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ममता से बगावत

टीएमसी के विधायी दल का तीन-चौथाई हिस्सा अपने साथ लेकर विद्रोही धड़े ने अलग राह पकड़ी

3 जून को टीएमसी के बागी विधायकों के साथ कोलकाता में मीडिया से बातचीत करते ऋतब्रत बनर्जी (दाएं से दूसरे)
अपडेटेड 15 जून , 2026

वह तालियों की गड़गड़ाहट शायद उस पल के रूप में याद रखी जाएगी जब आखिरकार बिखराव शुरू हो गया था. विधानसभा चुनाव में सनसनीखेज हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) विधायक दल की वह पहली बैठक थी. सबकी बातें लगभग मिलती-जुलती हैं: कथित रूप से विधायकों को सत्ता से बेदखल मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे और टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के लिए खड़े होकर तालियां बजाने को कहा गया था. कई विधायकों को यह अजीब लगा. बहुतों को बहुत अजीब. फिर क्या, दबी हुई नाराजगी बगावत के रूप में फूट पड़ी. 

खामोश असंतुष्टों को किसी के इर्द-गिर्द संगठित होने के लिए अब एक नया चेहरा मिल गया. वह थे उलुबेरिया पूर्व के विधायक ऋतब्रत बनर्जी. वह कोलकाता के 'फायरब्रान्ड' वामपंथी छात्रनेता रहे हैं, जिन्हें सीपीएम ने 2014 में राज्य सभा भेजा था. ऋतब्रत 2018 में टीएमसी की ओर मुड़ गए और उसकी बदौलत उन्हें एक और कार्यकाल मिल गया. सीपीएम ने 'अंदरूनी जानकारियों को लीक करने' का आरोप लगाते हुए उन्हें निष्कासित कर दिया था. लगभग उसी तरह एक बार फिर उन पर अपनी पार्टी को नुकसान पहुंचाने के आरोप लग रहे हैं.

ममता खेमे ने वरिष्ठ विधायक सोवनदेव चट्टोपाध्याय को विपक्ष के नेता के पद के लिए नामित किया था. सबसे पहले 9 मई को अभिषेक ने उनके नाम का ऐलान किया. असहमति के संकेतों के बीच, विधानसभा के प्रधान सचिव ने उनसे यह स्पष्ट करने के लिए जोर दिया कि क्या वह टीएमसी का आधिकारिक चयन हैं. फिर अभिषेक ने 20 मई को 70 विधायकों के हस्ताक्षर के साथ पार्टी का एक प्रस्ताव पेश किया. जल्द ही यह बात फैलने लगी कि उस नाम पर सहमति दिखाने के लिए फर्जी हस्ताक्षर किए गए हैं.

दिल्ली में 22 मई को मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के साथ ऋतब्रत की एक आकस्मिक मुलाकात हुई, मगर अंदरूनी नाराजगी को पूरी तरह बाहर आने में एक हफ्ता लग गया. 27 मई को ऋतब्रत और एक अन्य विधायक ने औपचारिक रूप से 14 हस्ताक्षरों में जालसाजी का आरोप लगाया. वे कथित रूप से बड़े अक्षरों में किए गए थे. असंतुष्ट विधायकों का कहना था कि उनसे कोई सलाह नहीं ली गई. ऋतब्रत को एक और निष्कासन का सामना करना पड़ा और उन्होंने 3 जून को विधानसभा तक मार्च करके बगावत को तेज कर दिया. वे टीएमसी के 80 में से 58 विधायकों का समर्थन पत्र साथ लेकर गए थे.

यह संख्या सदन में प्रमुख विपक्षी समूह के रूप में मान्यता के लिए आवश्यक 10 फीसद की सीमा से काफी अधिक था. ऋतब्रत को विधिवत रूप से विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता दी गई. उनके साथ नौ पूर्व मंत्री और 28 मुस्लिम विधायक भी हैं. ऋतब्रत के सहयोगी चार बागी विधायक संदीपन साहा, जावेद खान, सबीना यास्मीन और शेली साहा अब सदन में उपनेता हैं. ऐसे में विधायी विंग अब ममता के हाथ से छिटक गया है.

टीएमसी के लिए यह मरणासन्न स्थिति लगती है. पार्टी में अंदरूनी असंतोष वर्षों से सुलग रहा था. ममता ने मानो इसे एक विशाल युद्धक विमान की तरह स्थापित किया था, मगर पार्टी के भीतर सबको उभरने का मौका नहीं था. वरिष्ठ नेताओं के लिए जगह कम होती जा रही थी. विधायक अक्सर दरकिनार महसूस करते थे. फैसले लेने का काम अभिषेक के इर्द-गिर्द एक छोटे से समूह और कॉर्पोरेट शैली वाले सलाहकारों आइपैक के दायरे में सिमट गया था.

सेंट्रल कोलकाता में 2 जून को बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी विरोध-प्रदर्शन के दौरान

बर्बादी का वक्त
फिर भी, किसी ने इतनी नाटकीय टूट-फूट की कल्पना नहीं की थी. खासकर तब जब भारतीय जनता पार्टी की ओर से मिली करारी शिकस्त और नई विधानसभा में एक-तिहाई से भी कम सीटों पर सिमट जाने के बावजूद टीएमसी ने अप्रैल में 42 फीसद लोकप्रिय वोट हासिल किए थे. जैसा कि अक्सर होता है, चुनाव के बाद भाजपा के प्रतिद्वंद्वी कमजोर पड़ जाते हैं. ममता खेमे की विधायी ताकत अब घटकर महज 6 फीसद रह गई है.

क्या अब भी ब्रान्ड टीएमसी उनके पास है? यह एक दिलचस्प खुला खेल प्रतीत हो रहा है. ममता ने 28 वर्षों में अपनी अदम्य शख्सियत के इर्द-गिर्द इस ब्रान्ड का निर्माण किया था. उन्होंने बेबाक, साहसी एवं एकछत्र राज करने वाली वाली छवि बना ली थी. मगर, अब एकदम अलग सियासी परंपरा से आया एक नेता टीएमसी के सबसे बड़े विधायी हिस्से को अपने साथ उड़ा ले गया है. टीएमसी के 'जोड़ा फूल' वाले सिंबल को लेकर भी अब कानूनी लड़ाई छिड़ सकती है. फिलहाल, बगावती विधायकों ने ममता को पार्टी अध्यक्ष और संगठन प्रमुख के पद से हटाने की मांग नहीं की है. औपचारिक रूप से वे अभी भी ममता को ही पार्टी की मुखिया और 'मुख्य सलाहकार' बता रहे हैं. पार्टी के भीतर इस लड़ाई में मुख्य रूप से भतीजे ही निशाने पर हैं. उस बैठक में तालियों के ड्रामे पर एक बगावती विधायक कहते हैं, ''लोग पहले से नाराज थे. मगर उस दिन ने सभी को एकजुट कर दिया.''

सियासत अक्सर अप्रत्याशित रूप से एकदम घूम जाती है. एक ऐसे राजनीतिक परिदृश्य में, जहां सीमा-पार प्रवासन एक संवेदनशील मुद्दा है, एक ऐसा व्यक्तित्व अब केंद्र में है जिसने अपनी 'क्रॉसिंग' की संख्या दोगुनी कर ली है. वह सबसे पहले सीपीएम के छात्र संगठन, स्टुडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया के जरिये उभरा. वह कभी पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के करीबी माने जाते थे. मगर उनका सियासी सफर वित्तीय अनियमितताओं और एक 'आलीशान' जीवनशैली के आरोपों में फंस गया था. 

मगर, ऋतब्रत ने वह हासिल कर लिया है जो 2011 के बाद कोई वामपंथी दिग्गज नहीं कर पाया है. ममता ने वामपंथ के 34 वर्षों के शासन का अंत किया था. अब उसी वामपंथ का एक भटका हुआ धूमकेतु उनकी पार्टी से टकरा रहा है. दूसरी ओर, भीड़ के हमले के कुछ ही दिनों के भीतर अभिषेक गिरफ्तारी के खतरे से जूझ रहे हैं. 

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