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रिसते घाव पर नई चोट

हिंसा भड़कने के तीन साल बाद अब नगा-कुकी समुदायों के बीच एक नया टकराव मणिपुर संघर्ष का नक्शा बदल सकता है

नगा, मैतेई और नेपाली महिलाएं कुकी उग्रवादियों के हाथों अगवा लोगों की रिहाई के लिए 18 मई को इंफाल में प्रदर्शन करते हुए
अपडेटेड 30 जून , 2026

पिछले करीब तीन साल से मणिपुर में पूरा संघर्ष खासतौर पर मैतेई और कुकी समुदाय के बीच के उस विवाद के इर्द-गिर्द केंद्रित रहा है, जो 3 मई 2023 को शुरू हुआ था.

इस हिंसा ने राज्य को दो हिस्सों में बांट दिया—एक तरफ मैतेई-बहुल इंफाल घाटी और दूसरी तरफ कुकी बहुल पर्वतीय जिले चुड़ाचांदपुर, कांगपोकपी और फेरजाल.

इसमें सैकड़ों लोग मारे गए और हजारों को अपना घर छोड़ना पड़ा. मगर नगा-बहुल जिले सेनापति, उखरुल, तामेंगलोंग, कामजोंग और नोनी काफी हद तक इस हिंसा से अछूते रहे थे.

लेकिन यह तटस्थता 2026 की शुरुआत में टूटने लगी. कांगपोकपी, सेनापति और उखरुल के कुछ हिस्सों में नगा और कुकी समुदायों के बीच तनाव ने एक नया मोर्चा खोल दिया है.

फरवरी में भड़की चिंगारी

इसके शुरुआती संकेत 7 फरवरी को मिले, जब उखरुल के लिटान सारेइखोंग गांव में शराब के नशे में धुत कुकी और नगा पुरुषों के बीच कथित तौर पर मारपीट हुई. इसके बाद पहाड़ी जिलों में कई जगह आपसी झड़पें हुईं. सूत्रों का अनुमान है कि स्थिति ज्यादा बिगड़ने से पहले ही अलग-अलग घटनाओं में करीब 20 लोग मारे जा चुके थे. इसके बाद 13 मई को हालात बेहद खराब हो गए, जब कांगपोकपी में थाडो (कुकी-जो उप-समूह) के तीन चर्च नेताओं और उनके ड्राइवर की हत्या कर दी गई.

कुकी संगठनों ने इसके लिए नगा सशस्त्र समूहों को जिम्मेदार ठहराया. वहीं, नगा संगठनों ने इस आरोप को खारिज करते हुए मामले की जांच की मांग की. हालांकि इस पर अब तक विवाद ही है कि इसके लिए कौन जिम्मेदार था लेकिन घटना के तुरंत बाद बदले की भावना से अपहरण की घटनाएं शुरू हो गईं. खबरों की मानें तो सेनापति और आसपास के इलाकों से 28 कुकी लोगों का, जबकि कांगपोकपी के लीलोन वाइफेई गांव और नजदीकी इलाकों से 20 नगा लोगों का अपहरण किया गया है.

हिंसक टकराव

14 मई को यानी 24 घंटे के भीतर ही दोनों पक्षों के बीच बातचीत के बाद दोनों तरफ से 14-14 बंधकों को रिहा कर दिया गया. लेकिन इसके बाद भी 14 कुकी और छह नगा दूसरे पक्ष के कब्जे में ही रहे. इस घटना के बाद कुकी-बहुल इलाकों में रहने वाले नगा समुदाय के लोग नगा क्षेत्रों की ओर चले गए, और नगा इलाकों में रहने वाले कुकी लोग कुकी क्षेत्रों में चले गए. इन विस्थापितों को रखने के लिए राहत शिविर बनाए गए.

बंधक संकट के बीच 17 मई को 'यूनाइटेड नगा काउंसिल' ने राष्ट्रीय राजमार्ग-2 पर अंतर-जिला बंद का आह्वान किया. इससे कीमतें आसमान छूने लगी हैं. कांगपोकपी में अब चावल की एक बोरी की कीमत करीब 5,000 रुपए, रसोई गैस सिलेंडर की कीमत 5,000 रुपए से ज्यादा और पेट्रोल 230 रुपए प्रति लीटर तक पहुंच गया है.

8 जून को हालात सुधरने की एक उम्मीद तब जगी, जब 25 दिनों के बाद बाकी बचे 14 कुकी बंधकों को भी रिहा कर दिया गया. हालांकि, यह उम्मीद अगले ही दिन टूट गई, जब सुरक्षा बलों को लीलोन वाइफेई गांव के पास लापता छह नगा बंधकों के शव मिले.

दोनों पक्षों के संगठनों ने इन मौतों की तो कड़ी निंदा की लेकिन यह तय नहीं किया जा सका कि इसके लिए कौन जिम्मेदार था. मणिपुर में नगा विमेन यूनियन की अध्यक्ष प्रिसिला थ्युमई ने सवाल उठाया कि आखिर ऐसा कैसे हो सकता है नगा उग्रवादी कुकी गांवों से घिरे इलाके में घुस जाएं, हमला करें और किसी की नजर में आए बिना वहां से निकल जाएं?

उन्होंने आरोप लगाया कि नगाओं पर हमलों के पीछे कुकी नेशनल फ्रंट-प्रेसिडेंट (केएनएफ-पी) का हाथ था. दूसरी तरफ, कुकी आदिवासी समुदाय की शीर्ष सामाजिक संस्था कुकी इनपी के नेताओं ने छह नगाओं की हत्या की निंदा की. कुकी इनपी सदर हिल्स के अध्यक्ष थंगमिनलेन किपगेन ने आरोप लगाया कि कुकी गांवों पर हमलों में एनएससीएन-आइएम और यूनाइटेड नगा डिफेंस फोर्स (यूएनडीएफ) शामिल थे.

इस हिंसा ने एसओओ समझौते के तहत आने वाले सशस्त्र समूहों को लेकर बहस को एक बार फिर गरमा दिया है. एसओओ संयुक्त निगरानी समूह में कुकी नेशनल फ्रंट (केएनएफ) का प्रतिनिधित्व करने वाले रोहन कुकी ने इसमें अपनी किसी भी भूमिका से इनकार किया है. उनका कहना है कि जब भी नगाओं या मैतेई लोगों पर हमला होता है, तो उनके फ्रंट का नाम उछाल दिया जाता है. ऐसे आरोपों का मकसद केंद्र सरकार के साथ जारी शांति वार्ता को भटकाना है.

मैतेई समुदाय के प्रभावशाली संगठन कोऑर्डिनेटिंग कमेटी ऑन मणिपुर इंटीग्रिटी (कोकोमी) के प्रवक्ता शांता नाहकपम ने कहा कि इस संकट को उग्रवाद, अलग राज्य की मांगों और मणिपुर के राजनैतिक भविष्य से अलग करके नहीं देखा जा सकता. उनका तर्क है कि अवैध प्रवासन और एसओओ समूहों को लेकर मैतेई और नगा दोनों समुदायों की चिंताएं एक-सी हैं, और कुकी समूहों के प्रति केंद्र का ढुलमुल रवैया अविश्वास की खाई को बढ़ा रहा है.

संघर्ष का बढ़ता दायरा
यह हिंसा जल्द ही इंफाल घाटी तक फैल गई. 15 और 16 जून को इंफाल के रीजनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (रिम्स) के बाहर विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए, जब कांगपोकपी के लीलोन मुनलुई गांव में एक धमाके में घायल तीन कुकी युवाओं को इलाज के लिए वहां पर भर्ती कराया गया. प्रदर्शनकारियों ने मैतेई-बहुल इंफाल में स्थित रिम्स में उनके इलाज का विरोध किया. आखिरकार 17 जून को भारी सुरक्षा के बीच तीनों घायलों को चुड़ाचांदपुर मेडिकल कॉलेज में शिफ्ट कर दिया गया.

राज्य में 4 फरवरी को निर्वाचित सरकार की वापसी के बाद से ही उसका रवैया काफी हद तक केवल घटनाओं के बाद कदम उठाने की खानापूरी करने जैसा रहा है. सरकार हर बड़ी घटना के बाद कर्फ्यू लगाने, इंटरनेट बंद करने, सुरक्षा बल तैनात करने, एनआइए जांच के आदेश देने और स्थानीय स्तर पर तनाव घटाने के लिए बातचीत करने जैसे कदम उठा रही है.

मार्च में नए मुख्यमंत्री युमनाम खेमचंद सिंह ने कुकी-जो काउंसिल के साथ सीधी बातचीत शुरू की और पहली अप्रैल को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने उनके साथ मणिपुर के हालात की समीक्षा भी की. मगर स्वतंत्र विश्लेषकों का कहना है कि बेरोकटोक आम लोगों के हाथों तक हथियार पहुंचना शांति की राह में सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है. पुलिस भी मानती है कि लूटे गए हथियारों में से अब तक केवल 70 फीसद ही बरामद किए जा सके हैं.

तीन साल बाद, मणिपुर के भीतर आई दरार और ज्यादा जटिल हो गई है. घाटी पहले से ही पर्वतीय क्षेत्रों से कट गई थी, और अब पर्वतीय क्षेत्र भी जातिगत आधार पर विभाजित हो रहे हैं. वर्ष 2026 का यह बंधक संकट कहीं मणिपुर के संघर्ष में एक नए और खतरनाक दौर की शुरुआत तो नहीं. 

ह्रिजॉय दास कानूनगो और केनी फुरेलतपम

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