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माघी और सेराज के प्रेम में भाजपा का तड़का

आठ मई को रिलीज हुई फिल्म सेरेंग ने राज्य में चल रहे धर्मांतरण, अवैध बांग्लादेशियों और घुसपैठ जैसे मुद्दों को नए सिरे से हवा दी

सेरेंग फिल्म के एक दृश्य में मुख्य किरदार माघी मुंडा के साथ सेराज
अपडेटेड 3 जून , 2026

मई की 8 तारीख को जब झारखंड में सेरेंग रिलीज हुई तो क्षेत्रीय भाषा प्रेमियों के लिए उत्सव-सा माहौल बन गया. फिल्म में दूरदराज के एक झारखंडी गांव की आदिवासी महिला माघी मुंडा के परिवार पर रहस्यमयी हमला होने के बाद वह शहर की ओर पलायन करती है.

वहां उसकी मुलाकात सेराज अंसारी नाम के एक बैंड वाले से होती है, जो उसे बैंड बजाने और अपनी जिंदगी दोबारा बसाने में मदद करता है. फिल्म पलायन, जातीय और धार्मिक पूर्वाग्रह, माओवादी संघर्ष, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और मानव तस्करी जैसे विषयों को उठाती है. लेकिन अब इस फिल्म ने राज्य में चल रहे धर्मांतरण, अवैध बांग्लादेशी और घुसपैठ जैसे मुद्दों को नए सिरे से हवा दे दी है.

दरअसल, फिल्म की नायिका माघी मुंडा से नायक सेराज अंसारी कहता है, ''माघी, मोर से बियाह करबे? (माघी, मुझसे शादी करोगी?)'' तभी विलेन कहता है, ''हेह...भोली भाली आदिवासी छोरी के फंसाइ के मुस्लिम बनाइ के चाही छलाअ? (भोली-भाली आदिवासी लड़की को फंसाकर मुसलमान बनाना चाहता है?)'' इस सीन पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े आदिवासी और गैर-आदिवासी संगठनों ने घोर आपत्ति जताई. फिल्म के लेखक-निर्देशक पुरुषोत्तम कहते हैं, ''आठ मई को फिल्म रिलीज होने के एक रात पहले सोशल मीडिया पर संघ समर्थित संगठन के लोगों ने इसे तथाकथित लव जिहाद को बढ़ावा देने वाली करार दे दिया.'' 

हिंदूवादी नेता भैरव सिंह ने सेराज नाम को लेकर आपत्ति जताते हुए कहा, ''आदिवासी समाज को सेराज नहीं, सूरज की जरूरत है.'' उनके समर्थन में भाजपा समर्थित जनजातीय सुरक्षा मंच भी आगे आ गया. साथ ही भाजपा के आदिवासी नेता और मीडिया सह-प्रभारी अशोक बड़ाइक भी विरोध में कूद पड़े. उन्होंने कहा, ''फिल्म अच्छी है लेकिन सेराज की जगह कोई आदिवासी पात्र भी हो सकता था. ग्रामीण इलाकों के आदिवासी युवा और महिलाएं इससे प्रभावित हो सकते हैं. क्षेत्रीय सिनेमा को ऐसे नैरेटिव से बचना चाहिए.''  

जवाब में कांग्रेस नेता और राज्य की कृषि मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की ने रांची शहर का पूरा ग्लिट्ज सिनेमा हॉल बुक कर लिया और आदिवासी हॉस्टल की 150 से ज्यादा छात्राओं के साथ सिनेमा देखने पहुंच गईं. इसी कड़ी में कांग्रेस पार्टी की महिला प्रदेश अध्यक्ष और रांची की पूर्व मेयर रमा खलखो भी दल-बल के साथ सिनेमा देखने पहुंच गईं. इस पर भाजपा नेता और ब्रोकन प्रॉमिसेज किताब के लेखक मृत्युंजय शर्मा कहते हैं, ''ऐसा लगता है जैसे इस फिल्म को आदिवासी युवतियों के ब्रेनवॉश करने का माध्यम बनाया गया है.'' 

अवसर की तलाश में भाजपा  फिलहाल बांग्लादेशी घुसपैठियों जैसे मुद्दों के सहारे आदिवासी समाज में पैठ बनाने की कोशिश कर रही भाजपा इसे एक बार फिर अपने उभार के मौके की तरह देख रही है. दरअसल, बच्चियों को फिल्म दिखाने पहुंचीं कृषि मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की के जाति प्रमाण पत्र को जनहित याचिका के जरिए हाइकोर्ट में चैलेंज किया गया है. इस याचिका में कहा गया है कि तिर्की के जाति प्रमाण पत्र के एफिडेविट में धर्म के स्थान पर ईसाई लिखा गया है. जब ईसाई धर्म में कोई जाति व्यवस्था नहीं है तो फिर उन्हें अनुसूचित जनजाति का प्रमाण पत्र कैसे मिला, इस सवाल को लेकर विपक्ष हमलावर है. पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन कहते हैं, ''सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि ईसाई धर्म में जाति व्यवस्था नहीं होती. इसलिए अगर कोई व्यक्ति धर्मांतरण से ईसाई बनता है, तो वह अनुसूचित जाति का नहीं माना जा सकता.''

बहरहाल, आदिवासी युवा इस पूरे मामले में बंटे हुए दिख रहे हैं जिसकी गवाही सोशल मीडिया दे रहा है. वहीं फिल्म के कलाकार झारखंड के बिना सिनेमा हॉल वाले जिलों में कम्युनिटी हॉल वगैरह किराए पर लेकर, प्रोजेक्टर के जरिए लोगों को फिल्म दिखा रहे हैं. निर्माता सेरेंग  की इस कामयाबी से उत्साहित होकर उसे खोरठा और हिंदी भाषा में भी रिलीज करने की तैयारी कर रहे हैं.'' 

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