भविष्य को संवारने में निवेश करना हमेशा से एन. चंद्रबाबू नायडू का शगल रहा है लेकिन अब तक इसमें टेक्नोलॉजी शामिल थी—बायोलॉजी नहीं. हालांकि, नायडू 4.0 यानी चौथी बार सत्ता में आने के बाद ऐसी पहल कर रहे हैं जो जनसंख्या नीति के मामले में पहले कभी नहीं की गई और यह है लोगों को ज्यादा बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहित करना.
16 मई को आंध्र प्रदेश के सीएम ने वह बात सार्वजनिक की जिसका वे लंबे समय से संकेत दे रहे थे—उन्होंने एक योजना का जिक्र किया, जिसका नाम है 'पिल्लाले संपदा' (बच्चे ही संपत्ति हैं). और योजना इस बात को सही भी साबित करती है. दरअसल, इसके तहत परिवारों को तीसरे बच्चे के लिए 30,000 रुपए और चौथे के लिए 40,000 रुपए का नकद प्रोत्साहन मिलेगा.
संदेश जल्द ही ग्राम सभाओं और अन्य मंचों पर जोर-शोर से पहुंचाया जाएगा. यह पक्का करने के लिए कि आंध्र के लोग मुख्यमंत्री की सलाह मानें, हर तरह के प्रोत्साहनों को साथ मिलाकर एक एकीकृत पैकेज बनाया जा रहा है: पोषण योजना के तहत पांच साल तक हर महीने 1,000 रुपए की पोषण सहायता, शिक्षा योजना के तहत 18 साल तक मुफ्त शिक्षा, और सुरक्षा देने वाली घरेलू स्वास्थ्य बीमा सहायता; साथ ही एक साल का मातृत्व अवकाश और दो माह का पितृत्व अवकाश दिया जा रहा है. सब्सिडी वाली आइवीएफ सुविधा भी देने की योजना है.
ज्यादा बच्चे होना दुनियाभर में गरीबी और कम विकास की पहचान है. खुशहाली और तरक्की आमतौर पर परिवारों का आकार छोटा करती है. तो फिर आंध्र प्रदेश इस समीकरण को उलट क्यों रहा है? वह भी ऐसे सीएम के राज में जो 1980 के दौर वाले परिवार नियोजन का प्रेरक है. खुद नायडू के सिर्फ एक पुत्र नारा लोकेश हैं जो तेलुगुदेशम पार्टी के उत्तराधिकारी हैं और उनके भी सिर्फ एक बेटा है.
यह बदलाव क्यों?
इसे बहुत ज्यादा तरक्की का नतीजा कह सकते हैं. राज्य की कुल प्रजनन दर (टीएफआर) 3 (वर्ष 1992-93) से घटकर 1.5 (वर्ष 2022-23) पर आ चुकी है. यह 2.1 की तुलना में भी काफी कम है जो आबादी को स्थिर बनाए रखने का न्यूनतम स्तर है. दो से ऊपर की दशमलव संख्या का मतलब है कि किसी आबादी समूह में हर महिला से जन्मे बच्चों की संख्या मरने वालों की संख्या से ज्यादा होती है, जिससे आबादी स्थिर बनी रहती है.
1.5 से कम टीएफआर को 'अमीर देशों का संकट' माना जाता है; जापान (1.2), दक्षिण कोरिया (0.7) और इटली (1.2) आबादी में गिरावट के मामले में सबसे आगे हैं. भारत में भी प्रजनन दर धीरे-धीरे घटकर 1.9 पर आ गई है. लेकिन भारत के लिए यह स्थिति ठीक है. आंध्र प्रदेश में सबसे ज्यादा प्रजनन दर वाला जिला कडप्पा भी सिर्फ 1.99 के स्तर पर है. विशाखापत्तनम में यह दर सबसे कम 1.32 है. यही रुझान जारी रहा तो 2051 तक आंध्र प्रदेश की टीएफआर घटकर 1.07 रह जाएगी.
एक सीमा के बाद कम टीएफआर उत्पादकता घटाती है. एक दशक के बाद आंध प्रदेश में 60 वर्ष से ज्यादा आयु के 19 प्रतिशत लोग होंगे. तब बिहार में यह आंकड़ा 10.9 फीसद और यूपी में 11.8 फीसद होगा. आंध्र प्रदेश में 35 वर्ष से कम उम्र के लोगों की संख्या तब तक घटकर 43.2 फीसद रह जाएगी.
समस्या का अनकहा पहलू यह है कि पूर्व और उत्तर के गरीब राज्यों से कामकाजी लोगों का राज्य में पलायन आंध्र को बेचैन कर रहा है. आंध्र प्रदेश बेरोजगार संयुक्त कार्य समिति के अध्यक्ष समयम हेमंत कुमार कहते हैं, ''आबादी में गिरावट जारी रही तो आइटी, एआइ, जैसे क्षेत्रों के ज्यादा व्हाइट-कॉलर जॉब बाहरी लोगों को मिल सकते हैं.''
दक्षिणी राज्यों ने बढ़ती आबादी की समस्या से पार पाने के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य ढांचे का सहारा लिया. इसे एक बड़ी सफलता के तौर पर देखा जाता रहा है. आंध्र से भी कम टीएफआर (1.3) वाले तमिलनाडु में पूर्व मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने नवविवाहित जोड़ों को जल्दी बच्चे पैदा करने की सलाह देते हुए कहा था, ''सांसदों की संख्या हमारी मौजूदा जनसंख्या पर निर्भर करती है..'' नायडू भले ही इससे इनकार करें लेकिन परिसीमन का डर मौजूद है.
उधर विहिप चाहता है कि यह प्रोत्साहन सिर्फ हिंदू परिवारों को दिया जाए. पॉपुलेशन फंड ऑफ इंडिया की कार्यकारी निदेशक पूनम मुतरेजा एक और पहलू को रेखांकित करती हैं. उनके मुताबिक, ''इसमें महिलाओं को 100 फीसद आजादी मिलनी चाहिए. उन्हें प्रभावित करने की कोशिश—भले ही वह आर्थिक मदद ही क्यों न हो—उनके अधिकारों का हनन है.'' दूसरे विशेषज्ञ सोच रहे हैं कि क्या आंध्र प्रदेश वह कर पाएगा, जिसमें जापान और चीन जैसे देश भी नाकाम साबित हुए हैं.

