टिन की छत वाला एक बड़ा-सा गोदाम. बाहर से किसी जर्जर छोटे-मोटे कारखाने-सा दिखता हुआ. अंदर पहुंचने पर पता चलता है कि नेट लगाकर कुछ बच्चे क्रिकेट की प्रैक्टिस कर रहे हैं. कोच मनीष ओझा उन्हें अलग-अलग तरह के शॉट सिखा रहे हैं.
पटना में एक गोदाम में चल रही यह वही क्रिकेट एकेडमी है, जहां वैभव सूर्यवंशी ने पांच साल ट्रेनिंग ली है. जी, वही वैभव जो पिछले दो आइपीएल से सनसनी की तरह क्रिकेट की दुनिया में छाए हुए हैं. पिता संजीव रोज तीन घंटे बाइक चलाकर वैभव को गांव (ताजपुर, समस्तीपुर) से यहां लाते-ले जाते थे.
कोच मनीष से यहीं बैटिंग के गुर सीखने के बाद वैभव ने जिला स्तर से शुरू कर, बिहार की टीम, आइपीएल और इंडिया अंडर 19 में जगह बनाई. आइपीएल में उसके दमदार प्रदर्शन को देखने के बाद हर तरफ से उसे टीम इंडिया में शामिल करने की मांग उठने लगी. और आखिरकार उसे इंडिया ए टीम का हिस्सा बनाना पड़ा, जिसे भारतीय टीम की एंट्री का दरवाजा कहा जाता है.
टिन की छत वाली यह एकेडमी बिहार क्रिकेट की एक पहचान है. दूसरी पहचान है पटना की ही पाटलिपुत्र कॉलोनी में पहली मंजिल पर चार-छह कमरे का एक दफ्तर; एक गली में अस्पतालों और होटलों के बीच पतले गलियारे और सीढ़ियों से होकर गुजरता रास्ता; जिसके बाहर लिखा है, बिहार क्रिकेट एकेडमी. खेलों की दुनिया की सबसे अमीर संस्था बीसीसीआइ का एक गरीब रिश्तेदार, जिसे वह अपने यहां क्रिकेट और क्रिकेटरों को तैयार करने के लिए सालाना महज 12 करोड़ रुपए की ग्रांट देता है.
झारखंड के अलग राज्य बनने के बाद 2018 तक बिहार क्रिकेट एसोसिएशन लगभग निष्क्रिय रहा. उसकी मान्यता और उसके हित झारखंड स्टेट क्रिकेट एकेडमी को दे दिए गए. लंबी कानूनी लड़ाई के बाद उसे पूर्णकालिक सदस्य की मान्यता मिली. पिछले 7-8 साल से वह क्रिकेटरों को राष्ट्रीय स्तर पर भेज रहा है.
क्रिकेट की दुनिया में जिस बिहार का नाम कभी चर्चा में नहीं आता था, इस वक्त वहां से कई क्रिकेटर राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना रहे हैं. इनमें वैभव के अलावा ईशान किशन, मुकेश कुमार, आकाशदीप, अनुकूल राय, मयंक यादव, साकिब हुसैन और इजहार जैसे खिलाड़ी शामिल हैं. वे आइपीएल की अलग-अलग टीमों में अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं.
इनमें से किसी भी खिलाड़ी का राष्ट्रीय स्तर पर खेलने का सफर आसान नहीं रहा है. वैभव, साकिब और इजहार तो ऐसे खिलाड़ी हैं, जिन्होंने पूरा संघर्ष संसाधनहीन माहौल और टूटे-फूटे स्टेडियमों में खेलते हुए किया.
ईशान, आकाशदीप, अनुकूल, मयंक और मुकेश को झारखंड और बंगाल जैसे दूसरे राज्य की टीम से खेलना पड़ा क्योंकि 2018 तक बिहार क्रिकेट टीम को रणजी ट्राफी में खेलने तक की इजाजत न थी. ऐसे में इन खिलाड़ियों ने जिस तरह अपनी पहचान बनाई है वह अद्भुत और प्रेरणादायक है.
वैभव सूर्यवंशी की सफलता की कहानी का जिक्र अलग से करने की जरूरत नहीं (देखें रिपोर्ट: समस्त संसार को वैभव संदेश; अंक 14 मई, 2025). पिछले दो आइपीएल और इंडिया अंडर 19 टीम के उसके स्कोर उसकी कहानी खुद कहते हैं. 14 साल 23 दिन की उम्र में आइपीएल खेलने उतरे वैभव ने तीसरे ही मैच में सैकड़ा ठोक दिया था.
सबसे तेज शतक और अर्धशतक जड़ा. और अब इस साल एक आइपीएल में किसी भारतीय खिलाड़ी के सबसे ज्यादा छक्के लगाने का रिकॉर्ड (53) उसके नाम दर्ज हो चुका है जबकि मुंबई इंडियंस के साथ 24 मई को उसकी टीम का आखिरी लीग मुकाबला बाकी है.
इस आइपीएल में भी वह एक शतक लगा चुका है; आइपीएल में सबसे तेज 400 रन पूरे किए हैं. 200 से ज्यादा का उसका स्ट्राइक रेट है. क्रिकेट के जानकारों ने पिछले आइपीएल में उसके प्रदर्शन को अनायास मिली सफलता बताते हुए कहा था कि अगले सीजन में गेंदबाज उसके खिलाफ तैयारी से आएंगे, तो वह वैसा प्रदर्शन नहीं कर पाएगा. इस साल फिर वह धुआंधार किए हुआ है और आलोचक नए बहाने खोजने में व्यस्त हैं.
हां, उसकी इस सफलता के पीछे बचपन से की गई उसकी मेहनत, उसके माता-पिता का संघर्ष और उसके दोनों कोच का बड़ा योगदान है. संजीव ने बचपन में ही बेटे की प्रतिभा को पहचान लिया था और उसे अपने शहर समस्तीपुर के सबसे अच्छे क्रिकेट कोच ब्रजेश झा के सुपुर्द कर दिया. समस्तीपुर जैसे छोटे शहर में बच्चों को क्रिकेट सिखाने वाले ब्रजेश ही वह कोच हैं, जिन्होंने इसी शहर से भारतीय क्रिकेट को अनुकूल राय जैसा क्रिकेटर भी दिया है.
अनुकूल को अपना आगे का सफर झारखंड की रणजी टीम के साथ तय करना पड़ा. उनके समय में बिहार को रणजी मुकाबला खेलने की इजाजत नहीं थी. उन्हें पहले इंडिया अंडर 19 टीम का हिस्सा बनने का मौका मिला, फिर वे 2022 में कोलकाता नाइटराइडर्स का हिस्सा बने. ऑलराउंडर की तरह खेलते हुए अनुुकूल ने अब तक टी-20 मुकाबले में 960 रन बनाए और 56 विकेट लिए हैं. अब खबर है कि उन्हें जून में श्रीलंका में होने वाली ट्राइसीरीज के लिए इंडिया ए टीम में चुना गया है.
इसी तरह दिल्ली कैपिटल्स के लिए खेल रहे 32 वर्षीय तेज गेंदबाज मुकेश कुमार बिहार के गोपालगंज के रहने वाले हैं. 2012 में उन्हें बंगाल क्रिकेट टीम का हिस्सा बनना पड़ा, जहां उनके पिता टैक्सी चलाते थे. फिर वे भारतीय टीम में आए और टेस्ट, वन डे तथा टी-20 सभी फॉर्मेट में खेले.
मुकेश की ही तरह सासाराम के आकाशदीप भी बंगाल की रणजी टीम से खेले. मेहनत से उन्होंने भारतीय टीम में जगह बनाई और टेस्ट मैच खेलते हुए एक मुकाबले में दस विकेट लेने का करिश्मा करके दिखाया. आकाशदीप को तो घर में भी विरोध झेलना पड़ा था. अभी वे कोलकाता नाइटराइडर्स (केकेआर) का हिस्सा हैं.
गोपालगंज के साकिब हुसैन एक मजदूर के बेटे हैं. क्रिकेट करियर की शुरुआत उन्होंने बिहार की रणजी टीम से की. 2024 में वे केकेआर से जुड़े, मगर उन्हें खेलने का मौका नहीं मिला. 2026 में सनराइजर्स हैदराबाद ने महज 30 लाख रुपए में उन्हें खरीदा और राजस्थान रॉयल्स के खिलाफ उन्हें खेलने का मौका मिला, जिसमें उन्होंने 24 रन देकर चार विकेट लिए और अपनी प्रतिभा साबित की.
लेकिन सुपौल के लेफ्ट आर्म मीडियम फास्ट बॉलर और मुंबई इंडियंस का हिस्सा बने मोहम्मद इजहार को अभी तक हुनर दिखाने का मौका नहीं मिल सका है. उन्हीं के जिले के मयंक यादव ने शुरुआत दिल्ली के लिए खेलते हुए की. उनके नाम पर आइपीएल में 156.7 किमी प्रति घंटा की रफ्तार से गेंद फेंकने का रिकॉर्ड दर्ज है. उसे आइपीएल की सबसे तेज गेंदबाजी माना गया. वे लगातार विकेट भी ले रहे हैं. फिलहाल वे लखनऊ सुपर जाइंट्स का हिस्सा हैं. उन्हें भारतीय तेज गेंदबाजी का भविष्य कहा जाता है.
इन सबके बीच ईशान किशन एक बड़ा नाम है, जिनके खाते में एक दिवसीय मुकाबले में सबसे तेज दोहरा शतक जड़ने का रिकॉर्ड है. उन्होंने दिसंबर 2022 में बांग्लादेश के खिलाफ खेलते हुए महज 131 गेंदों में 210 रन बनाए थे. ईशान 2021 से ही भारतीय टीम की टी-20 और वन डे की योजना का हिस्सा रहे हैं.
इस साल उन्होंने न्यूजीलैंड के खिलाफ टी-20 में भी शतक जमाया. तेज और विस्फोटक बल्लेबाजी वैभव की ही तरह ईशान की भी पहचान है. उन्हें भी बिहार के दूसरे खिलाड़ियों की तरह झारखंड टीम से शुरुआत करनी पड़ी. गुजरात टाइटंस और मुंबई इंडियंस का हिस्सा रहने के बाद अभी वे सनराइजर्स हैदराबाद में हैं.
ऐसे तमाम खिलाड़ी मिलकर बिहार को क्रिकेट के मानचित्र पर स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं. यही वजह है कि वे कहीं से भी खेलें, उनकी पहचान के साथ बिहारी शब्द जुड़ जा रहा है. वैभव के कोच मनीष ओझा इनके अलावा विपिन सौरभ, आकाश राज और पृथ्वी राज जैसे खिलाड़ियों का नाम लेते हैं, जो आने वाले दिनों में आइपीएल और भारतीय टीम का दरवाजा खटखटा सकते हैं.
बिहार के क्रिकेटरों का यह सफर आसान नहीं रहा है. इसके पीछे 18 साल का अंधेरा, हकमारी और जबरदस्त संघर्ष की कहानी है. 1935 में शुरू हुए बिहार क्रिकेट एसोसिएशन को किस तरह 2000 में अलग राज्य बनने के बाद झारखंड ने पूरी तरह अपने कब्जे में ले लिया और 18 साल तक बिहार को सिर्फ संबद्ध सदस्य के साथ कुछ घरेलू क्रिकेट भर खेलने का मौका मिला.
सन् 2000 में उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ और झारखंड के रूप में तीन नए राज्य बने. इनमें से उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ को संबद्ध सदस्य का दर्जा मिला, जबकि उनके पुराने राज्य क्रमश: उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश पूर्णकालिक सदस्य बने रहे.
मगर बिहार—जिससे काटकर झारखंड बनाया गया—के साथ उल्टा हुआ. उसे संबद्ध सदस्य बनाया गया झारखंड को पूर्ण सदस्य. बिहार क्रिकेट एसोसिएशन (बीसीए) के वरिष्ठ महाप्रबंधक (प्रशासन) नीरज सिंह बताते हैं कि राज्य बंटवारे के समय बीसीए के पास करीब 228 करोड़ रु. थे, जिसमें से हमें एक पैसा न मिला. हम कानूनी लड़ाई लड़ते रहे. 2018 में हमें अपना हक मिला.’’
अभी बिहार को फुल मेंबरशिप जरूर मिल गई है मगर बीसीसीआइ की ग्रांट के तौर पर उसे संबद्ध सदस्यों जितने पैसे ही मिलते हैं. नीरज बताते हैं, ''यूपी और झारखंड जैसे पड़ोसी राज्यों को 40 से 50 करोड़ रु. की ग्रांट मिलती है और हमें सिर्फ 12 करोड़ रु. जबकि हम जिला स्तर के टूर्नामेंट के तौर पर ही हर साल 500-600 मैच आयोजित करते हैं. इसमें प्रति मैच 30,000-40,000 रु. खर्च करने पड़ते हैं.
दूसरे मुकाबले और टूर्नामेंटों का आयोजन अलग है, हमें अपने खर्च के बराबर भी पैसे नहीं मिलते.’’ बीसीए के पास अपना ग्राउंड भी नहीं. जर्जरहाल में पड़े पटना के मोइनउल हक स्टेडियम को बिहार सरकार ने हाल में बीसीए को लांग टर्म लीज पर दिया है. राजगीर में बने अत्याधुनिक क्रिकेट स्टेडियम की देखरेख की जिम्मे दारी भी उसे मिली है. चीजें धीरे-धीरे बेहतर हो रही हैं.
बिहार राज्य खेल प्राधिकरण के महानिदेशक रवींद्रन शंकरण करते हैं, ''हमने बिहार में दूसरे खेलों की तरह क्रिकेट के विकास के लिए भी काम करना शुरू कर दिया है. खिलाड़ियों की प्रैक्टिस के लिए हम जल्द पूरे राज्य में 150 से ज्यादा रेनबो मैदान बनाने जा रहे हैं.
क्रिकेट क्लब और क्रिकेट एकेडमी खोलने की भी तैयारी है.’’ बिहार प्रीमियर लीग की भी तैयारी चल रही है. निजी प्रयास से हो रहे दस-दस ओवर के इस मुकाबले को टेनिस बॉल से खेला जाएगा.’’ और उम्मीद है कि यहां के खिलाड़ी भारतीय क्रिकेट पर छा जाएंगे.

