पश्चिम एशिया का संकट भले ही दुनिया भर में महंगाई बढ़ा रहा हो मगर महाराष्ट्र के प्याज किसानों की आंखों में आंसू इसकी ठीक उलटी वजह से हैं. स्थानीय बाजार में प्याज की भरमार हो गई है. कम कीमत और बड़ी मात्रा में बिकने वाली इस फसल का ज्यादातर निर्यात समुद्री रास्ते से होता है. लेकिन मौजूदा संकट के चलते लगाए गए आपातकालीन शुल्कों ने खाड़ी देशों तक जाने वाले समुद्री व्यापार को बुरी तरह प्रभावित कर दिया है.
दूसरी ओर, बांग्लादेश की संरक्षणवादी नीतियों ने एक और बड़े बाजार का रास्ता बंद कर रखा है. बार-बार बदलती निर्यात नीतियों से पहले ही परेशान किसानों पर एक और मार पड़ी. भीषण गर्मी के बीच हुई बेमौसम बारिश ने फसल की गुणवत्ता भी खराब कर दी. नतीजा यह है कि नासिक के आसपास के प्याज की खेती वाले इलाकों में किसानों को उपज का भाव सिर्फ एक रुपए किलो तक मिल रहा है.
इसलिए एक बार फिर वही दर्दनाक तस्वीर सामने है—किसान अपनी बिक न सकी फसल मंडियों के बाहर फेंकने को मजबूर हैं. जो किसान किसी तरह अपनी उपज बेच पा रहे हैं, उन्हें 100 से 200 रुपए क्विंटल का भाव मिल रहा है. बढ़ती लागत को देखते हुए यह कीमत लागत निकालने के लिए भी पर्याप्त नहीं. यह संकट उत्तर और पश्चिम महाराष्ट्र के प्याज की खेती वाले पूरे क्षेत्र में फैला है.
इसका केंद्र नासिक जिला है, जहां 22 थोक बाजार हैं. उनमें कृषि उत्पाद विपणन समिति (एपीएमसी) की मंडियां और निजी बाजार शामिल हैं. धुले, अहिल्यानगर, पुणे, नंदुरबार, जलगांव, बीड, सोलापुर और बुलढाणा जैसे जिले भी इस संकट की चपेट में हैं.
प्याज की खेती मुख्य रूप से छोटे और सीमांत किसान करते हैं. सरकारी दखल भी अब तक उनकी मदद नहीं कर पाया है. नेशनल कोऑपरेटिव कंज्यूमर्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एनसीसीएफ) और नेशनल एग्रीकल्चरल कोऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया (नैफेड) किसानों से 1,235 रुपए प्रति क्विंटल की दर से प्याज खरीद रहे हैं. 26 मई को नासिक जिले के लिए यह दर बढ़ाकर 1,580 रुपए प्रति क्विंटल कर दी गई. मगर इस कीमत पर भी किसानों को प्रति क्विंटल करीब 1,000 रुपए तक का पक्का घाटा उठाना पड़ रहा है. ऊपर से खरीद का लक्ष्य सिर्फ 2 लाख टन है, जबकि इस इलाके में हर साल लाखों टन प्याज पैदा होता है.
महाराष्ट्र प्याज उत्पादक संघ के संस्थापक-अध्यक्ष भरत दिघोले का कहना है कि बीज, बुवाई, खाद-कीटनाशक, कटाई, पैकिंग, मजदूरी और ढुलाई मिलाकर उपज की लागत औसतन 2,200 रुपए प्रति क्विंटल तक पहुंच चुकी है. वे कहते हैं, ''जब बाजार में कीमतें बढ़ती हैं तो सरकार उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए दखल देती है. अब कीमतें गिर गई हैं तो उसे प्याज किसानों की मदद के लिए आगे आना चाहिए.'' वे सभी प्रभावित किसानों को 1,500 रुपए प्रति क्विंटल सब्सिडी देने की मांग कर रहे हैं.
समस्या गुणवत्ता की भी है. लासलगांव के प्याज निर्यातक और कारोबारी नितिन जैन कहते हैं, ''गर्मी और बारिश की वजह से 10-15 फीसद फसल खराब हो गई है और खरीदार लगातार शिकायत कर रहे हैं.'' लासलगांव एशिया के सबसे बड़े प्याज बाजारों में से एक है, जहां हर दिन करीब 900 ट्रैक्टर प्याज लेकर पहुंचते हैं. हर ट्रैक्टर में 10 से 30 क्विंटल तक माल होता है.
मुंबई और लासलगांव एपीएमसी के निदेशक जयदत्त होलकर कहते हैं कि 1,580 रुपए प्रति क्विंटल की सरकारी खरीद दर पर भी खास दिलचस्पी नहीं दिख रही. पिछले 15 दिनों में सिर्फ 48 टन प्याज की खरीद हुई है. वजह यह है कि यह योजना सिर्फ अच्छी गुणवत्ता वाले प्याज पर लागू होती है. होलकर का कहना है कि किसानों को 'लागत प्लस' आधार पर भुगतान मिलना चाहिए.
इस मुद्दे पर विपक्षी गठबंधन महा विकास अघाड़ी भी सड़कों पर उतर आया है. डिंडोरी से एनसीपी (एससीपी) सांसद भास्कर भगारे 'गुरुजी' किसानों को सरकारी मदद की मांग का समर्थन कर रहे हैं. उनका कहना है कि केंद्र की बार-बार बदलती निर्यात नीतियों ने वर्षों से किसानों का नुक्सान किया है. वे कहते हैं, ''केंद्र सरकार को यूरोप जैसे नए बाजार तलाशने चाहिए. दुर्भाग्यपूर्ण है कि हम दुनिया में सबसे ज्यादा प्याज उगाने वालों में हैं मगर उसका सही तरीके से निर्यात नहीं कर पाते.''
फडणवीस की पहल
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने अपने दोनों उपमुख्यमंत्रियों के साथ इस मुद्दे पर नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान से मुलाकात की है. फडणवीस का कहना है कि नैफेड और एनसीसीएफ किसानों से सीधे खरीद करें, उनकी यह मांग मंजूर कर ली गई है. उन्होंने बताया कि चौहान ने खरीद प्रक्रिया को मशीनों के जरिए करने की सहमति दी, ताकि ग्रेडिंग की बाधा कम हो और गुणवत्ता के आधार पर फसल खारिज न की जाए.
मुख्यमंत्री चाहते हैं कि सरकारी खरीद का लक्ष्य 10 गुना बढ़ाकर 20 लाख टन किया जाए और खरीद मूल्य को 1,580 रुपए प्रति क्विंटल से ऊपर ले जाया जाए. एक और समस्या यह है कि भारत ने अपने उच्च गुणवत्ता वाले प्याज के बीज वैश्विक प्रतिस्पर्धियों को बेचकर खुद अपने निर्यात बाजार को कमजोर कर लिया है. फडणवीस का कहना है कि ऐसे बीजों के निर्यात पर अतिरिक्त शुल्क लगाकर इसे नियंत्रित किया जाना चाहिए.
सत्तर के दशक के आखिर में प्याज की कीमतों में आई गिरावट और निर्यात प्रतिबंधों ने किसानों में इतना असंतोष पैदा किया था कि उसी से किसान नेता शरद जोशी के संगठन शेतकारी संघटना का जन्म हुआ था. जाहिर है, प्याज का यह संकट गहरी सियासी अहमियत वाला मुद्दा भी है.

