सप्ताहांत होने के बावजूद पटना स्थित 1, अणे मार्ग यानी बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के आवासीय कार्यालय में खासी गहमागहमी है. एक अतिरिक्त मुख्य सचिव, कुछ विधायक और एक प्रबंधन संस्थान के प्रशासनिक प्रमुख उस व्यक्ति से मिलने के लिए अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं, जो मुख्यमंत्री पद संभाले हुए कुछ दिन बाद दो महीने पूरे करने वाला है.
गलियारे के दूसरी ओर, बिखरे कागजों, फाइलों और हाथ से लिखे नोट्स से अटी मेज के पीछे बैठे सम्राट चौधरी के चेहरे पर अधिकारपूर्ण भाव साफ झलकता है. यह बिहार की शासनशैली में आ रहे बड़े बदलाव का संकेत है. उनके पूर्ववर्ती नीतीश कुमार की प्रशासनिक कार्य संस्कृति की पहचान अक्सर लंबी और थकाऊ समीक्षाओं, फाइलों को विस्तार से पढ़ने और 'पिछली प्रेजेंटेशन स्लाइड फिर से दिखाओ-समझाओ' सरीखे हस्तक्षेप से होती थी.
मगर चौधरी का नजरिया नतीजों पर केंद्रित लगता है. वे दो टूक कहते हैं: 'मुझे नतीजा दिखाओ.' इसके पीछे छिपा सियासी संदेश भी एकदम साफ है: भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) चाहती है कि बिहार उसके नेतृत्व में स्पष्ट तेजी और ताकत का प्रदर्शन करे.
पिछले महीने जिला मजिस्ट्रेटों और पुलिस अधीक्षकों के साथ एक व्यापक समीक्षा बैठक में मुख्यमंत्री ने लगभग 25 मिनट तक गंभीरतापूर्ण लहजे में अपनी बात रखी. चौधरी ने साफ कहा कि अपराधियों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाना चाहिए. उन्होंने वरिष्ठ अधिकारियों से कहा कि जो लोग छोटी बच्चियों पर हमला करते हैं, उनसे सख्ती से निबटा जाए. मुख्यमंत्री ने कहा कि उन्हें ''माला पहना दीजिए.''
इसे शातिर अपराधियों को निबटाने का संकेत माना जा रहा है. एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, ''वे पुरानी नौकरशाही वाली भाषा में बात नहीं करते कि 'कानून अपना काम करेगा', जैसा उनके पहले वाले सीएम अक्सर करते थे. सम्राट का सिद्धांत साफ है: अगर अपराधी राज्य की कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती बनते हैं तो तुरंत जवाब दें—48 घंटे के अंदर.''
संदेश सिर्फ बातों तक सीमित नहीं. कथित अपराधियों के साथ एक दर्जन पुलिस मुठभेड़ें हुई हैं, जिनमें पुलिस की गोलीबारी में दो लोगों की मौत हो गई और बाकी घायल हो गए. 29 अप्रैल को भागलपुर में बिहार प्रशासनिक सेवा के अधिकारी कृष्ण भूषण कुमार की हत्या के कुछ ही घंटों के भीतर पुलिस ने कथित मुख्य षड्यंत्रकारी की पहचान कर ली और उसे एक मुठभेड़ में मार गिराया गया. तीन मई को सीवान में भी एक और कथित अपराधी को गोली मार दी गई.
जिलों के अधिकारी बताते हैं कि देर रात ऊपर से फॉलो-अप वाले कॉल्स आते रहते हैं. पुलिस अधिकारियों पर जल्द नतीजे देने का दबाव होता है. 14 मई को पटना में एक मसाला व्यापारी की गोली मारकर हत्या कर दी गई. अधिकारियों के मुताबिक, उसके बाद चौधरी ने पूरी रात बड़े अफसरों को सात बार फोन किया और तुरंत नतीजे देने पर जोर दिया. दो दिन के भीतर ही इस हत्याकांड के सिलसिले में एक नाबालिग भाड़े के हत्यारे को गिरफ्तार कर लिया गया.
इसी दौरान, 'पुलिस दीदी योजना' भी शुरू की गई, जिसके तहत महिलाओं के खिलाफ अपराधों को रोकने के लिए शिक्षण संस्थानों के पास महिला पुलिसकर्मियों को तैनात किया जाएगा. 18 मई को चौधरी ने कहा, ''मैंने बिहार पुलिस को पूरी आजादी दी है. कोई भी कानून को अपने हाथ में लेने की हिमाकत न करे. पुलिस मुंहतोड़ जवाब देगी.''
शासन में सुधार पर जोर
कानून-व्यवस्था के अलावा, सरकार के एजेंडे में महत्वाकांक्षी शहरी योजना और शिक्षा पर खर्च से लेकर शिकायत निवारण और प्रशासनिक सुधार शामिल है. सबसे महत्वाकांक्षी पहलकदमियों में है 10 जिलों में 11 सैटेलाइट टाउनशिप बनाने की योजना. उनमें रिहाइशी कॉलोनियां, वाणिज्यिक क्षेत्र, चौड़ी सड़कें और पेड़-पौधों एवं पार्कों वाले हरे-भरे क्षेत्र भी होंगे.
सरकार ने सहयोग की त्रिवेणी भी शुरू की है, जो ब्लॉक कार्यालयों, पुलिस स्टेशनों और राजस्व विभागों से जुड़ी शिकायतों को दूर करने के लिए एक तीन-स्तरीय सार्वजनिक शिकायत और जवाबदेही प्रणाली है. सरकार ने शिकायतों के समाधान के लिए 30 दिनों की सख्त समयसीमा तय की है, और अधिकारियों को चेतावनी दी है कि देरी होने पर उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी.
शिक्षा क्षेत्र में सरकार बुनियादी ढांचे के विस्तार और संस्थागत सुधार, दोनों को बढ़ावा देने का प्रयास कर रही है. सरकार ने सभी जिला स्कूलों और प्रत्येक ब्लॉक में चुने गए एक उच्च माध्यमिक स्कूल को 'मॉडल स्कूल' में बदलने के लिए 800 करोड़ रुपए मंजूर किए हैं. यही नहीं, 208 ऐसे ब्लॉक में डिग्री कॉलेज स्थापित करने के लिए 104 करोड़ रुपए स्वीकृत किए गए हैं, जहां अभी कोई कॉलेज नहीं. इस कदम से 9,000 से ज्यादा नए पद सृजित होने की उम्मीद है.
सियासी रूप से एक और अहम फैसला बिहार लोक निर्माण संहिता में किया गया संशोधन है, जिसके तहत 50 करोड़ रुपए तक की सिविल परियोजनाओं के लिए बिहार के ही ठेकेदारों को प्राथमिकता दी जाएगी.
सरकार ने भ्रष्टाचार रोकने, पारदर्शिता बढ़ाने और नौकरशाही से जुड़ी हीलाहवाली को दूर करने के लिए प्रशासनिक सुधारों को भी बढ़ावा दिया है. इनमें जमीन तथा संपत्ति पंजीकरण के लिए एक ई-पंजीकरण प्रणाली लागू करना शामिल है, जबकि 80 वर्ष से ज्यादा उम्र के व्यक्ति घर बैठे पंजीकरण सेवाओं का लाभ उठाने के पात्र होंगे.
मुख्यमंत्री ने विभागों में इंजीनियरिंग अनुमानों के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) के इस्तेमाल के साथ राज्य के भ्रष्टाचार विरोधी ढांचे में तकनीक को समाहित करने का प्रयास किया है. अधिकारियों के मुताबिक, इस कदम का साफ मकसद परियोजनाओं की लागत को बढ़ने से रोकना है. चौधरी कहते हैं, ''कई जगहों पर, जहां पहले अनुमान करीब एक लाख रुपए होता था, हमने पहले ही 5-6 फीसद की कमी देखी है. एक बार जब एआइ पूरी तरह शासन में शामिल हो जाएगा, तो दोहराव और बढ़ा-चढ़ाकर दिखाई जाने वाली समस्या हल हो जाएगी.''
वर्षों तक भाजपा बिहार में नीतीश के नेतृत्व वाले गठबंधन में छोटे भाई के तौर पर काम करती रही, भले चुनाव में उसका दबदबा बढ़ता जा रहा था. भगवा पार्टी सियासी ऊर्जा और सांगठनिक ताकत देती थी; जबकि नीतीश प्रशासनिक वैधता देते थे. मगर नीतीश का लंबा कार्यकाल खत्म होते-होते प्रशासनिक मशीनरी में सुस्ती आ गई थी.
पार्टी में अंदरूनी स्तर पर लंबे समय से इसको लेकर निराशा जताई जा रही थी कि बिहार के राजनैतिक विमर्श पुरानी बातों और जातिगत समीकरणों में ही अटके हैं, जबकि युवा मतदाता अब सड़कें, पुलिस व्यवस्था, शहरी बुनियादी ढांचा, नौकरियां और डिजिटल माध्यमों से मिलने वाली सुविधाओं पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं. पार्टी के रणनीतिकारों को लग रहा था कि ऐसे शासन की छवि बनानी होगी जो तीव्र गति से काम करता हो. जुझारू चौधरी इसी सोच का एक बेहतरीन चेहरा बनकर उभरे.
तमाम बदलावों को लागू करने के लिए चौधरी ने सचिवालय में अपनी पसंद के अधिकारियों को तैनात किया है. उन्होंने दो ऐसे वरिष्ठ आइएएस अधिकारियों को दूसरे विभागों में भेज दिया है, जो नीतीश सरकार के करीबी माने जाते थे, जबकि तीसरे अधिकारी केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर चले गए हैं.
जमीनी हकीकत
बहरहाल, चौधरी के सामने कई बड़ी चुनौतियां भी हैं. वित्त वर्ष 2026 के लिए बिहार के पास 3.17 लाख करोड़ रुपए का बजट है मगर निर्धारित खर्चों का बोझ कम नहीं. वेतन, पेंशन, ब्याज भुगतान और कल्याणकारी योजनाओं पर होने वाला खर्च संसाधनों का एक बड़ा हिस्सा हजम कर लेता है. \
सियासी बाध्यताओं के कारण चौधरी शराबबंदी में ढिलाई का जोखिम भी नहीं उठा सकते. शराबबंदी ने न केवल बिहार को राजस्व के एक बड़े संभावित स्रोत से वंचित किया है, बल्कि इसके पालन और इससे जुड़े मुकदमों ने पुलिस तथा न्यायपालिका के अहम संसाधनों को भी उलझाकर रख दिया है.
ऐसे में मुख्यमंत्री राजस्व के विकल्प भी तलाश रहे हैं; जैसे गैर-कर राजस्व के आधार को मजबूत करने के लिए टोल टैक्स का विस्तार करना. सरकार निजी निवेश लुभाने का भी प्रयास कर रही है. 17 मई को पटना में अदाणी समूह के चेयरमैन गौतम अदाणी के साथ चौधरी की मुलाकात एक बड़ी कोशिश थी. इस समूह ने राज्य में पहले ही बड़े निवेश करने का वादा किया है, जिसमें पीरपैंती पावर प्रोजेक्ट भी शामिल है.
उस बैठक के एक दिन बाद 18 मई को चौधरी ने घोषणा की कि बिहार अब 'सड़क, बिजली और मूलभूत सुविधा' जैसी विकास की पुरानी परिभाषा से आगे बढ़ रहा है. उन्होंने कहा, ''जब तक एनडीए सरकार अपना एक साल का कार्यकाल पूरा करेगी, बिहार में करीब पांच लाख करोड़ रुपए के निवेश प्रस्ताव लागू हो चुके होंगे.''
मुख्यमंत्री की मेज पर तीन टीवी रिमोट कंट्रोल रखे हैं, और तीनों उनकी पहुंच में हैं. इसका प्रतीकात्मक अर्थ समझना मुश्किल नहीं है—केंद्रीकृत कमान के जरिए चल रहे राज्य में इसका नियंत्रण पूरी तरह से उनके हाथों में ही लग रहा है.

