
यह एक ऐसी गली है जो दिल्ली के दर्जनों शहरी गांवों में से किसी में भी देखने को मिल सकती है. अंधेरी और संकरी गलियां जहां सूरज की रोशनी नहीं पहुंचती क्योंकि एक के ऊपर एक रखी माचिस की डिब्बियों जैसी इमारतों और चारों तरफ लटकते बिजली के तारों के जाल में वह उलझकर रह जाती है.
मालवीय नगर और साकेत के बीच कसमसाता हौज रानी भी बाकी जगहों से अलग नहीं. बुरी तरह ट्रैफिक जाम का शिकार. मगर साकेत के अस्पतालों के सामने बसे होने के चलते यहां के पुराने बाशिंदों और किराएदारों के साथ सस्ते कमरों की तलाश में आने वाले मेडिकल टूरिस्ट्स की भीड़ भी जुड़ गई है.
फ्लोरिश स्टे भी इन्हीं के लिए था. नीचे रेस्तरां और ऊपर बीऐंडबी (बेड ऐंड ब्रेकफास्ट), यानी रात भर ठहरने की सुविधा और सुबह का नाश्ता. छह कमरों के लाइसेंस पर करीब 28 कमरे चल रहे थे यानी ऐसा उल्लंघन जिस पर दिल्ली में आमतौर पर कोई ध्यान नहीं देता. लेकिन तीन जून की सुबह, पांच मंजिला यह इमारत दिल्ली के पिछले कई बरसों के सबसे भयावह हादसों में से एक की गवाह बन गई.
आग की संभावित वजह एक इलेक्ट्रिक ऑयल फ्रायर था जो बहुत ज्यादा गरम हो गया और उससे चिंगारी निकली. जैसे ही आग ने रसोई को अपनी चपेट में लिया, दहशतजदा रसोइए ने भागने से पहले बिजली के मेन स्विच बंद कर दिए. अनजाने किए इस काम से इमारत का इलेक्ट्रॉनिक डोर लॉकिंग सिस्टम ठप हो गया और मेहमान भीतर के कमरों में फंस कर रह गए.
बाईस लोगों की जान गई. आग से नहीं, दम घुटने से. इनमें से 13 लोग नाइजीरिया, मोजांबीक, किरगिजिस्तान, उज्बेकिस्तान, बांग्लादेश, कांगो, इराक और लाइबेरिया सरीखे देशों से थे. वे अपने इलाज के लिए या इलाज करवा रहे परिजनों के तीमारदार के रूप में दिल्ली आए थे. इसमें गुड़गांव के एक परिवार के आठ लोग भी मारे गए. उन्होंने ग्रुप बुकिंग करवाई थी ताकि परिवार के 80 वर्षीय बुजुर्ग, जो सड़क के उस पार मैक्स साकेत की इंटेंसिव केयर यूनिट में भर्ती थे, से मिलने में आसानी हो.
आसपास के लोग अगर बचाव के काम में न जुटे होते तो मौत का आंकड़ा कहीं ज्यादा हो सकता था. मैक्स में सुरक्षा अधिकारी का काम करने वाले वसीम मदद के लिए दौड़ने वालों में थे. वे कहते हैं, ''अरमान नाम का एक लड़का अपने वालिद रियाजुद्दीन मंसूरी के साथ मिलकर गद्दों की दुकान चलाता है. उसने हमें अपने सारे गद्दे दे दिए. हमने वे सब जमीन पर बिछा दिए और लोगों से उन पर कूदने को कहा. इससे उनकी जान बच गई.'' मंसूरी पिता-पुत्र को दो लाख रुपए का नुक्सान हुआ. उन्हें अब 'हौज रानी के हीरो' कहा जा रहा है.
उपहार के अंगारे
हौज रानी का हादसा भी आग की उन बड़ी घटनाओं जैसा है, जिसमें लोगों की मौत आग की चपेट में नहीं बल्कि एक तरह के जाल में फंसने की वजह से होती है. 13 जून, 1997 की वह दोपहर याद कीजिए जब ग्रीन पार्क के उपहार सिनेमा में ट्रांसफॉर्मर की आग से 59 जिंदगियां चली गई थीं और 100 से ज्यादा लोग घायल हुए थे.
मालवीय नगर की तस्वीरों ने नीलम कृष्णमूर्ति की पुरानी और दर्दनाक यादें ताजा कर दीं, जिन्होंने उपहार हादसे में अपने दो बच्चों को खोया था. उनका मानना है कि बात केवल गड़बड़ियों को देखकर अधिकारियों के ''अनजान बन जाने'' की नहीं बल्कि बड़े पैमाने पर फैले भ्रष्टाचार की है. वे कहती हैं, ''हम सब जानते हैं कि पैसों के दम पर एनओसी बांटे जाते हैं. अब हादसे के बाद दिखावे के लिए तुरंत कुछ कार्रवाई की जाएगी. इमारतों की जांच होगी, कुछ समय के लिए बंद कर दिया जाएगा...लेकिन जैसे ही लोग बात भूलने लगेंगे, सब फिर से खोल दिया जाएगा.''
ऐसा ही हुआ. हौज रानी में आसपास के नौ गेस्ट हाउस बंद करा दिए गए. सभी में रास्ता बेहद संकरा था और एक ही जगह को कई तरह से इस्तेमाल किया जा रहा था. ऐसे हादसे वहां कई विभागों की मिलीजुली नाकामियों का नतीजा होते हैं. सभी सरकारी एजेंसियों को तालमेल से काम करना होता है लेकिन उम्मीद के मुताबिक वे इसका उल्टा करती हैं. मसलन, दिल्ली फायर सर्विस आग की रोकथाम और प्रतिक्रिया के लिए जिम्मेदार है. इमारतों के नक्शे पास करने की जिम्मेदारी नगर निगम की होती है. लाइसेंस देने वाले पुलिस अधिकारियों की जिम्मेदारी के दायरे में कई व्यावसायिक गतिविधियां हैं. शहरी विकास का काम दिल्ली विकास प्राधिकरण और जिला प्रशासन जैसी एजेंसियों के अधीन है.

बेकाबू-बेभाव फैलता शहर
जांच-पड़ताल और सर्टिफिकेट देने पर टिकी हमारी व्यवस्था में वैसे ही मानवीय कमियां देखने को मिलती हैं. ऊपर से अब यह व्यवस्था 3.5 करोड़ की आबादी वाले इस तेजी से बढ़ते महानगर का मुकाबला करने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रही है. दिल्ली में इस समय 1,731 अनधिकृत कॉलोनियां हैं. इसी साल अप्रैल में घोषणा हुई कि इनमें से 1,511 कॉलोनियों को 'जस का तस' के आधार पर नियमित किया जाएगा यानी लगभग 45 लाख लोग अब एक अनिश्चित माहौल से निकलकर दिल्ली के कानूनी नागरिक बन जाएंगे.
नियमन में देरी और प्लानिंग की कमियां हमेशा से शहरी योजनाकारों और फायर सेफ्टी विशेषज्ञों के लिए चिंता का विषय रही हैं. संकरी सड़कों और अवैध कब्जों की वजह से दमकल की गाड़ियों को हादसे वाली जगह तक पहुंचने में मशक्कत करनी पड़ती है. बगैर सुरक्षा इंतजाम के रिहाइशी मकानों को गेस्ट हाउस, क्लिनिक, गोदाम और रेस्तरां में बदल दिया जाता है. एक काम के लिए बने बिजली सिस्टम पर कई गुना लोड डाल दिया जाता है.
दिल्ली फायर सर्विस के रिकॉर्ड बताते हैं कि यहां सालाना औसतन 20,000 से ज्यादा इमरजेंसी कॉल आती हैं. अकेले 2026 के शुरुआती चार महीनों में आग लगने की 6,693 घटनाएं दर्ज की गईं. मार्च के मुकाबले अप्रैल महीने में आग लगने की कॉल्स में 73 फीसद का भारी उछाल देखा गया. मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने इसे लेकर एक समीक्षा बैठक बुलाई है. हर हादसे के बाद की तरह इस बार भी कई तरह के कदमों की घोषणा की गई जैसे, जॉइंट इंस्पेक्शन टीम, ड्रोन सर्वे, निर्माण कार्यों पर सैटेलाइट से नजर, डिजिटल मैपिंग, जिलाधिकारियों को और ज्यादा पावर देना और लापरवाह अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई.
दिल्ली के गृह मंत्री आशीष सूद का कहना है कि सरकार का लक्ष्य एक ऐसा फूलप्रूफ सिस्टम बनाना है जिससे ऐसे हादसों पर रोक लग सके. लेकिन वे भी इस बात से सहमत हैं कि ''दिल्ली में अलग-अलग सरकारी एजेंसियों और विभागों की वजह से नियमों को कड़ाई से लागू करना हमेशा मुश्किल रहा है.'' और इसी खतरे की संकरी गली में दिल्ली आज भी फंसी हुई है.

