करीब ढाई साल बाद राजस्थान भाजपा को नया संगठन महामंत्री मिल गया है. उत्तराखंड से लाए गए अजेय कुमार की नियुक्ति ऐसे समय में हुई है जब पार्टी अपने ही बनाए एक राजनीतिक संकट से जूझ रही है—पंचायती राज और नगरीय निकाय चुनावों को बार-बार टालने का संकट. ये चुनाव 2023 के विधानसभा चुनाव में मिली जीत के बाद भजनलाल शर्मा सरकार और भाजपा के जमीनी संगठन की पहली बड़ी परीक्षा बनेंगे.
अजेय कुमार कोई नए प्रयोग का हिस्सा नहीं हैं. उत्तराखंड और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में वे संगठनात्मक जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं और संघ तथा भाजपा की कार्यशैली का उन्हें गहरा अनुभव है. भाजपा में संगठन महामंत्री का पद महज संघ और पार्टी के बीच संपर्क सूत्र का नहीं होता. इसी धुरी के इर्द-गिर्द बूथ से लेकर प्रदेश तक संगठन चलता है, कार्यकर्ताओं को दिशा मिलती है, चुनावी रणनीति बनती है और वैचारिक संदेश नीचे तक पहुंचता है.
ऐसे में उनकी नियुक्ति उस खाली जगह को भरने की कोशिश है जो 2023 विधानसभा चुनाव के बाद चंद्रशेखर के हटने से पैदा हुई थी.अजेय कुमार ऐसे समय राजस्थान पहुंचे हैं जब भाजपा के भीतर सत्ता और संगठन के कई केंद्र मौजूद हैं. एक तरफ राज्य सरकार है, दूसरी तरफ संघ का प्रभाव और तीसरी तरफ पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का वह राजनीतिक कद, जो सक्रिय संगठनात्मक भूमिका में न होने के बावजूद आज भी कायम है.
भाजपा नेतृत्व के लिए अजेय कुमार की नियुक्ति को एक व्यापक संगठनात्मक पुनर्संरचना की शुरुआत के रूप में देखा जाना चाहिए. सरकार गठन, आंतरिक संतुलन और विभिन्न शक्ति केंद्रों को साधने की लंबी प्रक्रिया के बाद पार्टी अब और संगठित दौर में प्रवेश करती दिखाई दे रही है.
संगठन महामंत्री की वेकेंसी की अहमियत का एहसास 2024 के लोकसभा चुनावों में साफ दिखाई दिया. चंद्रशेखर को विधानसभा चुनाव के बाद तेलंगाना भेज दिया गया था. उन्हें संगठन को मजबूत करने और पार्टी के भीतर समानांतर शक्ति केंद्रों को समाप्त करने का श्रेय दिया जाता है. हालांकि टिकट वितरण और कुछ संगठनात्मक फैसलों को लेकर विवाद भी उनके साथ जुड़े. राजस्थान में भाजपा सत्ता में लौटी जरूर लेकिन मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की तुलना में उसका प्रदर्शन अपेक्षा से कम माना गया.
इसके बाद भाजपा नेतृत्व ने असाधारण रास्ता चुना. संगठन महामंत्री का पद खाली छोड़ दिया गया. यह कोई भूल नहीं बल्कि एक राजनीतिक निर्णय था. नई सरकार और नए मुख्यमंत्री के सामने किसी नए शक्ति केंद्र को खड़ा करने के बजाय पार्टी ने इंतजार करना बेहतर समझा. इसके बाद पार्टी ने सी.पी. जोशी की जगह मदन राठौड़ को प्रदेश अध्यक्ष बनाया जो अपेक्षाकृत लो प्रोफाइल और आमराय बनाकर चलने वाले माने जाते हैं.
लेकिन इस लंबे अंतराल की कीमत भी भाजपा को चुकानी पड़ी. 2024 के लोकसभा चुनावों में राजस्थान में पार्टी का प्रदर्शन उम्मीद से कमजोर रहा. और आलोचना के केंद्र में रहे मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा, हालांकि पार्टी के भीतर ही दबे स्वर से कुछ लोग मानते हैं कि संगठन के बीच मजबूत समन्वय के अभाव में प्रचार प्रबंधन पर असर पड़ा. साथ ही कुछेक नेताओं पर भरोसा करने से कमजोर प्रत्याशी मैदान में आ गए.
लोकसभा चुनावों ने राजस्थान भाजपा की आंतरिक राजनीति की पेचीदगियां उजागर कर दीं. उम्मीदवारों के चयन में मुख्यमंत्री की भूमिका सीमित थी, फिर भी हार का ठीकरा उनके सिर फोड़ा गया. राज्य के नेताओं की शह पाए कुछ प्रत्याशी इसलिए हार गए क्योंकि वे अपने राजनीतिक समीकरण साध रहे थे. वसुंधरा राजे प्रत्याशी चयन के केंद्र में नहीं थीं और न ही टिकट दिलवाने में उनकी भूमिका थी. भाजपा में धारणा है कि कांग्रेस ने कुछ सीटों पर अपनी पूरी ताकत नहीं लगाई, अन्यथा नुक्सान और ज्यादा हो सकता था.
इस नियुक्ति से भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के रिश्ते नया आकार ले सकते हैं. संगठन महामंत्री पद खाली रहने के दौरान संघ के प्रांत प्रचारक निम्बाराम का प्रभाव और ज्यादा दिखाई देने लगा था. संघ की कार्यशैली आमतौर पर किसी एक व्यक्ति को लंबे समय तक अत्यधिक ताकतवर बने रहने की अनुमति नहीं देती. ऐसे में अजेय कुमार की नियुक्ति संगठनात्मक प्रक्रियाओं को फिर संस्थागत रूप देने का माध्यम बन सकती है.
संगठन में नई हलचल के साथ अब निगाहें सरकार की ओर भी मुड़ रही हैं. भाजपा के भीतर मंत्रिमंडल फेरबदल की चर्चा की अनदेखी अब मुश्किल है. विधायकों और कार्यकर्ताओं से मिलने वाले फीडबैक में कई मंत्रियों के प्रदर्शन को लेकर असंतोष झलकता है. कुछ की प्रशासनिक अक्षमता के लिए आलोचना हो रही है जबकि कुछ सीएम की कार्यशैली से असहमत हैं. लेकिन कुछ मंत्री ऐसे भी हैं जो मजबूत स्वतंत्र पहचान रखते हैं. सरकार में किरोड़ी लाल मीणा जमीन से जुड़े सबसे मजबूत नेता माने जाते हैं. बीज और उर्वरक बिक्री में अनियमितता जैसे किसानों से जुड़े मुद्दे उठाने की वजह से उनकी अलग पहचान बनी हुई है. उपमुख्यमंत्री दीया कुमारी भी भाजपा के एक प्रमुख राजपूत चेहरे के रूप में उभर रही हैं.
उधर पहली बार विधायक बने कई भाजपा नेता मानते हैं कि सरकार को अधिक ऊर्जावान और ताजा दौर के चेहरों की जरूरत है. उनका तर्क है कि यदि पार्टी को पंचायत, नगरीय निकाय और फिर विधानसभा चुनाव तक राजनीतिक बढ़त बनाए रखनी है तो सरकार में नई पीढ़ी की भागीदारी भी दिखनी चाहिए.
इस बीच राजनीतिक कैलेंडर में अगली बड़ी घटना राज्यसभा चुनाव हैं. भाजपा ने अलका गुर्जर और सतीश पूनिया को उतारा है. इससे ओबीसी प्रतिनिधित्व को तरजीह मिली लेकिन यह पूनिया के लिए पुरस्कार ज्यादा था. वे प्रदेश भाजपा के पूर्व अध्यक्ष हैं और उन्होंने संगठन के लिए समर्पण के साथ काम किया है. गुर्जर राष्ट्रीय सचिव हैं और उनका नाम उन कुछ चुनिंदा महिलाओं में हैं जो राष्ट्रीय टीम में राजस्थान का प्रतिनिधित्व करती हैं. एक और बात कि भाजपा ने राज्यसभा में भेजने के लिए राज्य से ही नेता चुने हैं.
2028 के विधानसभा चुनाव तक पहुंचने से पहले भाजपा को लंबित पंचायत चुनाव, नगर निकाय चुनाव, संभावित मंत्रिमंडल फेरबदल, प्रशासनिक पुनर्संतुलन और पार्टी के भीतर उभरती महत्वाकांक्षाओं को संभालना होगा. प्रदेश की राजनीति नए दौर की दहलीज पर खड़ी है. संगठन महामंत्री की यह नियुक्ति उस हलचल की पहली साफ आहट भर है.

