गुजरात के स्थानीय निकाय चुनावों में भाजपा ने 34 में से 33 जिला पंचायतों में जीत का परचम फहराया. लेकिन एक जिला पंचायत जो भाजपा के हाथ नहीं आई, वह थी नर्मदा, जिसका कारण रहे 36 साल के एक आदिवासी विधायक. उन्होंने जमानत पर रहते हुए चुनाव प्रचार किया.
उन्हें अपने ही चुनाव क्षेत्र में जाने से रोक दिया गया था, और प्रचार के लिए उन्हें अपनी दोनों पत्नियों को मैदान में उतारना पड़ा—उनके नाम पर 19 एफआइआर दर्ज थीं. इसलिए एक तरह से वे कानून को चकमा देते घूम रहे थे. लेकिन एक बेबाक विद्रोही के तौर पर उनकी छवि ने आम आदमी पार्टी के विधायक दल के नेता, चैतर वसावा के पक्ष में काम किया.
उन्होंने नर्मदा की 22 जिला पंचायत सीटों में से 15 और छह तालुका पंचायतों में से चार जितवा दीं. वसावा एक ऐसी शख्सियत हैं जिनका असर न तो भाजपा खत्म कर सकती है और न ही कांग्रेस उन्हें अपने पाले में वापस ला सकती है.
2022 के बाद से वसावा के खिलाफ जितनी भी एफआइआर दर्ज हुई हैं—फसाद, मारपीट, रंगदारी, जान से मारने की कोशिश, हवा में गोली चलाने, आदि—उनमें से ज्यादातर का संबंध राजनैतिक टकरावों या वन अधिकार अधिनियम को लेकर प्रशासन के साथ हुई झड़पों से है. इन सबने आदिवासी इलाके में नए उभरते सितारे के तौर पर उनकी छवि को और चमका दिया है.
भले ही यह जीत इतनी बड़ी न हो कि मौजूदा व्यवस्था के लिए एकदम से कोई खतरा बन जाए, लेकिन आदिवासी राजनीति ऐसी सियासत खड़ी करती रही है जो स्वतंत्र विचारों वाली होती है, जिससे भाजपा और कांग्रेस, दोनों ही पार्टियां काफी बेचैन रहती हैं. उन्हें राहत तभी मिलती है जब वे इन नेताओं को अपने साथ जोड़ लेती हैं. गुजरात के एक वरिष्ठ आदिवासी नेता, चैतर के पुराने गुरु और 'भारतीय ट्राइबल पार्टी' (बीटीपी) के संस्थापक छोटूभाई वसावा के मामले में यह देखा गया है. छोटूभाई अलग भीलिस्तान राज्य की मांग के समर्थक रहे हैं.
मजबूत स्तंभ
अब गुजरात को अपना अगला वसावा मिल गया है. भाजपा ने अप्रैल में स्थानीय निकायों की जिन 9,682 सीटों पर चुनाव लड़ा था, उनमें से उसने 95 जीतीं. अब वह सभी 17 नगर निगमों, 84 में से 79 नगर पालिकाओं और 35 में से 34 जिला पंचायतों का शासन चलाएगी. फिर भी, नर्मदा का हाथ से निकल जाना खटकता है. इसमें गरुड़ेश्वर तालुका पंचायत भी शामिल है, जहां 'स्टैच्यू ऑफ यूनिटी' स्थित है. जानकारों का कहना है कि इसका श्रेय आप के चुनाव चिह्न से कहीं ज्यादा, सीधे-सीधे वसावा को जाता है. यूं कहिए कि 'बाहरी' आप की साख उसके मुखर आदिवासी नेता की वजह से बनी है, न कि इसका उल्टा है.
भाजपा ने उनको पहले प्यार से मनाने और फिर डराने-धमकाने का प्रयास किया लेकिन दोनों ही तरीके काम नहीं आए. हर केस से उनकी लोकप्रियता बढ़ती गई. भाजपा, जिसने पिछले कुछ साल में कांग्रेस और बीटीपी के कई आदिवासी नेताओं को अपने पाले में ले लिया था, इस बार मात खा गई.
राज्य पर दांव
गुजरात में 14 प्रतिशत आदिवासी आबादी है. यह राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के साथ राज्य की पूर्वी सीमा पर सटे इलाकों में बसे हुए हैं. नवंबर 2024 में उन्होंने भील प्रदेश मुक्ति मोर्चा शुरू कर इन चार राज्यों के आदिवासी जिलों को मिलाकर अलग प्रदेश बनाने की दशकों पुरानी मांग को फिर से जिंदा कर दिया, जिसकी प्रस्तावित राजधानी स्टैच्यू ऑफ यूनिटी के आसपास होगी.
गुजरात में 182 सदस्यों वाली विधानसभा में 27 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं, और कम से कम 10 और सीटों पर आदिवासी मतदाता असर डालते हैं. भाजपा ने कांग्रेस के पुराने आदिवासी नेताओं को साधकर अपनी आदिवासी सीटों की संख्या 2017 की नौ से बढ़ाकर 2022 के विधानसभा चुनावों में 23 कर ली. यहां एक ऐसी राजनीति जन्म ले रही है जो विकास के मौजूदा मॉडल का विरोध करती है.
चैतर का राजनैतिक जीवन एक दशक से भी पहले भरूच में छोटूभाई के संरक्षण में शुरू हुआ था. 2022 में उन्हें बीटीपी का टिकट नहीं मिला. भाजपा का दावा है कि उसके मना करने के बाद ही वसावा आप में शामिल हुए. 2024 में उन्होंने जनरल सीट भरूच से चुनाव लड़ा. फिलहाल, उनके अगले कदम को लेकर लगाई जा रहीं अटकलें अब बहस का मुख्य विषय बन गई हैं.

