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पहले घर का झगड़ा तो सुलटे

एनसीपी के दोनों धड़ों का साथ आना तो बाद की बात है, नई डिप्टी सीएम सुनेत्रा पवार को सबसे पहले पार्टी के भीतर खेमेबंदी की चुनौती से निबटना होगा

महाराष्ट्र की उप-मुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार एनसीपी सांसद प्रफुल्ल पटेल के साथ
अपडेटेड 26 मई , 2026

जनवरी में अपने पति अजित पवार की हवाई दुर्घटना में मौत के चंद दिनों बाद ही सुनेत्रा ने उप मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली और साथ ही राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के इस आधे हिस्से की कमान संभाली. मगर पार्टी बॉस के तौर पर अजित की जगह लेना आसान काम नहीं रहा.

बताते हैं पुराने नेता सुनेत्रा को पहले जैसा सम्मान नहीं दे रहे. अपने बड़े बेटे पर बढ़ती उनकी निर्भरता ने पार्थ को सत्ता का एक उभरता केंद्र बना दिया. छोटा बेटा जय भी बारामती में अपनी किस्मत आजमाने में लगा है और माना जा रहा है कि 2029 के विधानसभा चुनाव में वह वहां से उम्मीदवार हो सकता है.

यहां भी पहली मुश्किल परिवार के कारण ही दिख रही है. जय के चचेरे भाई और एनसीपी (शरद पवार) के नेता रोहित पवार भी इसी इलाके में अपनी जड़ें मजबूत करने में जुटे हैं. अजित की मौत के पीछे साजिश का आरोप लगाने वाले रोहित ने उनकी मौत के पहले दोनों गुटों के फिर से एक होने की बात कही थी. अब बारामती में उनकी दिलचस्पी से पवार-बनाम-पवार मुकाबले की उम्मीद बढ़ गई है.

हालांकि, इससे ज्यादा बड़ी चुनौती है एनसीपी के अपने ही खेमे के अंदर संभावित खींचतान. सुनेत्रा ने चुनाव आयोग को लिखे एक पत्र में कहा कि उनके प्रभार संभालने से पहले, 28 जनवरी से 26 फरवरी के बीच, पार्टी के नाम पर भेजे गए किसी भी मेल पर विचार न किया जाए. इसे एक तरह से कार्यकारी अध्यक्ष प्रफुल्ल पटेल और प्रदेश अध्यक्ष सुनील तटकरे के अपमान के तौर पर देखा गया.

इन दोनों ने चुनाव आयोग को एक 'संशोधित संविधान' की जानकारी दी थी, जिसमें सारी शक्तियां कार्यकारी प्रमुख के हाथों में केंद्रित होने का दावा किया गया था. रोहित ने इन दोनों पर पार्टी पर कब्जा करने की साजिश रचने का आरोप लगाया है. 

तटकरे के एक कार्यक्रम के दौरान लगे पोस्टरों में अजित और सुनेत्रा पवार की तस्वीरें न होने से शक और गहरा गया है. पटेल और तटकरे हाल में सुनेत्रा की दिल्ली यात्रा के दौरान भी नदारद रहे. हालांकि पार्थ ने सार्वजनिक तौर पर पार्टी में फूट की खबरों को 'बेबुनियाद' बताकर दोनों नेताओं के दशकों के काम की तारीफ भी की है. वहीं एनसीपी के एक नेता का कहना है कि 'मराठा प्रथम' का नारा बुलंद करने वाली पार्टी में पटेल और तटकरे जैसे गैर-मराठा नेताओं के बढ़ते प्रभाव से आम कार्यकर्ता असहज महसूस कर रहे हैं.

पार्टी को दूसरे उप मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के बढ़ते दबदबे का भी सामना करना पड़ रहा है जो मराठा राजनीति के एक समानांतर केंद्र के तौर पर उभर रहे हैं. बारामती में धाक वाले अजित भी पिछले दो वर्षों में शिंदे के सामने अपनी पकड़ खोते चले गए थे. ऐसे में 2024 तक पेशेवर राजनीति से दूर रहीं सुनेत्रा को अपने कद को ऊंचा करने के लिए सियासी तिकड़मों को तेजी से सीखना होगा. 

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