scorecardresearch

रायलसीमा में भी अब उठीं चिनगारियां

पिछली कुछ घटनाओं पर गौर करें तो पता चलता है कि आमतौर पर शांत रहने वाला आंध्र प्रदेश अब सांप्रदायिकता की चपेट में आ रहा है

कडप्पा के अल्मासपेट में पुलिस का लाठीचार्ज
अपडेटेड 23 जून , 2026

- प्रसाद निचेनमेटला

वर्ष 2014 में राज्य के बंटवारे और पुरानी राजधानी हाथ से निकल जाने के बाद ऐसा लगा था कि आंध्र प्रदेश ने हिंदू-मुस्लिम टकराव के अपने अतीत को पीछे छोड़ दिया है. लेकिन पिछले कुछ समय से धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति एक बार फिर राज्य की हवाओं में घुलने लगी है. मई में रायलसीमा के अंदरूनी इलाके कडप्पा के अल्मासपेट जंक्शन पर यह स्थिति पूरी तरह खुलकर सामने आई. 

सारा विवाद गोलचक्कर पर बने एक गुंबदाकार ढांचे को लेकर हुआ—जो पूरी तरह से एक धर्मनिरपेक्ष ढांचा है. मुस्लिम समूहों की इच्छा थी कि इस चौराहे का नाम टीपू सुल्तान के नाम पर रखा जाए. फरवरी में नगर निगम ने इसके समर्थन में एक प्रस्ताव पारित किया लेकिन मंजूरी अटकने पर आधिकारिक अधिसूचना जारी नहीं हो सकी. इस पर कड़ा विरोध जताने वाले हिंदुत्ववादी समूह नजदीक स्थित एक मंदिर के सम्मान में इसका नाम 'हनुमान सर्कल' रखने का सुझाव दे रहे थे.

नाम पर झगड़ा
नौ मई को जब दोनों पक्षों के लोग बड़ी संख्या में उस जगह जमा हुए तो तनाव की स्थिति बन गई. हिंदू पक्ष 31 फुट ऊंची हनुमान जी की मूर्ति लगाने की कोशिश में था जबकि मुस्लिम पक्ष इसे रोकने पर अड़ा था. सबसे पहले तो उन्होंने एक-दूसरे के खिलाफ नारेबाजी की और फिर वे पथराव पर उतर आए. इससे लाठीचार्ज की नौबत आ गई. शहर में अगले कई दिनों तक तनाव कायम रहा. नागरिक अधिकारों के लिए काम करने वाले एक समूह ने अपनी जांच रिपोर्ट में आरोप लगाया कि चुनिंदा तरीके से मुसलमानों की गिरफ्तारियां की गईं और भेदभावपूर्ण कार्रवाई हुई. हालांकि पुलिस ने इन आरोपों से इनकार किया.

हाल के दिनों में रायलसीमा में छोटी-मोटी झड़पें देखने को मिली हैं—जैसे हनुमान यात्राओं का मस्जिदों के पास से गुजरना, या फिर गली क्रिकेट के दौरान मामूली घटनाओं का हिंसा में बदल जाना. सत्ताधारी तेलुगुदेशम पार्टी (टीडीपी) की सहयोगी भारतीय जनता पार्टी 'मुस्लिम कट्टरपंथ' का मुद्दा उठा रही है और इसके पीछे प्रतिबंधित संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया की मौजूदगी को जिम्मेदार बता रही है.

असहजता भरा माहौल
आंध्र प्रदेश की कुल आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी सिर्फ 7.3 फीसद है लेकिन रायलसीमा में यह आंकड़ा करीब दोगुना हो जाता है. कुरनूल, कडप्पा, नांदयाल, हिंदूपुरम और अडोनी जैसे कस्बों में यह हिस्सेदारी 30 फीसद तक पहुंच जाती है, जिससे प्रतीकात्मक स्थलों के आसपास होने वाले मामूली टकरावों के बड़े संघर्ष में बदलने का अंदेशा बना रहता है.

रायाचोटी—जहां मार्च 2025 में कुछ इलाकों से वीरभद्र स्वामी की मूर्ति का जुलूस गुजरने पर आपत्ति जताई गई थी—में मुसलमानों की आबादी करीब 50 फीसद है. इन आंकड़ों और समुदाय की चिंताओं को ध्यान में रखते हुए ही चंद्रबाबू नायडू ने 2014 और 2024 में रायलसीमा में चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा के साथ अपने गठबंधन को ज्यादा तवज्जो नहीं दी थी.

दूसरी तरफ तटीय इलाकों में हिंदुत्ववादी समूह दलितों के आमने-सामने हैं, जिनका कहना है कि दलित ईसाई धर्म अपनाने के बावजूद आरक्षण का फायदा उठाते हैं. पश्चिमी गोदावरी जिले के अकीवीडु में रामनवमी के दौरान झड़पें हुईं जब हिंदुत्ववादी एक जर्जर मंदिर में राम जी की मूर्तियों पर माला चढ़ाने पहुंचे. स्थानीय दलितों ने इसका कड़ा विरोध किया. उनका कहना है कि यह ढांचा ऐतिहासिक रूप से एक धर्मशाला है और माला समुदाय से जुड़ी गांव की देवी गोंथेनम्मा का मंदिर था. दलितों का आरोप है कि वहां भगवान राम और सीता की मूर्तियां हाल ही जबरन रखी गई हैं. 

Advertisement
Advertisement