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ऊपर पहुंचा हुजूम और नीचे छाया सन्नाटा

जहां एक तरफ चार धाम मंदिरों में रिकॉर्ड-तोड़ भीड़ उमड़ रही है, वहीं दूसरी तरफ हरिद्वार जैसा पारंपरिक 'प्रवेश द्वार’, गंभीर आर्थिक मंदी से जूझ रहा.

Chardham Yatra
केदारनाथ धाम में 12 अप्रैल को संध्या आरती में देशभर से आए श्रद्धालुओं की भारी भीड़
अपडेटेड 27 मई , 2026

बीती 10 मई को सोनप्रयाग से श्रद्धालुओं की भारी भीड़ का एक वीडियो वायरल हुआ. 22 अप्रैल को केदारनाथ धाम के कपाट खुलने के बाद दर्शन के लिए यहां से गुजर रहे, देशभर से आए श्रद्धालुओं का ओर-छोर न था. बच्चे-बूढ़े-जवान...सब यहां से वहां तक कसाकस्स. भीड़ के चलते व्यवस्था हिलने लगी.

पीने का पानी, पेशाब करने की जगह और जरूरी स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर लोग खासे नाराज दिखे. सोनप्रयाग के लोगों और यात्रियों का भी कहना था कि यात्रा शुरू होने के दिन से ही यहां ऐसे हालात बन रहे हैं. गौरतलब है कि सोनप्रयाग से गौरीकुंड तक 5-6 किमी यात्री शटल सेवा से भेजे जाते हैं और उसके बाद केदारनाथ धाम तक का 17-18 किमी का रास्ता पैदल तय करना पड़ता है.

अभी भारी संख्या में यात्री हरिद्वार जैसे कैंप शहर से चरणबद्ध ढंग से छोड़े जाने की बजाए अव्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ा दिए जा रहे हैं. इससे गौरीकुंड मार्ग पर दबाव बहुत बढ़ गया है और शटल वाहनों तक यात्रियों की पहुंच मुश्किल हो रही है. पार्किंग की कमी और संकरी सड़कें घंटों ट्रैफिक जाम का सबब बन रही हैं.

यात्रा बनी चुनौती
उन्नीस अप्रैल को गंगोत्री और यमुनोत्री धाम खुलने से शुरू हुई चारधाम यात्रा में केदारनाथ और बद्रीनाथ के कपाट क्रमश: 22 और 23 अप्रैल को खुले. इसके साथ ही बैरिकेडिंग टूटने और श्रद्धालुओं पर लाठी भांजे जाने की खबरें भी आने लगीं.

गुस्साए तीर्थयात्री वीआइपी दर्शन को लंबी लाइनों और कुप्रबंधन की वजह करार देते पाए गए. असंतोष तक जताना शुरू कर दिया. हालांकि, गढ़वाल मंडल के आयुक्त विनय शंकर पांडेय किसी भी दशा में वीआइपी दर्शन की अनुमति न देने जैसी सफाई देते हुए पाए गए.

इस दौरान चारों धाम के लिए पहाड़ों में आने पर एकाएक सेहत बिगड़ने से इस साल 15 मई तक 45 श्रद्धालु जान गंवा चुके थे. ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ऑक्सीजन की कमी और शारीरिक थकान के बीच, भीड़ के कारण समय पर मेडिकल सहायता मिलना चुनौतीपूर्ण हो गया है. हालांकि अभी हाल में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने केदारनाथ में एक अस्पताल का उद्घाटन किया है.

हरिद्वार में हर की पौड़ी पर लोगों की आमद कम है

इस बीच, प्रशासन ने सफाई दी है कि शुरुआती गड़बड़ियों के बाद अब यात्रा सुकून और शांति से चल रही है. भीड़ को नियंत्रित करने के लिए यात्रा से पहले रजिस्ट्रेशन ऐंड टूरिस्ट केयर पोर्टल पर पंजीकरण अनिवार्य किया गया है. उसका दावा है कि इससे भारी भीड़ और बारिश जैसे प्रतिकूल मौसम में भी उत्तराखंड पुलिस और एसडीआरएफ कठिन रास्तों पर यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित कर रहे हैं. यात्री भी धैर्य का परिचय देते हुए अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं.

कहीं भीड़ तो कहीं सन्नाटा
यह देखना दिलचस्प है कि एक ओर तो ऊंचे पहाड़ों पर चार धाम के मंदिरों में जाने के लिए तो रिकॉर्ड-तोड़ भीड़ उमड़ रही है, वहीं दूसरी तरफ हरिद्वार जैसे पहाड़ों का पारंपरिक प्रवेश द्वार, जिसका नाम ही हरि यानी विष्णु का द्वार है, माने जाने वाले शहर को गंभीर आर्थिक मंदी का सामना कर रहा है. हर की पौड़ी के घाटों पर भी सन्नाटा पसरा हुआ है. यहां तीर्थयात्रियों के ऑफलाइन पंजीकरण के लिए खोले गए केंद्र इसकी गवाही दे रहे हैं.

इस तीर्थ कथा में दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे के रूप में एक और पहलू दिलचस्प ढंग से आकर जुड़ता है. 14 अप्रैल, 2026 को शुरू हुए 213 किलोमीटर लंबे इस एक्सप्रेसवे ने दिल्ली से देहरादून के बीच सफर का समय घटाकर ढाई-तीन घंटे का कर दिया है.

इस पर आवाजाही शुरू होने के बाद अब चार धाम वाले तीर्थयात्रियों के जत्थे हरिद्वार का रुख ही नहीं कर रहे. इससे इस तीर्थनगरी के हॉस्पिटैलिटी सेक्टर की चूलें हिलती दिख रही हैं. कारोबारियों की शिकायत है कि यहां के होटलों में 40 से 70 फीसद कमरे खाली पड़े हैं. जिले की अर्थव्यवस्था पर इसका खासा असर दिख रहा है.

हरिद्वार महानगर व्यापार मंडल के अध्यक्ष सुनील सेठी बताते हैं, ''दिल्ली, पंजाब और उत्तर प्रदेश से आने वाले यात्री समय बचाने के लिए हरिद्वार को बाइपास कर आगे निकल जा रहे हैं. पुराने हाइवे पर बने ढाबे और छोटे व्यवसायों में भी ग्राहकों की आवाजाही कम हो गई है.

इस मार्ग के किनारे करोड़ों रुपए का निवेश कर चुके व्यापारी तीर्थयात्रियों और पर्यटकों के रास्ता बदल लेने से भारी नुक्सान का सामना कर रहे हैं.’’ हरिद्वार होटल एसोसिएशन के अध्यक्ष कुलदीप शर्मा की मानें तो होटल व्यवसाइयों के लिए अपने रोजमर्रा के खर्च तक निकालना मुश्किल हो रहा है.

''यह एक्सप्रेसवे उत्तराखंड के पर्यटन क्षेत्र को फायदा तो पहुंचा रहा है लेकिन इसने हरिद्वार की अर्थव्यवस्था को जैसे बाइपास कर डाला है.’’ शर्मा का दावा है कि एक्सप्रेसवे के प्रचलन में आने से इस पवित्र शहर में तीर्थयात्रियों-पर्यटकों के आने के पुराने पैटर्न में अड़चन-सी आ गई है. ''हरिद्वार में इन दिनों में पैर धरने की जगह नहीं मिलती थी लेकिन इस बार यहां के 1,500 होटलों में से 40 फीसद खाली पड़े हैं, जबकि यह समय तो सबसे ज्यादा भीड़ वाला यानी पीक सीजन होता रहा है.’’

अनदेखी का शिकार
यहां के व्यापारियों के मुताबिक, हरिद्वार से लगा राजाजी पार्क पर्यटकों के लिए एक आकर्षण बन सकता है लेकिन सरकार का रवैया इसको लेकर बहुत प्रोत्साहन वाला नहीं है. बल्कि उसे लेकर सरकार की कोई दृष्टि ही नहीं दिखती. एक वजह यह भी है कि गंगा की नीलधारा में वॉटर स्पोर्ट्स को बढ़ावा देने में धार्मिक संगठन आड़े आ जाते हैं.

2023 में केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के हरिद्वार आने पर उन्होंने माना था कि यहां वॉटर स्पोर्ट्स समेत पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए काम किए जाने जरूरी हैं. उसके बावजूद जमीन पर कोई बदलाव नहीं दिखा. गंगा पूजन और स्नान के लिए देश-विदेश से लोग यहां पहुंचते तो हैं, लेकिन स्नान-ध्यान के बाद सीधे रवाना हो जाते हैं.

इसका नतीजा यह होता है कि गंगा के बहाने भीड़ तो भरपूर दिखती है लेकिन लोग अपना काम निबटाकर चले जाते हैं. यह भीड़ कूड़ा-कचरा बिखेरकर आगे निकल जाती है. शहर के होटल कारोबारी, व्यापारी और रेस्तरां मालिक ग्राहकों की बाट जोहते बैठे ही रह जाते हैं. पर्यटन गतिविधि में इस बदले रुझान के चलते हरिद्वार का अधिकांश बिजनेस देहरादून और ऋषिकेश के खाते में चला गया है.

कुलदीप शर्मा की शिकायत है कि पूरे राज्य में हरिद्वार ही प्रदेश सरकार को सबसे ज्यादा रेवेन्यू देता है, इसके बावजूद सरकार इस नगर के प्रति उपेक्षात्मक रुख ही अपनाए रहती है. 2026 के मध्य तक 51 किलोमीटर लंबा सहारनपुर-हरिद्वार बाइपास बनकर तैयार हो जाने से हरिद्वार के कारोबार को एक और गहरी चोट लगने का अंदेशा है.

हरिद्वार में ट्रैवल से जुड़े कारोबारियों का दावा है कि होटलों में बुकिंग के अलावा, ट्रैवल बिजनेस में भी 60 फीसद की गिरावट आ गई है. पिछले साल शहर से चार धाम सर्किट के लिए रोजाना निकलने वाले वाहनों की संख्या 600-700 थी, जो 2026 में घटकर सिर्फ 250-300 रह गई है. हालांकि मुख्यमंत्री धामी का कहना है कि ये परिस्थितियां अस्थायी हैं.

इंडिया टुडे से बातचीत में वे कहते हैं, ''किसी भी नई सुविधा के दो पहलू होते हैं, जो शुरुआत में ज्यादा महसूस होते हैं. जल्दी ही इसका भी समाधान निकल आएगा. कटरा तक ट्रेन गई तो जम्मू के व्यापारियों ने भी ऐसी ही शिकायत की थी. थोड़े ही दिनों में समाधान निकल आया. मेरी सरकार ऐसे तमाम पहलुओं पर विचार कर रही है.’’ (देखें बातचीत)

हरिद्वार की मुश्किलों के ठीक विपरीत, चार धाम स‌िर्किट में यात्रियों की संख्या में अप्रत्याशित उछाल देखा जा रहा है. चारधाम यात्रा के लिए अब तक 35 लाख से ज्यादा लोग रजिस्ट्रेशन करवा चुके हैं, इनमें सर्वाधिक रजिस्ट्रेशन, यही कोई 12 लाख के आसपास तो अकेले केदारनाथ जाने के लिए कराए गए हैं. आने वाले दिनों में यह भीड़ और बढ़ेगी, इतना तय है.

कचरे का पहाड़
भारी भीड़ अकेले नहीं आ रही, अपने साथ सुख-सुविधाओं का सामान लेकर पहुंच रही है. खा-पीकर वह जो फेंक रही है, उसके चलते केदारनाथ और अन्य धामों में प्लास्टिक और दूसरे कचरे का पहाड़ लगता जा रहा है. यह सब हिमालय के पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के लिए अच्छा-खासा खतरा खड़ा कर रहा है.

वैसे चारधाम यात्रा 2026 को पूरी तरह प्लास्टिक मुक्त बनाने के लिए ड्रोन से कूड़ा और प्लास्टिक वेस्ट की मॉनिटरिंग की जा रही है. प्लास्टिक कचरे को कम करने के लिए 'मनी बैक’ प्लास्टिक योजना को अमल में लाया जा रहा है. हर दुकान पर प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट की योजना लागू की गई है. उधर, केदारनाथ पालिका ने कूड़े के निस्तारण को लेकर भी तेजी दिखाई है.

केदारनाथ मार्ग पर यात्रा सुगम बनाने के लिए पशुपालन विभाग इस वर्ष कुल 7,000-8,000 पशुओं के पंजीकरण और स्वास्थ्य परीक्षण (माइक्रोचिपिंग, टैगिंग) का लक्ष्य लेकर चल रहा है. घोड़े-खच्चरों की लीद से बायोमास ऊर्जा बनाने की योजना पर भी काम चल रहा है.

पर इन सारे पहलुओं का लब्बोलुआब यही है कि भीड़ के साथ आने वाली समस्याओं पर अगर काम न किया गया, तो किसी का तीर्थ, किसी के लिए मायूसी का सबब बनकर रह जाएगा. चार धाम में यात्रियों की संख्या में भारी उछाल देखा जा रहा है, वहीं हरिद्वार के होटल व्यवसाइयों के लिए रोजमर्रा के खर्च निकालना भी मुश्किल हो रहा.

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