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बांदा इतना गर्म क्यों

बुंदेलखंड का यह जिला दुनिया के सबसे गर्म स्थानों में शुमार होने लगा. बेहिसाब खनन, कटते जंगल, सूखती नदियां और गिरता भूजल इसे 'हीट आइलैंड’ में बदले दे रहे.

Special Report: Weather
तेज गर्मी के बीच बांदा के राणा प्रताप चौराहे पर दोपहर में सुनसान सड़कें
अपडेटेड 10 जून , 2026

उतरती मई या कहें कि जेठ का दिन. मध्य प्रदेश को छूता, दक्षिणी उत्तर प्रदेश का बांदा शहर. तपती दुपहरी का समय. शहर के व्यस्ततम राणा प्रताप चौराहे पर भी सन्नाटा पसरा है. आम दिनों में ट्रैक्टर, बाइक, ई-रिक्शा और लोगों का जमावड़ा रहता है यहां. सड़क की पिघलती डामर को छूते हुए हवा जैसे लपट में तब्दील हो रही है.

गमछे-तौलिए से बार-बार सिर और चेहरे का पसीना पोछते दुकानकारों ने शटर आधे और कइयों ने तो पूरे ही गिरा रखे हैं. चाय तो चाय! शरबत तक की दुकानें सूनी हैं. इक्का-दुक्का यूं ही निकलते लोग तेज कदमों से किसी गली में घुसकर गुम हो जा रहे हैं. जैसे अघोषित कर्फ्यू लग गया हो.

ढेले भर की दूरी पर नगर पालिका का अस्थायी 'कूलिंग सेंटर’ है, जिसमें लगे कूलर खुद गरम हवा से जूझ रहे हैं. वाटर सप्लाइ के लिए इन्हें टैंकर से जोड़ा गया है. भीतर प्लास्टिक की कुर्सियों पर बैठे कुछ रिक्शेवाले और मजदूर पसीने से तरबतर हैं. बाहर तापमान 47 डिग्री के करीब है.

वैसे तो उत्तर भारत के किसी भी कस्बे में ऐसा नजारा हो सकता है लेकिन बांदा की बात अलग है. इस साल वह कई बार कभी देश, कभी एशिया महाद्वीप और कभी-कभी तो दुनिया के सबसे गर्म इलाकों में शामिल हो चुका है. 27 अप्रैल, 2026 को यहां दर्ज किया गया 47.6 डिग्री सेल्सियस तापमान उस दिन पूरे भारत में सबसे ज्यादा था. इतना ही नहीं, दुनिया भर के 8,212 मौसम केंद्रों में उस दिन बांदा सबसे गर्म शहर रहा. यह 1951 के बाद अप्रैल महीने का सबसे ज्यादा तापमान था.

बांदा के दुरेडी मेंं केन नदी से बेहिसाब निकाली जा रही रेत


महर्षि वामदेव की तपोभूमि और केन नदी के किनारे बसा बुंदेलखंड का बांदा जिला इन दिनों रिकॉर्ड तोड़ गर्मी की वजह से सुर्खियों में है. सड़कें, गलियां और बाजार सब सूने. बेहद जरूरी काम से निकलने वाले कुछेक लोग ही बाहर दिखते हैं. खाने-पीने के ठेले अब सूरज ढलने के बाद ही लग पा रहे हैं.

प्रशासन ने जगह-जगह कूलिंग सेंटर बनाए हैं और कई सरकारी दफ्तरों को भी अस्थायी राहत केंद्र में बदला है, लेकिन तपिश के आगे ये इंतजाम नाकाफी हैं. गर्मी और लू से बीमार लोगों की संख्या तेजी से बढ़ रही है.

जिला अस्पताल का इमरजेंसी वार्ड हीटस्ट्रोक और उल्टी-दस्त के मरीजों से भरा हुआ है. हालत यह है कि इलाज गलियारों में बेड लगाकर किया जा रहा है. इमरजेंसी मेडिकल ऑफिसर डॉ. पी.के. गुप्ता की माने तो मई में गर्मी से जुड़ी बीमारियों के मरीजों की संख्या तीन गुना से ज्यादा हो गई है.

बांदा की यह कहानी दरअसल सिर्फ मौसम की न होकर उसके पूरे पर्यावरण और पारिस्थितिकी के तबाह होने की कहानी है: जंगल सिकुड़ गए, नदियां खोखली हो गईं, पहाड़ियां ध्वस्त कर दी गईं, जमीन की नमी खत्म हो गई. विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन ने इस संकट को बेशक तेज किया है लेकिन बांदा को 'हीट आइलैंड’ में बदलकर रख देने में स्थानीय स्तर पर हुई पर्यावरणीय तबाही की भूमिका कहीं बड़ी है.

घटती हरियाली का दंश
कई अन्य शोधकर्ताओं के साथ मिलकर किए बांदा कृषि विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर अर्जुन पी. वर्मा ने अपने एक शोधपत्र जर्नल ऑफ एक्सटेंशन सिस्टम्स में इस बदलाव की गंभीर तस्वीर पेश की है. उपग्रह चित्रों और जमीनी आंकड़ों के आधार पर 1991-92 से 2021-22 के बीच जिले के वन क्षेत्र का अध्ययन करने वाले इस शोध में पाया गया कि लगभग हर श्रेणी में जंगल तेजी से घटे हैं.

घने जंगलों में साधारण विकास दर (एसजीआर) -16.87 प्रतिशत और चक्रवृद्धि विकास दर (सीजीआर) -15.16 प्रतिशत दर्ज की गई. इसी तरह खुले जंगलों में भी एसजीआर -14.57 प्रतिशत और सीजीआर -12.57 प्रतिशत के साथ भारी गिरावट मिली.

यह केवल आंकड़ों की कहानी नहीं है. एसजीआर किसी अवधि के दौरान औसत वार्षिक गिरावट को दर्शाती है, जबकि सीजीआर से पता चलता है कि नुक्सान साल दर साल किस तरह बढ़ता गया. यानी बांदा में जंगल सिर्फ कम नहीं हुए, बल्कि उनका नुक्सान लगातार तेज होता गया.

बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के दौरान हुई पेड़ों की कटाई ने कोढ़ में खाज का काम किया. स्थानीय कार्यकर्ताओं के अनुसार, दिसंबर 2020 में वन विभाग की ओर से सूचना के अधिकार के तहत पूछे गए एक सवाल के जवाब में बताया गया था कि बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे के निर्माण के दौरान लगभग 1.89 लाख पेड़ काटे गए थे.

नरैनी मार्ग पर कटे पेड़ों की बिक्री

इनमें बांदा जिले के भी हजारों पेड़ शामिल थे. विशेषज्ञों के अनुसार, बांदा अब ऐसे स्थानीय 'ग्रीनहाउस प्रभाव’ का सामना कर रहा है, जहां प्राकृतिक शीतलता के स्रोत तेजी से खत्म हो रहे हैं. वन विभाग का दावा है कि बीते चार साल में एक करोड़ से ज्यादा पौधे लगाए गए. हकीकत यह है कि बांदा का वन क्षेत्र 5194 हेक्टेयर है, जो जिले के कुल भूभाग के ढाई प्रतिशत से भी कम है.

चार साल में एक करोड़ से ज्यादा पौधे लगाए गए? तो फिर उनका जिले की हरियाली पर असर क्यों नहीं दिख रहा? असल में बांदा की करतल रेंज समेत दूसरे इलाकों में बीते वर्षो में लगाए गए ज्यादातर पौधे सूख चुके हैं. जिला वन अधिकारी (डीएफओ) अरविंद कुमार के मुताबिक, बांदा वन क्षेत्र बढ़ाने के लिए बबूल के पेड़ काटने पर रोक लगाने की मांग शासन से की गई है.

अधिकारियों के मुताबिक, वन विभाग को पौधे लगाने का बजट मिलता है लेकिन संरक्षण के लिए पैसा नहीं. इसी वजह से पौधों की कायदे से देखभाल नहीं हो पाती. बांदा के पर्यावरण एक्टिविस्ट रामबाबू तिवारी चेताते हैं, ''यही स्थिति बनी रही तो अगले दो दशक में जिले के कुछ हिस्से बंजर हो सकते हैं. चेतावनी के बावजूद बांदा में पेड़ों की कटान जारी है. नरैनी रोड पर सड़क किनारे बड़ी संख्या में कटे पेड़ों के गोदामों से व्यापार होते आप देख सकते हैं.’’

पहाड़ियों का टूटता संतुलन
बांदा जिले में पर्यावरण की तबाही का जीता-जागता नमूना देखना हो तो शहर से तीसेक किलोमीटर दूर नरैनी तहसील के गिरवां गांव का रुख कर सकते हैं. यहां विंध्य पर्वतमाला की बलुआ पत्थर वाली पहाड़ियों पर विस्फोट और खनन का काम दिन रात चलता रहता है.

स्थानीय किसान और कार्यकर्ता अभिषेक शुक्ला पहाड़ियों की ओर इशारा करते हुए कहते हैं, ''सरकारी अनुमानों के अनुसार, विंध्य क्षेत्र का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा या तो खत्म हो चुका है या गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो गया है.’’ शुक्ला पिछले दो दशकों से अवैध और अत्यधिक खनन के खिलाफ शिकायतें करते रहे हैं: ''मैं लगातार चेतावनी देता रहा कि इसके गंभीर परिणाम होंगे. कौन सुनने वाला था? 

अब देखिए नतीजे! स्थानीय लोगों का आरोप है कि खनन कंपनियां तय सीमा से ज्यादा गहराई तक विस्फोट करती हैं. पहाड़ियों के भीतर तक ड्रिलिंग की जाती है और विस्फोटकों से चट्टानों को तोड़ा जाता है. इसके बाद क्रशर मशीनें पत्थरों को गिट्टी में बदलती हैं.

पर्यावरण विशेषज्ञों के मुताबिक, इसका असर केवल पहाड़ियों के दृश्य विनाश तक सीमित नहीं. विंध्य क्षेत्र की संरचना मुख्य रूप से ग्रेनाइट के ऊपर मौजूद परतदार बलुआ पत्थर से बनी है. बारिश के दौरान यही बलुआ पत्थर पानी सोखकर धीरे-धीरे जमीन के नीचे छोड़ता था, जिससे जलभंडार 'रिचार्ज’ होते थे.

नीचे की ग्रेनाइट परत उस पानी को संरक्षित रखने में मदद करती थी. लेकिन लगातार ब्लास्ट और गहरी खुदाई ने इस प्राकृतिक तंत्र को बुरी तरह प्रभावित किया है. नतीजतन पानी तेजी से बह जाता है और जमीन में रिसाव कम हो रहा है.

अभिषेक बताते हैं, ''खनन और स्टोन क्रशिंग की वजह से निकलने वाली महीन धूल अब बांदा के कई इलाकों की स्थायी समस्या बन चुकी है. यह धूल पेड़ों की पत्तियों और मिट्टी पर जम जाती है, जिससे नमी बनाए रखने की क्षमता घटती है. धूप में यह तेजी से गर्म होकर तापमान बढ़ाती है.’’

नरैनी के गिरवां गांव में सूखा पड़ा हैंडपंप

रेत खनन से बदलती नदियां

बांदा से बहती केन नदी और उसकी सहायक नदियों में बढ़ता रेत खनन पर्यावरण और जलस्रोतों के लिए गंभीर संकट खड़ा कर रहा है. रामबाबू तिवारी की माने तो सरकारी अनुमानों के अनुसार ही केन नदी से रोजाना करीब 55,000 टन लाल रेत निकाली जाती है. खनन अब सिर्फ नदी की धारा तक सीमित नहीं रह गया.

बाढ़ के बाद खेतों में जमा होने वाली रेत को भी मशीनों के जरिए बड़े पैमाने पर निकाला जा रहा है. तिवारी बताते हैं कि मॉनसून के बाद खेतों में फैली रेत को पोकलैंड मशीनों से खुरचकर ट्रकों में भर लिया जाता है. इससे खेती की जमीन ऊबड़-खाबड़ हो जाती है और उसकी उर्वरता प्रभावित होती है. उनका कहना है कि जिन खेतों में पहले खेती होती थी, वहां अब गहरे गड्ढे और खराब सतहें दिखाई देती हैं.

बांदा से होकर केन, यमुना, रंज और बगई जैसी चार प्रमुख नदियां बहती हैं. स्थानीय लोगों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि जिस तरह केन और यमुना के कई हिस्सों का स्वरूप अत्यधिक खनन से बदल गया, अब वही दबाव छोटी नदियों रंज और बगई पर भी बढ़ने लगा है. ग्रामीणों के मुताबिक, कई गांवों में जलस्तर तेजी से गिर रहा है.

गर्मियों की शुरुआत में ही कुएं सूखने लगते हैं और बोरवेल हर साल ज्यादा गहराई तक खोदना पड़ रहा है. राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण और खनन विभाग के नियम सक्रिय नदी धाराओं के भीतर भारी मशीनों के इस्तेमाल पर रोक लगाते हैं. लेकिन स्थानीय लोग आरोप लगाते हैं कि कई जगहों पर इन नियमों का खुलेआम उल्लंघन हो रहा है.

बांदा निवासी और पद्मश्री सम्मानित जल संरक्षण विशेषज्ञ उमाशंकर पांडे कहते हैं कि अत्यधिक रेत खनन ने केन नदी की प्राकृतिक संरचना को भारी नुक्सान पहुंचाया है. उनके मुताबिक नदी की वह प्राकृतिक रेत, जो पानी को रोककर भूजल रिचार्ज में मदद करती थी, अब लगभग खत्म हो चुकी है. उसकी जगह पथरीली सतहें उभर आई हैं, जिससे पानी तेजी से बह जाता है और जमीन में उसकी सोखने की क्षमता लगातार घटती जा रही है.

मौसम और जलवायु परिवर्तन

लखनऊ स्थित भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के उत्तरी क्षेत्रीय कार्यालय के अधिकारियों के अनुसार, बांदा देश के सबसे गर्म स्थानों में से एक है क्योंकि यह 'कर्क रेखा’ की बेल्ट में आता है और यहां सूर्य की किरणें बहुत तेज पड़ती हैं.

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के अधिकारियों का कहना है कि इस बार उत्तर प्रदेश में तेज गर्मी की एक वजह थार रेगिस्तान से आने वाली सूखी पछुआ हवाएं भी हैं. लगातार धूप के कारण इसका असर दक्षिणी उत्तर प्रदेश, खासकर बुंदेलखंड में ज्यादा दिखाई दे रहा है.

बांदा कृषि विश्वविद्यालय में मौसम विज्ञान विभाग के प्रोफेसर दिनेश साह बताते हैं कि इस वर्ष मई के शुरू में पश्चिमी विक्षोभ कमजोर रहे, जिससे राहत नहीं मिल सकी. मार्च और अप्रैल में बारिश भी कम हुई. मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, बांदा 'गर्मी के एक दुष्चक्र’ में फंसा हुआ है क्योंकि यहां न तो पेड़-पौधे हैं और न ही नमी. 105 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र वाले इस जिले में हरियाली (ग्रीन कवर) सिर्फ 3# है, जो बुंदेलखंड के अन्य हिस्सों की

तुलना में बहुत कम है. प्रोफेसर साह बताते हैं, ''नदियों का जल स्तर घटने, रेत खनन और वनस्पति खत्म होने से पहले जो क्षेत्र ठंडे रहते थे, वे अब गर्मी सोखने वाले क्षेत्र बन गए हैं. इससे बांदा का 'एल्बेडो’ बढ़ गया है. यानी जमीन पर पड़ने वाली धूप नमी और पेड़-पौधों द्वारा अवशोषित होने के बजाए वापस परावर्तित हो रही है.

इससे सतह का तापमान बढ़ रहा है.’’ आज का गर्म बांदा बताता है कि जब विकास, पर्यावरण और जल संसाधनों के बीच संतुलन टूटता है तो उसका असर केवल जंगलों या नदियों तक सीमित नहीं रहता. वह लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी, स्वास्थ्य, खेती सब बदल देता है.

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