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जल जीवन कमिशन

फर्जी निविदाएं, बढ़े-चढ़े ठेके और अपने-अपने हिस्से की बंदरबांट ने राज्य की जल जीवन योजना में 979 करोड़ रुपए का बंटाढार किया

आखिर फंस गए पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव सुबोध अग्रवाल हिरासत में
अपडेटेड 30 जून , 2026

राजस्थान भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) ने 4 जून को रिटायर्ड आइएएस अफसर और जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग (पीएचईडी) के पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव सुबोध अग्रवाल के खिलाफ 17,500 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की.

इसके साथ ही भ्रष्टाचार के एक बड़े मामले का पिटारा खुल गया. अग्रवाल अप्रैल 2022 से जनवरी 2024 तक जल जीवन मिशन (जेजेएम) की योजनाओं को लागू करने वाले विभाग के प्रमुख थे.

जांचकर्ताओं का आरोप है कि इसी दौरान दो फर्मों, मेसर्स श्री गणपति ट्यूबवेल कंपनी और मेसर्स श्री श्याम ट्यूबवेल कंपनी ने 2021 से 2023 के बीच फर्जी दस्तावेजों के आधार पर 979 करोड़ रुपए के ठेके हासिल किए.

इसमें पीएचईडी के वरिष्ठ अधिकारियों की सक्रिय मिलीभगत थी. खुद को योग्य ठहराने के लिए इन फर्मों ने रेल मंत्रालय के तहत आने वाली सार्वजनिक क्षेत्र की नवरत्न कंपनी इरकॉन के नाम से कथित तौर पर फर्जी वर्क-कंप्लीशन सर्टिफिकेट जमा किए. 16 फरवरी, 2023 को इरकॉन ने अग्रवाल को ईमेल भेजकर चेताया कि सर्टिफिकेट फर्जी हैं.

आरोप है कि इस चेतावनी को दबा दिया गया. इससे इन फर्मों को कई जिलों में पाइपलाइन, पंप और घर-घर नल कनेक्शन के ठेके हासिल करने का रास्ता मिल गया. जांचकर्ताओं का आरोप है कि फरार पूर्व सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर मुकेश गोयल ने इरकॉन में निजी ऑफिस असिस्टेंट मुकेश पाठक के साथ मिलकर फर्जी सर्टिफिकेट बनाए और पीएचईडी के सत्यापन ईमेलों के जवाबों का मसौदा बनाया.

पंद्रह अगस्त, 2019 को शुरू हुए जल जीवन मिशन का लक्ष्य 2024 तक हर ग्रामीण घर को नल के कनेक्शन से जोड़ने का था. राजस्थान में लक्ष्य फंक्शनल हाउसहोल्ड टैप कनेक्शन (एफएचटीसी) को 11.5 लाख (10.84 फीसद) घरों से बढ़ाकर 100 फीसद तक ले जाना था. इसके लिए 93 लाख और घरों को जोड़ना था और इसकी अनुमानित लागत 55,000 करोड़ रुपए थी. दिसंबर 2023 में भजनलाल शर्मा के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने अशोक गहलोत की कांग्रेस सरकार की जगह ली.

तब तक 48 लाख ग्रामीण घरों (44.9 फीसद) तक नल कनेक्शन पहुंचे थे और केवल 18,000 करोड़ रुपए खर्च हुए थे. राजस्थान तब तक 71 फीसद कवरेज पार कर चुके राष्ट्रीय औसत से काफी पीछे था. मई 2026 तक, यानी पहले चरण के पूरा होने की तय समयसीमा से दो साल बाद कवरेज बढ़कर ग्रामीण घरों के 58.96 फीसद तक पहुंचा है.

इस बारे में मूल मामला 2024 में दर्ज हुआ. राज्य एसीबी, केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ) और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की मुख्य जांच सैकड़ों मंजूर निविदाओं से जुड़ी थी. लेकिन एसीबी महानिदेशक गोविंद गुप्ता के मुताबिक, असल कहानी उन करीब 20,000 करोड़ रुपए की निविदाओं में छिपी है, जिन्हें रद्द करके दोबारा निविदा निकालने का आदेश दिया गया.

इस रैकेट में फर्जी अनुभव प्रमाणपत्र, जाली बैंक गारंटी, बोली लगाने वालों की पहचान उजागर करके कार्टेल बनाना और बढ़ी हुई बोलियां शामिल थीं. इनमें टेंडर प्रीमियम यानी अनुमानित परियोजना लागत और ठेकेदार की बताई रकम के बीच का फर्क 46 फीसद तक था. औसत टेंडर प्रीमियम 20 फीसद से ज्यादा था. धोखाधड़ी की साजिश से जुड़ी विभिन्न प्राथमिकियों के मुताबिक, इसका कुछ हिस्सा कथित तौर पर रिश्वत के रूप में अधिकारियों को वापस भेजा जाना था.

बार-बार शिकायतों और कानूनी नोटिसों के बाद भी परियोजनाओं को जारी रहने दिया गया. असल में टेंडर प्रीमियम का काम इतना बेखौफ शुरू हो गया था कि प्रशासन के भीतर चिंता पैदा हो गई. तब के अतिरिक्त मुख्य सचिव (वित्त) और बाद में पीएचईडी और फिर भाजपा सरकार में मुख्यमंत्री कार्यालय में गए अखिल अरोड़ा उन लोगों में से थे जिन्होंने खतरे की घंटी बजाई. आखिरकार, 2 जनवरी, 2023 को वित्त विभाग ने जेजेएम के 27 बड़े कामों की दोबारा बोली लगाने के आदेश जारी किए. उनमें प्रीमियम 10 फीसद से ज्यादा था. सूत्रों के मुताबिक, दोबारा निविदा निकालने से सरकार के 4,300 करोड़ रुपए बचे.

घोटाले के पीछे के लोग
अग्रवाल इस कथित घोटाले का चेहरा बन गए लेकिन चार्जशीट 10 और लोगों के खिलाफ भी दाखिल हुई है. इनमें पीएचईडी के तीन मौजूदा चीफ इंजीनियर भी शामिल हैं, जिन्हें फरवरी 2026 में गिरफ्तार किया गया था. गहलोत सरकार में पीएचईडी मंत्री रहे महेश जोशी और कथित बिचौलिए संजय बड़ाया के खिलाफ चार्जशीट अब भी लंबित है. दोनों को मई में गिरफ्तार किया गया था. जनवरी 2024 में अग्रवाल को पीएचईडी से हटा दिया. उनके और दूसरे वरिष्ठ इंजीनियरों के खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी 2025 में दी गई.

यह बात अग्रवाल के 31 दिसंबर को रिटायर होने से कुछ ही हफ्ते पहले की है. अप्रैल में राज्य विधानसभा में जेजेएम घोटालों की जांच पर पूछे जाने पर पीएचईडी मंत्री कन्हैयालाल चौधरी ने कहा कि ''हर गड़बड़ी की जांच की जाए,'' तो ''पूरा विभाग खाली हो जाएगा''. एक ज्यादा चौंकाने वाला आरोप गिरफ्तार कार्यकारी इंजीनियर विशाल सक्सेना से जुड़ा है. जांचकर्ताओं के मुताबिक, उन्होंने कोच्चि के एक होटल के कमरे में अस्थायी दफ्तर बनाया, ताकि ऐसी तस्वीरें तैयार की जा सकें जिनसे लगे कि वे इरकॉन दफ्तर में आधिकारिक सत्यापन दौरे पर गए थे.

केंद्रीय एजेंसियों को दिए बयानों में उन्होंने कथित तौर पर कहा कि उन्होंने अग्रवाल और वरिष्ठ इंजीनियरों के निर्देश पर ऐसा किया. अब इन्हीं बयानों को उनकी गिरफ्तारियों का आधार बनाया गया है.

भला कैसा टेंडर
सवाल पूछा जा रहा है कि अगर इरकॉन ने फर्जी दस्तावेजों को लेकर पीएचईडी को पहले ही चेतावनी दी थी, तो 9 मई, 2023 को वित्तीय समिति ने आरोपी फर्मों के वर्क ऑर्डर क्यों मंजूर किए और करीब 112 करोड़ रुपए का भुगतान क्यों जारी हुआ? अग्रवाल का कहना है कि धोखाधड़ी की पुष्टि होते ही निविदाएं रद्द कर दी गई थीं, भुगतान सिर्फ पूरे हुए काम के लिए किया गया था और कोई गलत भुगतान हुआ है तो उसे वसूला जा सकता है. अभियोजन की मंजूरी मिलने के बाद उन्होंने इंडिया टुडे से कहा, ''निविदाओं में सरकार को कोई नुक्सान नहीं हुआ. खराब अमल अलग मुद्दा है, जो मेरे अधिकार क्षेत्र से बाहर है.''

राजस्थान हाइकोर्ट में अपने खिलाफ एफआइआर को चुनौती देते हुए उन्होंने दलील दी कि जांच के दायरे में आए करीब 90 फीसद टेंडर उनके पूर्ववर्ती अधिकारी सुधांश पंत के कार्यकाल में मंजूर हुए थे. पंत जनवरी 2021 से अप्रैल 2022 तक पीएचईडी में अतिरिक्त मुख्य सचिव थे. पंत ने अपना पक्ष रखने से इनकार कर दिया लेकिन उनके समय के एक अधिकारी का कहना है कि उस समय हस्तक्षेप की कोई वजह नहीं थी, क्योंकि उनके कार्यकाल में कोई शिकायत नहीं आई थी. इसके बाद पंत को केंद्र और राज्य में कई अहम पदों पर तैनाती मिली. 2024 में वे राज्य के मुख्य सचिव बनकर आए और 2025 में फिर केंद्र में लौट गए.

घोटाले से जुड़ी कई जनहित याचिकाएं दायर कर चुके वकील टी.एन. शर्मा कहते हैं कि जांच बहुत धीमी चल रही है: ''कई एजेंसियां 2023 से इन मामलों की जांच कर रही हैं, फिर भी प्रगति सीमित है. उन्होंने मुख्य रूप से दो फर्मों पर ध्यान दिया है लेकिन दर्जन भर और फर्मों की जांच होनी चाहिए. एक वरिष्ठ इंजीनियर भी है जिसने फर्जी बैंक गारंटी प्रमाणित की और हजारों काम करवाए.'' इनमें जयपुर की एक निजी यूनिवर्सिटी भी शामिल है, जिस पर आरोप है कि उसने करोड़ों रुपए के जागरूकता अभियान ठेके हासिल करने को फर्जी अनुभव विवरण और गांवों में कवरेज के बढ़े-चढ़े आंकड़े जमा किए.

जेजेएम परियोजनाओं की क्वालिटी ऑडिट से भी गड़बड़ी की गहराई की थाह मिलती है. कई जगह पानी उपलब्ध है या नहीं, यह पता लगाए बिना ही पाइपलाइन बिछा दी गई. घटिया पानी की टंकियां, 'डुप्लिकेट' जॉब वर्क, हरियाणा में जेजेएम परियोजनाओं से चोरी होने के शक वाली पाइपों की बरामदगी...गड़बड़ियों की लंबी सूची की ये चंद मिसालें हैं.

असल में राजस्थान के इस घोटाले ने नई दिल्ली को इतना चिंतित किया कि राष्ट्रीय स्तर पर नीति में बदलाव करने पड़े. केंद्र ने अब जेजेएम के तहत अमान्य खर्चों की सूची सात श्रेणियों से बढ़ाकर 10 कर दी है. संशोधित ढांचा सिर्फ ढांचा खड़ा करने के बजाए पानी की सप्लाइ पक्की करने पर भी ध्यान देता है. पूरे भारत में कई गांवों में नल कनेक्शन तो हैं लेकिन पानी बहुत कम या बिल्कुल नहीं आता, क्योंकि जोर सेवा देने के बजाए बोरिंग करने, टंकी लगाने और पाइप बिछाने पर था. राजनीति ने स्वाभाविक रूप से विवाद को और तेज कर दिया है.

केंद्रीय पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, जो जेजेएम शुरू होने के समय जल शक्ति मंत्री थे, गिरफ्तारियों को कार्रवाई का सबूत बताते हैं. वहीं गहलोत इन गिरफ्तारियों को भाजपा सरकार की 'बदले की भावना' बताते हैं. उनका आरोप है, ''असल में अग्रवाल की गिरफ्तारी ने अफसरशाही को इतना डरा दिया है कि नीतिगत ठहराव पैदा हो गया है.'' मुख्यमंत्री शर्मा इस आरोप को खारिज करते हैं. उन्होंने इंडिया टुडे से कहा, ''हमारी सरकार ने हर स्तर पर भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई की है...जेजेएम भी इसका अपवाद नहीं.''

इन सबके बीच, राज्य के पानी के लिए तरसते इलाकों तक पानी पहुंचाने की बड़ी चुनौती अब भी अधूरी है. राजस्थान में जल जीवन मिशन की विडंबना यही है: हजारों करोड़ रुपए खर्च हुए, हजारों किलोमीटर पाइपलाइन बिछी, फिर भी हजारों घरों के लिए नल का पानी अब भी सपना ही है.

''हालत बहुत नाजुक है जी. जल जीवन मिशन घोटाले की अगर व्यापक पैमाने पर जांच की जाए तो मेरा तो पूरा महकमा ही खाली हो जाएगा.''
कन्हैया लाल चौधरी, जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी मंत्री, राजस्थान

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