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तलाश देसी सोने की

भारत की पहली निजी स्वामित्व वाली सोने की खदान जून में खुदाई शुरू करने जा रही. इससे देश के सोने के आयात बिल को कम करने में मिलेगी मदद

चमक-दमक कुरनूल में जोन्नागिरि सोने की खदान
सांकेतिक तस्वीर
अपडेटेड 3 जून , 2026

कर्नाटक की मशहूर कोलार गोल्ड फील्ड्स कभी भारत की सबसे उत्पादक सोने की खदानें थीं मगर 25 साल पहले वे बंद हो गईं. अब देश में सालाना दो टन से भी कम सोना निकाला जाता है और इसका लगभग पूरा हिस्सा कर्नाटक के रायचूर स्थित हट्टी माइंस से निकलता है.

यह उस देश के लिए बेहद कम है, जहां घरेलू उपभोक्ता दुनिया में सोने के सबसे बड़े उपभोक्ताओं में गिने जाते हैं. यहां की भारी मांग को पूरा करने के लिए हर साल लगभग 750 टन सोने का आयात किया जाता है, जिसकी मुख्य वजह आभूषण बाजार की मांग है.

इसे संयोग कहें या अवसर, मगर शायद यही कारण है कि भारत की पहली निजी तौर पर संचालित सोने की खदान के उद्घाटन की इतनी चर्चा हो रही है. खासकर जब कम खर्च करने को लेकर राष्ट्र के नाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संदेश में सोने का आयात एक प्रमुख निशाना था. नई जोन्नागिरि सोने की खदान हट्टी से ज्यादा दूर नहीं है. यह आंध्र प्रदेश के पथरीले और शुष्क रायलसीमा क्षेत्र के पड़ोसी कुरनूल जिले में स्थित है.

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू का कहना है कि यह खदान जून में चालू हो जाएगी और इसमें भारत के कुल घरेलू सोने के उत्पादन का तकरीबन 60 फीसद उत्पादन करने की क्षमता है. इसे संचालित करने वाली कंपनी जियोमैसोर सर्विसेज का कहना है कि उसने इस परियोजना में 400 करोड़ रुपए का निवेश किया है.

वहीं, कंपनी का लक्ष्य पहले साल (2026-27) में लगभग 800 किलोग्राम सोना निकालने का है, जिसे बाद के वर्षों में बढ़ाकर एक टन तक पहुंचाने की योजना है. दरअसल, जोन्नागिरि में 13 टन प्रमाणित स्वर्ण भंडार मौजूद है और विभिन्न खोज में इससे कहीं ज्यादा भंडार की संभावनाओं के संकेत मिले हैं. वैसे, उत्पादन की अपनी सर्वाधिक सीमा पर भी यह खदान भारत की सोने की सालाना मांग काकेवल 0.1 फीसद ही पूरा कर पाएगी.

सोने का जुनून
भारत के कुल आयात में सोने की हिस्सेदारी 9 फीसद से ज्यादा है. साल 2025-26 में सोने का आयात बिल 72 अरब डॉलर (6.9 लाख करोड़ रुपए) के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया. यह साल 2020-21 की तुलना में दोगुने से भी ज्यादा है. इसका देश के व्यापार घाटे और चालू खाते के घाटे पर गंभीर प्रभाव पड़ता है.

घरेलू स्तर पर सोना हासिल करना लगभग असंभव काम बना हुआ है, जबकि राष्ट्रीय खनिज सूची के आंकड़े बताते हैं कि भारत के पास लगभग 50.2 करोड़ टन स्वर्ण अयस्क भंडार हैं. इनमें सबसे ज्यादा भंडार बिहार (44 फीसद) में स्थित है. उसके बाद इस मामले में राजस्थान (25 फीसद), कर्नाटक (21 फीसद) और फिर पश्चिम बंगाल तथा आंध्र प्रदेश (दोनों 3 फीसद) का नंबर आता है.

देश में सोने का भंडार है लेकिन अभी तक बड़े पैमाने पर इसे खोजा नहीं गया है. लिहाजा सोने का घरेलू उत्पादन बहुत सीमित बना हुआ है. जोन्नागिरि की परियोजना गतिविधियों की निगरानी कर रहे जियोमैसोर के निदेशक बी. कार्तिकेयन का कहना है कि यह शुरुआत भारत में सोने के खनन क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित होगी.

कार्तिकेयन त्रिवेणी अर्थमूवर्स के प्रबंध निदेशक भी हैं और यह लॉयड्स मेटल्स लिमिटेड के साथ जियोमैसोर की प्रमुख हिस्सेदार कंपनी है. कार्तिकेयन कहते हैं, ''जोन्नागिरि भारत के खनिज संसाधनों की उस विशाल क्षमता को दर्शाता है जिसका अभी इस्तेमाल ही नहीं किया गया है. यह दिखाता है कि सही नीतिगत समर्थन और प्रतिबद्धता से कितना कुछ हासिल किया जा सकता है.'' 

साल 2008 में तत्कालीन संयुक्त आंध्र प्रदेश सरकार ने जियोमैसोर को जोन्नागिरि और पगिडिराई ब्लॉकों में सोना, तांबा, सीसा, जस्ता और चांदी की खोज के लिए सर्वेक्षण अनुमति दी थी. ये इलाके ईस्टर्न धारवाड़ क्रेटन का हिस्सा हैं. साल 2013 में खनन पट्टा प्रदान किया गया और सभी वैधानिक मंजूरियां हासिल कर लेने के बाद अब यह परियोजना व्यावसायिक उत्पादन शुरू करने के लिए तैयार है. राज्य सरकार को खदान से निकाले गए सोने के मूल्य के हिसाब से रॉयल्टी हासिल होगी. फिलहाल, प्रसंस्करण संयंत्र लगभग 1,000 टन प्रतिदिन (टीपीडी) स्वर्ण-अयस्क का प्रसंस्करण कर रहा है. 

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