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सवाल उठा रहे धड़ाधड़ गिरते सेतु

भागलपुर में गंगा पर बना 25 साल पुराना पुल गिर गया जिससे सात जिलों पर असर पड़ा. खराब निर्माण और मेंटेनेंस में कोताही के चलते हाल के दिनों में बिहार में लगातार गिर रहे पुल.

Special Report: Falling Bridge
भागलपुर में गंगा पर बना पुल गिरने से लोगों को भीड़ भरी नाव के जरिए पार करनी पड़ रही नदी  
अपडेटेड 27 मई , 2026

कड़ी धूप वाली एक दुपहरिया में तीन बजे हजारों लोग गंगा पार करने के लिए खड़े हैं. तभी आए माल ढोने वाले खुले जहाज में भीड़ दो मिनट के अंदर चढ़ जाती है. जगह न मिलने के कारण किनारे रह गए लोग मोटर लगी नावों की तरफ बढ़ते हैं. वहां लगभग 75 नावें और यह जहाज मिलकर पूरे दिन करीब 12,000 लोगों को बिना लाइफ जैकेट के रोज गंगा पार करा रहे हैं क्योंकि पिछले दिनों वहां बना विक्रमशिला सेतु बीच से टूट गया है.

घटना 3-4 मई की दरम्यानी रात को हुई. 2001 में चालू हुए 4.7 किमी लंबे विक्रमशिला सेतु पर उस रात के वक्त पिलर नंबर तीन और चार के बीच का एक स्लैब धंसने लगा. मगर ट्रैफिक रुका नहीं. एक ट्रक चालक ने जिला प्रशासन को फोन पर स्थिति की जानकारी दी. रात में ही प्रशासन ने पुल के दोनों तरफ से गाडिय़ों को पीछे हटाया.

जब पुल खाली हो गया तो रात के 12.35 बजे दोनों पिलरों को जोड़ने वाला एक हिस्सा टूटकर गिर गया. इसके बाद भागलपुर प्रमंडल का पूर्णिया और कोसी प्रमंडल से सड़क संपर्क टूट गया.

भागलपुर के जिलाधिकारी नवल किशोर चौधरी इंडिया टुडे से बातचीत में कहते हैं, ''यह पुल इस इलाके के लिए लाइफलाइन था. रात के वक्त भी इस पुल से हर घंटे 300 से ज्यादा गाड़ियां. गुजरती थीं.’’ जानकारों की मानें तो कम से कम एक लाख लोग रोजाना इस पुल का इस्तेमाल करते थे. इनमें नौकरी पेशा, फसल भागलपुर की मंडियों में लाने वाले किसान, दूध और सब्जी विक्रेता समेत आम लोग थे. पुल गिरने से इन सबके लिए आवागमन एक बड़ी समस्या हो गया है.

भागलपुर शहर के कारोबारियों का इससे खासा नुक्सान हुआ है. बाजार सूने नजर आते हैं. ईस्टर्न बिहार चैंबर्स ऑफ कामर्स ऐंड इंडस्ट्रीज के अध्यक्ष शरद सलारपुरिया बताते हैं, ''यहां कपड़े, मोबाइल, अनाज, टाइल्स और दूसरी थोक सामग्रियों की खरीद के लिए गंगा के उस पार से बड़ी संख्या में लोग और छोटे दुकानदार आते रहे हैं. अब उनके न आने से यहां का कारोबार आधा रह गया है. स्थिति जल्द न सुधरी तो हमें डर है कि वे किसी और बाजार की तरफ शिफ्ट न हो जाएं.’’

पुल गिरने से सबसे बड़ा नुक्सान बिहार सरकार के इकबाल का हुआ है. पिछले तीन-चार साल में पुलों के लगातार गिरने के बाद जून, 2025 में राज्य सरकार ने ब्रिज मेंटेनेंस पॉलिसी बनाई थी, जिसमें दावा किया गया था कि राज्य के छह मीटर से लंबे सभी पुलों का हेल्थ इंडेक्स बनेगा. आइआइटी दिल्ली और आइआइटी पटना को भी 250 मीटर से लंबे 85 महत्वपूर्ण पुलों की जांच करने का जिम्मा दिया गया है.

दक्षिणी बिहार के ऐसे 45 पुल आइआइटी पटना के जिम्मे हैं और बाकी 40 उत्तर बिहार के पुल आइआइटी दिल्ली के जिम्मे. इस पॉलिसी की घोषणा के वक्त तत्कालीन पथ निर्माण मंत्री नितिन नबीन ने दावा किया था कि यह देश की पहली ब्रिज मेंटेनेंस पॉलिसी है. माना जा रहा था कि पुलों के गिरने का सिलसिला थम जाएगा. मगर तभी विक्रमशिला सेतु धराशाई हो गया.

महीने भर पहले कोई खतरा न था?
घटना से बमुश्किल सवा महीने पहले मार्च, 2026 में आइआइटी, पटना की टीम इस पुल की जांच करने पहुंची थी. तब पुल के पिलर के साथ लगे गोल घेरे के क्षतिग्रस्त होने की खबर वायरल हुई थी. तब उस वक्त के पथ निर्माण मंत्री दिलीप जायसवाल ने मीडिया को बताया था, ''पुल को कोई खतरा नहीं है.’’

हालांकि भागलपुर के कुछ वरिष्ठ पत्रकारों का कहना था कि आइआइटी पटना ने उस वक्त भी ओवरलोडिंग के कारण पुल पर खतरे की बात कही थी मगर उसे नजरअंदाज कर दिया गया. इस बात को बाद में पुल निर्माण निगम के चेयरमैन चंद्रशेखर ने भी कुबूल किया.

इससे डेढ़ साल पहले पथ निर्माण विभाग के स्थानीय अधिकारियों ने इस पुल की मरम्मत के लिए केंद्र और राज्य सरकार दोनों को पत्र लिखा था. एक मीडिया रिपोर्ट में बिहार के सड़क निर्माण महकमे के राष्ट्रीय राजमार्ग विंग के तत्कालीन चीफ इंजीनियर उमाशंकर प्रसाद की चर्चा थी. उन्होंने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि पुल के 60 एक्सपैंशन जॉइंट में से छह का गैप बढ़ गया था और 22 जगहों पर चैंबर भी धंस गया था.

इसके बाद केंद्र और राज्य दोनों को कई चिट्ठियां लिखी गईं. अप्रैल में बिहार सरकार अपने खर्चे से इसकी मरक्वमत के लिए तैयार हो गई थी और इसे अनुमोदन के लिए वित्त विभाग के पास भेजा गया था. बताते हैं, पुल गिरने से सिर्फ दो दिन पहले पीरपैंती आए बिहार के मुख्य सचिव प्रत्यय अमृत को डीएम नवल किशोर चौधरी ने मेंटेनेंस की बात याद दिलाई थी.

इससे पहले कि सरकार इसके लिए रकम जारी करती, पुल गिर गया. अब कहा जा रहा है कि अगर इसका मेंटेनेंस होता है तो यह रकम 75-80 करोड़ तक पहुंच जाएगी क्योंकि पुल टूटने के बाद हुई जांच से पता चला है कि पूरे पुल में 13 जॉइंट ऐसे हैं, जहां के बेयरिंग खराब पड़े हैं. वहां भी वैसा ही खतरा है, जैसा पिलर नंबर तीन और चार के बीच था.

शुरू से गड़बड़ियां
भागलपुर के वरिष्ठ पत्रकार दिनकर चंद्र झा बताते हैं, ''जब यह पुल बन रहा था तो पिलर नंबर तीन और चार पानी में बह गए थे. फिर इनकी जगह बदली गई और पुल के डिजाइन में भी बदलाव किया गया.’’ पुल के गिरने के बाद जांच करने आई रेलवे इंजीनियरों की टीम के मुताबिक, पुल के दो पिलरों के बीच अमूमन 24 मीटर का गैप है, जबकि पिलर नंबर तीन और चार के बीच 34 मीटर का गैप है. इसी बढ़े हुए गैप को जोड़ने वाला स्लैब गिरा है.

हालांकि चौधरी स्पष्ट करते हैं, ''यह गैप इसलिए ज्यादा है क्योंकि इससे होकर पानी के जहाजों को गुजरना है.’’ पुल के निर्माण के वक्त परियोजना पदाधिकारी रहे उपेंद्रजी शुक्ल कहते हैं, ''पुल के दो पिलर 1997 की भीषण बाढ़ में बहे जरूर थे पर उसके बाद जगह बदलकर 30-40 मीटर पानी के बीच नए पिलर तैयार किए गए थे, यह उस वक्त के लिहाज से बड़ी बात थी. इसलिए पिलर बहने को दोष देना ठीक नहीं.’’

2018 से ही थी मरम्मत की दरकार
सन् 2001 में शुरू हुए इस पुल के उद्घाटन के वक्त दावा किया गया था कि यह पुल अगले सौ साल तक काम करेगा. मगर 2018 से दिक्कत आने लगी. पुल के जॉइंट के बेयरिंग खराब होने लगे और गैप घटने तथा इसके ऊपर-नीचे होने की शिकायतें आने लगीं. बताया गया कि ऐसा बड़ी संख्या में ओवरलोड ट्रकों के गुजरने से हो रहा है. दिनकर चंद्र झा कहते हैं, ''2005 के बाद से बिहार में निर्माण कार्य तेज होने पर इस पुल से कोसी और पूर्णिया प्रमंडल के लिए रेत और स्टोन चिप्स के बड़े-बड़े ट्रक और हाइवा गुजरने लगे जबकि दो लेन का यह पुल बहुत कम लोड के लिए बना था.’’

शुक्ल कहते हैं, ''1989 में जब इस पुल का टेंडर हुआ था तो इंडियन रोड कांग्रेस के हिसाब से लोड लिमिट सौ टन थी, जो अब बढ़कर 385 टन हो गई है. हम लोगों ने पुरानी लिमिट के हिसाब से इसे बनाया था. तब इतने बड़े ट्रक नहीं होते थे. अब तो 90 टन का वजन लेकर अपेक्षाकृत छोटे आकार के भारी भरकम हाइवा (ट्रक) चलते हैं. यह पुल इतना लोड उठाने में सक्षम नहीं.’’

दिनकर की मानें तो ''सबको यह मालूम था, मगर इस पुल का भरपूर दोहन किया गया. बालू और स्टोन चिप्स के ट्रकों की रात में कतारें लगती थीं. बीच में मोकामा के राजेंद्र सेतु को जब लंबे अरसे के लिए बंद किया गया तो उसका असर भी इस पुल पर पड़ा. साथ ही एक बार पुल पर नए सिरे से अलकतरा बिछा दिया, जिससे जॉइंट भी भर गए. इसके अलावा पुल पर जब भी एक्सीडेंट होता या गाड़ी खराब होती तो भीषण जाम लगता. जानकार बताते हैं कि गुजर रही गाड़ियों के लोड का पुल पर असर कम होता है, बनिस्बत खड़ी गाड़ियों के.’’

ऐसे में 2018 में जब पुल जवाब देने लगा तो 2 फरवरी, 2018 को इस पर से 20 टन से ज्यादा भार वाली गाड़ियों के गुजरने पर रोक लगा दी गई. फिर पुल के सभी खराब जॉइंट की मरम्मत की गई. 15 फरवरी को मरम्मत के बाद जब रोक हटी, तब भी नियम बनाया गया कि इससे होकर अधिकतम 45 टन भार वाली गाड़ियां ही गुजरेंगी.

वह भी दो ट्रकों के बीच बीस मीटर के गैप के साथ. दिनकर चंद्र झा के मुताबिक, उस वक्त प्रशासन ने कहा था कि वह पुल के दोनों ओर गाड़ियों का वजन करने वाला सिस्टम लगाएगा, तभी बड़ी गाड़ियां पार होंगी. मगर परिचालन शुरू होने के बाद सारे नियम धरे रह गए और वजन का सिस्टम भी नहीं लगा. और तो और, जब दो साल पहले पुल फिर से जवाब देने लगा तब भी इस तरफ किसी का ध्यान नहीं गया. मेंटेनेंस के लिए पैसा मांगा जाता रहा और पुल से भारी वाहन बेरोकटोक गुजरते रहे.

सारा ठीकरा कार्यपालक अभियंता पर
विक्रमशिला सेतु गिरने के अगले दिन पुल निर्माण निगम के चेयरमैन चंद्रशेखर ने मीडिया से कहा, ''महीने भर पहले एक टीम पुल की जांच करने गई थी, जिसमें आइआइटी पटना के भी लोग थे. उन्होंने कहा था कि पुल के पिलर पूरी तरह सुरक्षित हैं, कोई मेजर फॉल्ट नहीं पाया गया था. चूंकि पुल को बने काफी समय हो गया था इसलिए उसकी मरम्मत की डीपीआर बनाकर भेजी थी, वह स्वीकृति की प्रक्रिया में है. बीच में छोटी-मोटी मरम्मत के लिए पथ निर्माण विभाग के कार्यपालक अभियंता को निर्देश दिए गए थे.’’

उस वक्त पुल गिरने की सारा जिम्मा पथ निर्माण विभाग के कार्यकारी अभियंता साकेत कुमार रौशन पर डालकर उन्हें निलंबित कर दिया गया. विक्रमशिला सेतु के समानांतर 2020 से बन रहे फोन लेन पुल के दिसंबर, 2026 तक पूरा होने की उम्मीद जताई गई है. मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने क्षतिग्रस्त पुल का हवाई सर्वे कर इसे तीन महीने में दुरुस्त करने का निर्देश दिया है.

तीन महीने में ठीक हो जाएगा सब?
विक्रमशिला सेतु के पास के जमीनी हालात ऐसे नहीं लगते कि तीन महीने में पहले जैसी स्थिति बहाल हो पाएगी? बिहार सरकार ने मदद के लिए सीमा सड़क संगठन के अधिकारियों को बुलाया है. वे पुल के टूटे हुए हिस्से पर बेली ब्रिज बनाने की तैयारी में हैं. डीएम चौधरी कहते हैं, ''मुझे उम्मीद है कि यह बेली ब्रिज अगले एक महीने में तैयार हो जाएगा.’’ मगर इससे अधिकतम चार पहिया वाहन ही गुजर पाएंगे. इसके बाद भी पुल पर खतरा बरकरार रहेगा क्योंकि जांच टीम को 13 जगहों पर ऐसी ही दिक्कत मिली है. मेंटेनेंस के साथ पुल फिर से दुरुस्त करना बड़ा काम होगा.

इसके समानांतर 2020 से बन रहे पुल के निर्माण की रफ्तार काफी धीमी है. इसकी निर्माण कंपनी के मालवाहक जहाज को प्रशासन ने सवारियां ढोने के लिए ले लिया है, ऐसे में उसका काम पूरी तरह रुक गया है. दिक्कत यह है कि पुल बनाने वाली कंपनी वही एसपी सिंगला है जिसने सुल्तानगंज में गंगा नदी पर पुल बनाया जो तीन बार गिर चुका है.

मालवाहक ट्रकों को इधर से उधर ले जाने के लिए जिला प्रशासन बड़े जहाज मंगवाने की तैयारी में है. इससे बालू, स्टोन चिप्स और थोक सामग्रियों के परिवहन का मसला कुछ हद तक सुलझेगा. अभी लंबे समय तक इस रास्ते से गुजरने वाले लोगों को जल परिवहन का सहारा लेना पड़ेगा. 

दूसरे पुलों के गिरने की दास्तान
विक्रमशिला सेतु के अलावा पिछले दो वर्षों में बिहार में ऐसे 14 पुल गिरे हैं और चार वर्षों में यह संख्या 21 तक पहुंच जाती है. इनमें पांच निर्माणाधीन पुल हैं. शेष पुराने. सरकार बार-बार पुलों के हेल्थ इंडेक्स तैयार कराने का दावा करती है. पिछले साल इस संबंध में पॉलिसी भी बनी.

विक्रमशिला हादसे के बाद पथ निर्माण विभाग के सचिव पंकज कुमार पॉल ने राज्य के 60 मीटर से लंबे सभी पुलों का 72 घंटे के भीतर सेफ्टी ऑडिट करने और रिपोर्ट पीएमआइएस पोर्टल पर अपलोड करने को कहा. उन्होंने चेतावनी भी दी कि अगर कोई पुल गिरता है तो क्षेत्र के कार्यपालक अभियंता के साथ मुख्यालय के अफसरों पर कठोर कार्रवाई होगी. लेकिन राज्य में पुल धराशाई होने की घटनाओं के मद्देनजर कार्रवाई और उसके नतीजे के इंतजार में पुल गिरने का कोई दूसरा हादसा न हो जाए.

बिहार ने ब्रिज मेंटेनेंस पॉलिसी बनाई

जून, 2025 में इस नीति की घोषणा करते हुए उस समय के पथ निर्माण मंत्री नितिन नबीन ने कहा था, ''बिहार देश का पहला राज्य है, जिसने ब्रिज मेंटेनेंस पॉलिसी बनाई है और अब हमने राज्य के सभी पुलों का हेल्थ इंडेक्स तैयार करना शुरू कर दिया है. हमने राज्य के सभी पुलों को तीन हिस्से में बांटा है.

पहला हिस्सा छह से साठ मीटर लंबे पुलों का; फिर 60 से 250 मीटर लंबे ब्रिज; और उसके बाद 250 मीटर से ज्यादा लंबे ब्रिज. तीनों सेग्मेंट के पुलों की जांच इंजीनियरों की टीम करेगी. हमने आइआइटी दिल्ली और आइआइटी पटना की टीम का भी सहयोग लिया है. यह टीम साल भर में अपनी रिपोर्ट देगी, फिर हम पुलों का मेंटेनेंस करेंगे.’’

पथ निर्माण विभाग की 2025-26 की वार्षिक रिपोर्ट में बताया गया है कि बिहार में पिछले 18 वर्षों में 3,986 पुल बने हैं. इनमें मेगा ब्रिज, मेजर ब्रिज और फ्लाइ ओवरों की संख्या 532 है. इन सभी पुलों के रखरखाव और कारगर प्रबंधन के लिए ही बिहार राज्य पुल प्रबंधन और संधारण नीति, 2025 को लागू किया गया है.

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