत के लिए हम इन्हें सुपर-स्लम का नाम दे देते हैं. दिल्ली के ज्यादातर हिस्सों में, जैसे कि पूर्व के इलाकों में विभिन्न आर्थिक वर्ग कंधे से कंधा मिलाकर रहते हैं. इनमें जो संपन्न हैं वे अपने आपको पिंजरों में कैद कर देते हैं—अपनी बालकनियों और खुले इलाकों में बदसूरत सरियों की फ्रेम खड़े कर डालते हैं ताकि खुद को ताका-झांकी करने वाले, गरीब पड़ोसियों और उत्पाती बंदरों, दोनों से बचा सकें. यह गेटबंद समुदायों की दिल्ली की मौलिक, भयावह अवधारणा है.

“मेरा कहना अलग है लेकिन आपका इन्हें निचला वर्ग कहना गलत है,” केजरीवाल ने मुझसे कहा. हमारे बीच पिछला संवाद साल भर पहले हुआ था. तब हमने बहस की थी, पहले तो अण्णा आंदोलन पर और फिर—जब मैंने उनके गड्डमड्ड, गहरे लोकलुभावनवाद को देखा और उन्होंने अपने व्यक्तित्व और राजनीति को लेकर मेरी नापंसदगी को. लेकिन अब वह ज्यादा पुख्ता राजनैतिक हैं, मोटी चमड़ी वाले, और जैसा कि मैंने अपने हाल के प्रकाशन एंटीसिपेटिंग इंडिया की भूमिका में अनुमान लगाया था—उन्होंने मुख्यधारा की शांति को पा लिया है. “दिल्ली में दो वर्ग हैं. एक वह जिसे हमारे 49 दिन के शासन में सीधे फायदा मिला—सब्सिडियों, कीमतों में गिरावट और छोटे भ्रष्टाचार में गिरावट से. इसे ही आप गलत तरीके से निचला वर्ग कहते हैं. उसने पिछली बार जल्दबाजी में हमारे इस्तीफा देने के लिए हमें माफ भी कर दिया है.” दूसरा वर्ग, वे कहते हैं, मध्य व उच्च वर्ग है, अब भी आशंकित है. ''कोई भी यह स्वीकार करने को तैयार नहीं था कि हमें लोकपाल बिल के मुद्दे पर इस्तीफा देना चाहिए था.” सो, उनका नारा है—पांच साल, केजरीवाल.{mospagebreak}

उन्होंने एक संगठन खड़ा करने की दिशा में शानदार काम किया है और ऐसे प्रतिभाशाली लोग जुटाए हैं जो बीजेपी को भी रणनीति में मात दे देते हैं. उनकी युवा टीम ने चुनावी कुश्ती खेलते हुए उनकी कमजोरियों को ताकत में बदल दिया है. पहले उनके मफलर का मजाक उड़ाया जाता था, अब वह एक स्टाइल-स्टेटमेंट बन गया है. ''मेरी सोशल मीडिया टीम मफलरमैन के हैशटैग के साथ उतरी और यह महीने भर तक ट्रेंड करता रहा,” वे कहते हैं. उनकी लगातार खांसी का भी मजाक बना. इसलिए अब वह खुलकर माइक पर खांसते हैं मानो अपना पक्ष रख रहे हों. उन्हें भगोड़ा कहा गया इसलिए वह अपने प्रचार अभियान भाषण की शुरुआत में खुद ही इस बात को मान लेते हैं और इसके लिए माफी मांग लेते हैं. लेकिन मूल बात यह है कि दिल्ली को उन्होंने बाकी लोगों से बेहतर समझ है. वाइफाइ मुफ्त देने की पेशकश इसी सामयिक काबिलियत का परिचय है.

विडंबना की बात यह है कि दिल्ली का निचला वर्ग अपने यहां के आभिजात्य तबके से ज्यादा समावेशी और सहिष्णु है. गरीब इलाकों की आबादियां अपनी जगहों व मौकों को लेकर ज्यादा सहजता से घुलमिल जाती हैं. आपको हलाल (मुसलमान) मीट की दुकान के ठीक सामने झटका (हिंदू) मीट की दुकान मिल जाएगी. निहारी परोसने वाले बरकत की रोटी और पहाड़ी हिंदू ढाबा अगल-बगल मिल जाएंगे. जैसे-जैसे लोग अगल-बगल और हवा में अवैध मंजिलें और विस्तार बढ़ाते जा रहे हैं, ऐसे में ज्यादातर गलियों में घूमना कंक्रीट व स्टील के बने जंगलों में घूमने जैसा है. आगे बढ़ी हुई खिड़कियों, बालकनियों और एयरकंडिशनरों (जी हां, ये कोई गरीब इलाके नहीं हैं) के बीच से आसमान की एक झलक बस दिख पाती है. वे सब कुछ चाहते हैं—अपने एसी के लिए बिजली समेत, लेकिन वे उसके लिए पैसा नहीं चुकाना चाहते. वे बुनियादी तौर पर प्रतिष्ठान विरोधी भी हैं. पारंपरिक ट्रेड यूनियन आंदोलन तो खत्म हो चुके, लिहाजा केजरीवाल ये तीनों चीजें लेकर आते हैं—मुफ्तखोरी, ताकत और अवज्ञा. केजरीवाल ने अपना अर्थज्ञान भी बेहद कायदे से तैयार कर रखा है. वह कहते हैं, कोई भी झुग्गी बस्ती में रहना नहीं चाहता, लेकिन कोई भी शहर से तीस मील दूर भी नहीं धकेला जाना चाहता. इसलिए वे अलग-अलग मॉडलों का अध्ययन करके पुनर्वास की योजना चलाएंगे.  वे कहते हैं, ''हम दिल्ली को झुग्गी बस्ती में तब्दील नहीं करेंगे लेकिन हम झुग्गियों में रहने वालों को दिल्ली से बाहर भी नहीं फेंक देंगे.”{mospagebreak}

पूरब पूरब है और पश्चिम पश्चिम
पूर्वी और पश्चिमी दिल्ली के बीच विरोधाभास उतना ही तीक्ष्ण है जितना कि उन प्रत्याशियों के बीच जिनके साथ मैं बारी-बारी से जा रहा हूं. केजरीवाल में आग और जोश है, किरण बेदी में छवि व शांति. केजरीवाल पहले ही जम चुके हैं और बेदी को इस समय देश की सबसे ताकतवर पार्टी ने मैदान में उतारा है. जाहिर है, यह बड़ी कांटे की टक्कर है. केजरीवाल के लोग आपको जो भी आभास देने की कोशिश कर रहे हों, संघ/बीजेपी का आधार और कार्यकर्ता बेदी के साथ जमे हैं. अगर वे बेदी को बाहरी मानकर उनका विरोध भी करते हैं तो यह जाहिर नहीं होता. पश्चिम दिल्ली में स्थित आर्य समाज रोड झंडेवालान में संघ मुख्यालय से महज आधा मील दूर है जहां मैं बेदी के प्रचार ट्रक पर सवार होता हूं.

आपको महसूस हो जाता है कि आप पश्चिम दिल्ली में हैं जब प्रत्याशियों के आने पर इतने जोरदार पटाखे फोड़े जाते हैं कि वे जम्मू में बीएसएफ और पाकिस्तानी रेंजर्स के बीच गोलीबारी सरीखे प्रतीत होते हैं. और यह सब बड़े खुशनुमा माहौल में होता है. बेदी अपने प्रशंसकों के साथ फूलों-मालाओं की अदला-बदली करती हैं. फिर कोई ट्रक के आगे चढ़ जाता है. उसके हाथ में एक पेटी है जो सफेद कबूतरों से भरी है. बेदी उनमें से एक को अपने हाथ में पकड़ती हैं और लोगों की करतल ध्वनि के बीच आजाद कर देती हैं. चुनाव प्रचार अभियान में कबूतरों को छोड़े जाने का प्रतीक मेरी समझ् के बाहर है. लेकिन पश्चिमी दिल्ली में आपके पास है तो शान से दिखाइए और अगर नहीं है तो भी भाड़ में जाए, फिर भी दिखाइए.

अगर सुकेतु मेहता ने मुंबई को हमारी मैक्सिमम सिटी कहा तो, हम पश्चिमी दिल्ली को हमारी मैक्सिमम सब-सिटी कह सकते हैं. ऐसा कतई नहीं कि वहां विविधता नहीं है, लेकिन स्टाइल व उप-संस्कृति दोनों को ही तय करने का काम वहां के विभिन्न इलाकों—पटेल नगर, कीर्ति नगर, राजेंद्र नगर, पीरागढ़ी, मियांवाली और राजौरी गार्डन में विभाजन के बाद बसे हिम्मती पंजाबी शरणार्थी करते हैं. पंजाबी शरणार्थियों ने अपनी जिंदगियों और संपन्नता को फिर से खड़ा किया. गफ्फार मार्केट (जिसका नाम सीमांत गांधी खान अब्दुल गफ्फार खान के नाम पर पड़ा क्योंकि यहां पेशावर के कई शरणार्थियों को बसाया गया था) की एक दुकान बड़े गौरव के साथ कहती है: सिर्फ अकेले, सबको पेले. इसका मतलब बताना तो किसी पारिवारिक मैग्जीन में मुश्किल है लेकिन इतनाभर कहकर समझया जा सकता है कि मेरा सामान अकेला ही सारे प्रतिस्पर्धियों को चित कर सकता है.{mospagebreak}

बेदी कहती हैं कि यह एशिया का सबसे बड़ा बाजार है. मुझे इस बात पर यकीन तो नहीं लेकिन फिर यह डर भी नहीं कि शी जिनपिंग मोदी के साथ अगली बैठक में इसका मुद्दा उठाएंगे इसलिए मैं मान लेता हूं. सड़क के पार देखता हूं तो मुझे देवताओं पर भी एकाधिकार नजर आता है. साइनबोर्ड पर दुनियाभर के सभी धर्मों के देवी- देवताओं का नाम लिखा है और दुकान में तस्वीरें, मूर्तियां, तोहफे, रूमाल, गुरुद्वारों के लिए गुलबंद और अजमेर शरीफ के लिए चादरें—सब कुछ बिक रहा है. सारे देवता एक ही दुकान में—यकीनन यह किसी पंजाबी शरणार्थी के दिमाग की ही उपज है.

पश्चिमी दिल्ली ने दिल्ली को इसका पंजाबी रंग-ढंग दिया है—अपने खाने, संपन्नता, ऐंठ, कोलेस्ट्रोल, सेल्युलाइट, डोले, अक्ल और त्योरियों से लकदक. विराट कोहली, शिखर धवन, वीरेंद्र सहवाग, गौतम गंभीर, ईशांत शर्मा—इन सभी में कौन-सी बात एक जैसी है? ये सभी पश्चिमी दिल्ली से हैं. पूर्वी दिल्ली की ही तरह वहां भी हर घर में कोई उद्यम है और वह दशकों से फल-फूल रहे हैं. साथ ही ये लोग दक्षिण दिल्ली में और गुडग़ांव और नोएडा के नए आधुनिक उपनगरों में प्रॉपर्टी में निवेश कर रहे हैं. यहां भी उनकी पहचान का पहला निर्धारण पैसे से ही होता है. चूंकि पैसा तो वे खूब कमा चुके हैं, इसलिए वे स्टेटस चाहते हैं—दिल्ली में अपनी हैसियत को थोड़ा ऊपर करना चाहते हैं. उन्हें बुलगारी चश्मे, सैविल रो सूट और “माई फ्रेंड बराक” वाले नरेंद्र मोदी किसी गुज्जू की बजाए पश्चिमी दिल्ली के एक ज्यादा लायक पंजाबी प्रतीत होते हैं. बीजेपी की झोली यहां भरी नजर आती है.

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