मध्य प्रदेश में राज्यसभा की सीट के लिए मीनाक्षी नटराजन का नामांकन जिस तरह रद्द हुआ, वह भाजपा के बजाए कांग्रेस के बारे में ज्यादा कुछ कहता है. इसने कांग्रेस की लाइलाज अंतर्कलह, खराब तैयारी और पिछली गलतियों से न सीखने की आदतों को उघाड़कर रख दिया. भाजपा ने वही किया जो आक्रामक चुनावी मशीनरी से लैस पार्टी करती.
गणित सीधा-सादा दिखाई देता था. कुल 230 सदस्यों की विधानसभा में राज्यसभा के हर उम्मीदवार को पहली वरीयता के 58 वोट चाहिए थे. भाजपा के 164 विधायक हैं, वह दो सीटें जीत सकती थी. कांग्रेस के 62 विधायक हैं, वह एक सीट जीत सकती थी (दो विधायक मुकदमे होने से वोट नहीं दे सकते). लेकिन भाजपा ने तीसरे उम्मीदवार महेश केवट को उतारकर मुकाबला अनिवार्य बना दिया.
जांच के दिन 9 जून को भाजपा ने आपत्ति उठाई कि नटराजन ने फॉर्म 26 के हलफनामे में हैदराबाद की अदालत में लंबित मामले का खुलासा नहीं किया. निर्वाचन अधिकारी ने यह कहकर नामांकन खारिज कर दिया कि फॉर्म आधा-अधूरा है और तथ्य छिपाए गए हैं. 11 जून को भाजपा के तीनों उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित घोषित कर दिए गए.
कई कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि नामांकन खारिज करने के आधार कमजोर थे. जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 33ए के तहत खुलासा करना तभी जरूरी है जब दो या उससे ज्यादा की जेल की सजा वाले अपराध में आरोप तय कर दिए गए हों. हैदराबाद का मामला निजी शिकायत था जिसमें नटराजन का नाम प्रतिवादी के तौर पर आया. भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 223 के तरह संज्ञान से पहले का नोटिस दिया गया, लेकिन न तो एफआइआर दर्ज थी और न ही आरोप तय हुए थे.
अदालत से राहत नहीं
सुप्रीम कोर्ट से कांग्रेस को राहत नहीं मिली. उसने 12 जून को नटराजन की दलील यह कहकर खारिज कर दी कि जब चुनाव चल रहा हो, तब अदालत दखल नहीं दे सकती और उनके लिए उपाय चुनाव-बाद याचिका ही है. उसने इस बात पर कोई फैसला नहीं दिया कि नामांकन खारिज करना सही था या गलत. अलबत्ता इसमें एक कानूनी झोल है.
सुप्रीम कोर्ट ने मामले का सार बताते हुए कहा कि प्रतिवादियों की दलील के मुताबिक फॉर्म 26 में सभी आपराधिक मामलों का खुलासा करना जरूरी था, जिसमें 'आरोप तय' कॉलम केवल यह बताता है कि मामला किस चरण में है. ऐसे में सवाल खाली हलफनामे का नहीं, बल्कि यह है कि आरंभिक या विवादित कार्यवाही का खुलासा करना जरूरी था या नहीं.
अंदरूनी खींचतान
मगर कांग्रेस के लिए ज्यादा नुक्सानदेह कहानी अंदरूनी है. यह सीट दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह ने खाली की थी. हाल के समय में राज्यसभा चुनावों में लगे कांग्रेस के जख्म खुद उसके ही दिए हुए हैं. हरियाणा में 2016 में 14 अमान्य वोटों ने जीत के पत्ते को 'इंक गेट' या स्याही कांड में बदल दिया. फिर हरियाणा में ही 2022 में अजय माकन क्रॉस-वोटिंग, अमान्य मतपत्र और वोटों की बदइंतजामी के चलते संख्याबल होने के बावजूद हार गए.
हिमाचल प्रदेश में 2024 में अभिषेक सिंघवी को विपक्षी उम्मीदवार के बराबर वोट मिले और लॉटरी में वे हार गए. ओडिशा और हरियाणा में 2026 में यही बीमारी फिर उभर आई. कांग्रेस बुनियादी बातों पर ही चूकती रही है: विधायकों को प्रशिक्षण, गुटों की साजसंभाल, स्वीकार्य उम्मीदवार चुनना और आखिरी वोट पड़ने तक संख्याबल को महफूज रखना.
बावन वर्षीया नटराजन को राहुल गांधी ने 2008 में अपनी युवा नेताओं की टीम के लिए चुना था. 2009 में उन्होंने मध्य प्रदेश के मंदसौर से लोकसभा चुनाव जीता. फरवरी 2025 में वे तेलंगाना प्रभारी बनीं. वे चकाचौंध से दूर रहने वाली, विचारधारा की पक्की और वफादार हैं, यानी उस तरह की जमीनी गांधीवादी जिन्हें राहुल लंबे वक्त से आगे बढ़ाने की कोशिश करते आए हैं. इसीलिए यह घटना नामांकन के झटके से कहीं ज्यादा है.
नटराजन को राज्यसभा में आने का दूसरा रास्ता भले मिल जाए, लेकिन कांग्रेस ने दिखा दिया कि गणित पक्ष में होते हुए भी वह किस तरह से हार पक्की कर सकती है. कागजी मुस्तैदी, तैयारी और अनुशासन से तय होने वाले मुकाबले में भाजपा पूरे दमखम से उतरी, तो कांग्रेस बंटी हुई नजर आई.

