सरना धर्मकोड की मांग एक बार फिर राजनैतिक और वैचारिक बहस के केंद्र में है. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने हाल ही राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर आगामी जनगणना में सरना धर्म के लिए अलग कोड देने की मांग दोहराई है.
दरअसल, नवंबर 2020 में हेमंत सरकार ने विधानसभा में सर्वसम्मति से सरना-आदिवासी धर्मकोड बिल पारित कर केंद्र सरकार को भेजा था. उस समय लाखों आदिवासियों को उम्मीद थी कि उनकी वर्षों पुरानी मांग अब पूरी होने वाली है.
लेकिन पांच साल बाद भी मामला वहीं अटका हुआ है. इस बीच एक से 15 मई तक जनगणना के पहले चरण में स्वगणना प्रक्रिया पूरी हुई तो हेमंत सोरेन ने फिर इस मुद्दे को उठाया. उनका कहना है कि 2011 की जनगणना में अलग श्रेणी नहीं होने के बावजूद 21 राज्यों के करीब 50 लाख लोगों ने धर्म वाले कॉलम में 'सरना' लिखा था.
सोरेन का तर्क है कि आदिवासी समाज की सांस्कृतिक पहचान लगातार कमजोर हो रही है. प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में उन्होंने कहा कि पिछले आठ दशकों में झारखंड में आदिवासियों की आबादी 38 फीसदी से घटकर 26 फीसदी रह गई है. ऐसे में अलग धर्मकोड पहचान और परंपराओं को बचाने के लिए जरूरी है.
दिलचस्प बात यह है कि झारखंड भाजपा भी इस मांग का विरोध नहीं करती. नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी के मुताबिक, धर्मकोड से आदिवासियों की सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं को संरक्षित करने में मदद मिलेगी. लेकिन भाजपा और उससे जुड़े संगठन धर्मांतरण का मुद्दा भी जोड़ते हैं. मरांडी का आरोप है कि राज्य में तेजी से धर्मांतरण हो रहा है और आदिवासी अपनी जड़ों से दूर हो रहे हैं.
यहीं से यह बहस राजनैतिक से ज्यादा वैचारिक हो जाती है. जनवरी 2025 में रांची दौरे पर आए आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने साफ कहा कि सरना कोई अलग धर्म नहीं बल्कि पूजा-पद्धति है. उनके मुताबिक, ''हिंदुत्व किसी एक पूजा-पद्धति का नाम नहीं, बल्कि साथ रहने की जीवनशैली है.'' आरएसएस से जुड़े संगठन 'सरना-सनातन एक है' का नारा दे रहे हैं.
इस मुहिम का चेहरा बनीं आइआरएस अधिकारी और कांग्रेस नेता रामेश्वर उरांव की बेटी निशा उरांव का कहना है कि हिंदू और आदिवासी दोनों प्रकृति को पूजते हैं, इसलिए दोनों एक ही परिवार का हिस्सा हैं. हालांकि आदिवासी संगठनों का बड़ा वर्ग इससे असहमत है. पूर्व मंत्री गीताश्री उरांव का कहना है कि सरना और सनातन को एक बताना आदिवासी दर्शन की अनदेखी है, आदिवासी प्रकृति पूजक हैं, मूर्ति पूजक नहीं.
सरना धर्मकोड की मांग नई नहीं है. पूर्व मंत्री देवकुमार धान बताते हैं कि 1871 से 1951 तक आदिवासियों की अलग गिनती होती थी लेकिन 1961 की जनगणना में धर्मकोड हटा दिया गया और उन्हें 'अन्य' श्रेणी में डाल दिया गया. उनका सवाल है कि जब जैन और बौद्ध समुदाय को अलग धार्मिक पहचान मिल सकती है, तो देश की बड़ी आदिवासी आबादी को क्यों नहीं?
2011 की जनगणना में केवल झारखंड में ही करीब 40 लाख लोगों ने खुद को सरना/आदिवासी धर्म का अनुयायी बताया था. इसके बाद 2015 में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन हुआ और फिर 2018 से विभिन्न राज्यों के आदिवासी संगठनों के बीच सहमति बनाने की कोशिश शुरू हुई. अब 25 राज्यों के संगठनों के साथ बैठकों का सिलसिला चल रहा है.
हालांकि, इस मांग पर आदिवासी समाज एकमत नहीं. गुजरात के आदिवासी नेता छोटूभाई वसावा का कहना है कि 'सरना' शब्द क्षेत्रीय है, इसलिए पूरे देश के लिए 'आदिवासी धर्म' ज्यादा स्वीकार्य हो सकता है. उनका मानना है कि मुंडा, संथाल, गोंड या भील जैसी तमाम जनजातियों को जोड़ने के लिए व्यापक पहचान की जरूरत है.
सोरेन ने 2020 में कहा था कि झारखंड ट्राइबल एडवाइजरी कमेटी देशभर में बैठकें कर सहमति बनाने की कोशिश करेगी, ताकि दूसरे राज्य भी विधानसभा से प्रस्ताव पारित कर केंद्र पर दबाव बनाएं.
अब नजर आगामी जनगणना पर है. 2011 में 50 लाख लोगों ने खुद को सरना/आदिवासी के रूप में दर्ज किया था. इस बार यह संख्या कितनी बढ़ती है, इससे यह तय होगा कि यह मांग सिर्फ झारखंड की राजनीति तक सीमित है या वास्तव में राष्ट्रीय आदिवासी पहचान का बड़ा आंदोलन बन चुकी है.

