आखिरकार, तीन साल इंतजार करने के बाद डी.के. शिवकुमार बतौर मुख्यमंत्री कर्नाटक की कमान संभालने को तैयार हैं. यह उनके उस सियासी सफर का नया शिखर है, जिसकी शुरुआत हार से हुई थी.
1985 में जब डीकेएस महज 23 वर्ष के थे तो उन्हें सथानूर में अपने पहले विधानसभा चुनाव के दौरान जनता दल के कद्दावर नेता और पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवेगौड़ा के मुकाबले हार का सामना करना पड़ा था.
उसके बाद से वे कोई भी विधानसभा चुनाव नहीं हारे हैं. चार दशक और लगातार आठ बार विधायक बनने के बाद, उनकी यह राजनैतिक यात्रा अब राज्य के सत्ता शीर्ष पर पहुंच गई है.
उन्हें 28 मई को यह सफलता तब मिली जब दो दिनों तक चली गहमागहमी के बाद मुख्यमंत्री सिद्धरामैया ने अपने कैबिनेट सहयोगियों को नाश्ते पर बुलाया, और फिर बेंगलूरू स्थित राजभवन जाकर अपना इस्तीफा सौंप दिया. यह उस नेता के कार्यकाल का समापन था, जिसने इसी जनवरी में राज्य के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले नेता का रिकॉर्ड बनाया था.
वैसे तो, 77 वर्षीय सिद्धरामैया के लिए कार्यकाल के बीच ही बदलाव का खतरा मई 2023 में सत्ता में वापसी के समय से ही मंडरा रहा था. एक समय के बाद सत्ता की बागडोर शिवकुमार को सौंपने के अलिखित 'समझौते' पर लगातार अटकलें लगती रहीं. हालांकि, पार्टी ने कभी खुले तौर पर इसे स्वीकार नहीं किया.
आलाकमान ने पहले भी दखल दिया था. सबसे हालिया कवायद पिछले दिसंबर में की गई जब उसने दोनों नेताओं को अनौपचारिक रूप से मिलने और इस मामले में शांति रखने के लिए समझाया. पीछे मुड़कर देखें तो साफ पता चलता है कि नेतृत्व उस समय केवल समय गुजरने का इंतजार कर रहा था. मई की शुरुआत में एक मौका आया, जब राज्यों के चुनावों का एक अहम दौर खत्म हुआ; इन चुनावों में कांग्रेस ने केरल में जीत हासिल की और तमिलनाडु में विजय के नेतृत्व वाले तमिलगा वेत्री कलगम (टीवीके) गठबंधन में एक साझीदार बनकर उभरी.
दक्षिण भारत में अपनी स्थिति अब ज्यादा सुरक्षित होने के बाद पार्टी ने कर्नाटक में एक ठोस कदम उठाना तय किया. 26 मई को सिद्धरामैया को दिल्ली बुलाया गया, जहां उन्होंने पूरे दिन कई बैठकें कीं, जिनमें राहुल गांधी के साथ आमने-सामने की वार्ता भी शामिल थी. जाहिर तौर पर तो इसका कारण जून में होने वाले राज्यसभा और विधानपरिषद चुनावों के लिए संभावित उम्मीदवारों पर चर्चा करना था, लेकिन इसका असली मकसद शीर्ष स्तर पर फेरबदल करना ही था.
सिद्धरामैया ने गरिमा के साथ पद छोड़ा. 28 मई को डीकेएस और अन्य मंत्रियों की मौजूदगी में प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा, ''मैंने हमेशा यही बात कही है कि जब आलाकमान मुझसे इस्तीफा देने को कहेगा तो मैं दे दूंगा. उसके मुताबिक ही मैंने ऐसा किया.'' उन्होंने बताया कि उन्हें राज्यसभा में सीट की पेशकश की गई थी, ''लेकिन मैंने विनम्रतापूर्वक मना कर दिया...मुझे इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है.'' सिद्धरमैया ने कहा कि वे अपने कार्यकाल के बचे दो साल तक विधायक बने रहेंगे.
उनके मुताबिक, ''मैं सक्रिय राजनीति में बना रहूंगा और सांप्रदायिक ताकतों से लड़ूंगा.'' पद छोड़ने वाले मुख्यमंत्री का राज्य की राजनीति में सक्रिय बने रहने का यह फैसला उनके उत्तराधिकारी के लिए सिरदर्द बन सकता है. कांग्रेस के एक महासचिव कहते हैं, ''सिद्धरामैया एक जननेता हैं. अगर वे सक्रिय रहे तो या तो व्यवस्था के भीतर एक प्रहरी की भूमिका निभाएंगे या फिर व्यवधान उत्पन्न करने वाले बन जाएंगे. पद छोड़ने की पूर्व संध्या पर जाति गणना के नतीजों को स्वीकार करने का उनका फैसला बताता है कि दूसरी भूमिका की संभावना अधिक है.''
भरोसेमंद संकटमोचक
लेकिन डीकेएस भी कोई कमजोर हस्ती नहीं हैं. कांग्रेस के 'संकटमोचन' का तमगा उन्होंने ऐसे ही हासिल नहीं किया, बल्कि ढाई दशकों की अथक मेहनत से कमाया है. उन्होंने 2002 में महाराष्ट्र में विलासराव देशमुख को अविश्वास प्रस्ताव से बचाने के लिए कांग्रेस के लगभग 40 विधायकों को बेंगलूरू के एक रिजॉर्ट में सुरक्षित पहुंचाया; 2017 में, गुजरात से अहमद पटेल (अब दिवंगत) की राज्यसभा के लिए असंभव लगने वाली जीत सुनिश्चित की; और फिर 2018 में कर्नाटक के त्रिशंकु जनादेश के दौरान उन्होंने विधायकों को एकजुट रखा, बी.एस. येदियुरप्पा और भाजपा को बहुमत से वंचित किया, और कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन का रास्ता साफ किया.
इन सभी मौकों पर शिवकुमार ने पार्टी के संकटमोचन के तौर पर काबिलियत साबित की है. फरवरी 2024 में, पार्टी ने उन्हें हिमाचल प्रदेश भेजा था, जहां क्रॉस-वोटिंग की वजह से सुखविंदर सुक्खू सरकार खतरे में पड़ गई थी. वहां से लौटकर उन्होंने सरकार सुरक्षित होने की घोषणा की. रिजॉर्ट्स, बातचीत, देर रात तक जागकर मौके की नजाकत को भांपना—यह सब बातें शिवकुमार की राजनीति को परवान चढ़ाती हैं.
इन्हीं सब खूबियों ने उन्हें गांधी परिवार के बीच एक अलग जगह दिलाई है. भरोसेमंद होने का उन्हें पूरा फायदा भी मिला है. अक्तूबर 2019 में सोनिया गांधी उनसे तिहाड़ जेल में मिलने गई थीं, जब वे एक कथित मनी लॉन्ड्रिंग केस में कई हफ्ते हिरासत में रहे थे.
डीकेएस एक ताकतवर नेता के साथ अमीर भी हैं. उनके 2023 के चुनावी हलफनामे में 1,413 करोड़ रुपए से ज्यादा की संपत्ति बताई गई है, जो उन्हें मुख्यमंत्रियों में सबसे अमीर बनाती है. यही नहीं, उन पर 19 आपराधिक मामले भी चल रहे हैं (उनमें से कई विरोध प्रदर्शनों से जुड़े हैं लेकिन टैक्स, कथित तौर पर आय से अधिक संपत्ति और मनी लॉन्ड्रिंग की जांच से जुड़े मामले भी हैं). किसी में भी सजा नहीं हुई है और उनमें सबसे गंभीर मामलों में भी राहत मिल चुकी है.
जाति का संकट
पिछले छह साल से पार्टी अध्यक्ष रहने और 2023 के चुनाव अभियान के मुख्य रणनीतिकार के रूप में शिवकुमार कर्नाटक में कांग्रेस के सबसे बड़े संगठनात्मक स्तंभ हैं. उनका मुख्य आधार वोक्कालिगा समुदाय है, जो राज्य के दो सबसे ताकतवर जाति समूहों में एक है—दूसरा समूह वीर शैव-लिंगायत है. यह सिद्धरामैया के गठबंधन से बिल्कुल अलग है. सिद्धरामैया ओबीसी कुरुबा समुदाय के नेता हैं और उनकी ताकत अल्पसंख्यक, पिछड़े वर्गों और दलितों का समूह है, जिसे कन्नड़ में अहिंदा कहा जाता है.
दोनों शक्ति केंद्रों के बीच तालमेल बैठाना नए मुख्यमंत्री के एजेंडे का सबसे पहला काम होगा. पार्टी को अब कर्नाटक में अपने संगठन में बदलाव करना होगा, नया अध्यक्ष चुनना होगा, जातिगत समीकरणों को संतुलित रखना होगा और सिद्धरामैया के समूह को अपने साथ जोड़े रखना होगा. इसके साथ ही, भाजपा और जेडीएस के गठबंधन से मिलने वाली चुनौती के प्रति भी सतर्क रहना होगा.
आगे की राह
सुस्ती शायद नई व्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा बन सकती है. शिवकुमार के पास समय बहुत कम है. 2028 के चुनावी साल के करीब आने से पहले, उन्हें कुछ बड़ी परियोजनाओं को पूरा करना होगा. उन्हें निकाय चुनाव भी लड़ने हैं. पद छोड़ते समय उन्होंने दावा किया, ''प्रति व्यक्ति आय के मामले में हम देश में नंबर-1 हैं, और जीएसटी संग्रह में नंबर-2.'' उनकी जिम्मेदारी इस विरासत को आगे बढ़ाने की होगी.
पिछले 25 वर्षों से, जब भी कहीं कोई सरकार हाथ से फिसलने लगती थी तो कांग्रेस संकट सुलझाने के लिए डीकेएस को ही भेजती थी. अब, सरकार उनकी अपनी है और उनके सामने पहली चुनौती ऐसी है जिसे न किसी रिजॉर्ट में जाकर सुलझाया जा सकता है और न ही आधी रात तक जागकर.
यह चुनौती है जातिगत आंकड़ों का पुलिंदा जो उनके अपने समुदाय और उनकी पार्टी के नैतिक सिद्धांतों को आमने-सामने खड़ा कर देता है. डीकेएस ऐसी सरकार की कमान संभालने की स्थिति में पहुंच गया है जिसे बचाने के लिए उन्हें बाहर से नहीं भेजा जा सकता, क्योंकि इसे चलाना अब उनकी जिम्मेदारी है.
सिद्धरामैया को पद क्यों छोड़ना पड़ा?
> 2023 के विधानसभा चुनावों में जीत के बाद डी.के. शिवकुमार मुख्यमंत्री पद के मजबूत दावेदार थे, लेकिन कुर्सी सिद्धरामैया को मिली. बीच कार्यकाल में सीएम बदलने के समझौते की बात सामने आई.
> कर्नाटक कांग्रेस अभी भी सिद्धरामैया और डीकेएस गुटों में बंटी है. पार्टी आलाकमान गुटों में लगातार चलने वाली कलह खत्म करना चाहता था.
> पार्टी का शीर्ष नेतृत्व भविष्य और 2028 के विधानसभा चुनाव पर भी नजर रखे था; तब तक सिद्धरामैया 80 वर्ष के हो चुके होंगे. ऐसे में उनसे 14 वर्ष छोटे डीकेएस को ज्यादा सुरक्षित विकल्प माना गया.

