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जाट से आगे की जंग

रालोद प्रमुख जयंत चौधरी भाजपा गठबंधन में रहते हुए जाट-मुस्लिम के साथ ब्राह्मण-त्यागी समीकरण साधकर पश्चिमी यूपी में पार्टी की जमीन मजबूत करने की कोशिश में जुटे

भाईचारा रालोद प्रमुख जयंत चौधरी मेरठ के ईकड़ी गांव में 25 अप्रैल को एक रैली के दौरान
अपडेटेड 23 मई , 2026

मेरठ के ईकड़ी गांव की धूल भरी चौपाल पर 25 अप्रैल को जब जयंत चौधरी ने माइक संभाला, तो शुरुआत सियासत से नहीं, शायरी से हुई. मशहूर शायर बशीर बद्र का शेर: जिस दिन से चला हूं मेरी मंजिल पे नजर है, आंखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा. दरअसल, यह एक संकेत था कि यह रैली सिर्फ भीड़ जुटाने का कार्यक्रम नहीं, बल्कि 2027 की लंबी राजनैतिक यात्रा का उद्घोष है.

'एकता रैली' के मंच से जयंत ने जिस तरह संगठन, सामाजिक संतुलन और नई पीढ़ी की भागीदारी को जोड़ा, उसने साफ कर दिया कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) अपनी खोई जमीन वापस पाने के लिए बहुस्तरीय रणनीति पर काम कर रहा है.

इस रैली का सबसे अहम संदेश था: ''समीकरण साधो, दूरी घटाओ, पहचान बचाओ.'' भाजपा के साथ गठबंधन में रहते हुए रालोद अपने वोट बैंक जाटों को साधकर नया सामाजिक गठजोड़ खड़ा करने की कोशिश में है. ईकड़ी की सभा में जयंत ने दादा चौधरी चरण सिंह और पिता अजित सिंह की विरासत को याद किया—एक ऐसी राजनीति, जिसकी बुनियाद किसान, भाईचारा और सामाजिक संतुलन पर टिकी रही है.

ब्राह्मण-त्यागी कार्ड
ईकड़ी रैली में एक दिलचस्प पहलू रहा ब्राह्मण-त्यागी समाज की बड़ी मौजूदगी. जयंत ने इसे सिर्फ भीड़ के रूप में नहीं देखा, बल्कि राजनैतिक संकेत में बदला. उन्होंने युवा अनिकेत भारद्वाज को जिलाध्यक्ष बनाने का जिक्र करते हुए कहा कि यह सिर्फ संगठनात्मक फैसला नहीं, बल्कि पुराने सामाजिक रिश्तों को फिर से जीवित करने की कोशिश है. यह संदेश साफ था कि रालोद अब केवल जाट-मुस्लिम समीकरण तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि ब्राह्मण-त्यागी जैसे वर्गों को भी साथ जोड़ना चाहता है.

जनता दल यूनाइटेड से आकर शामिल हुए वरिष्ठ नेता के.सी. त्यागी की मौजूदगी भी जयंत की रणनीति को पुष्ट कर रही थी. यही वजह है कि उन्होंने मेरठ के रासना गांव में स्टेडियम बनाने का ऐलान किया और त्यागी समाज के साथ अपने परिवार के पुराने रिश्तों को याद दिलाया. विश्लेषकों के मुताबिक, इस तरह के प्रतीकात्मक फैसले राजनीति में सिर्फ घोषणाएं नहीं होते, बल्कि भरोसे की पुनर्स्थापना के औजार बनते हैं.

पश्चिमी यूपी में भाजपा का इस वर्ग पर मजबूत प्रभाव रहा है. ऐसे में रालोद का यह दांव सीधा उस प्रभाव को चुनौती देने जैसा है. जयंत सिर्फ पश्चिमी यूपी तक सीमित नहीं रहना चाहते. देवरिया, वाराणसी और प्रयागराज जैसे इलाकों में भी पार्टी की सक्रियता बढ़ाई जा रही है. पूर्वांचल के ब्राह्मण नेता अनिल दुबे को जयंत ने पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव बनाया है.

हालांकि, असली लड़ाई अभी भी पश्चिम में ही है, जहां रालोद की जड़ें सबसे गहरी हैं. ईकड़ी रैली में युवा चेहरों को आगे लाने का संदेश भी साफ था. जयंत को एहसास है कि 2027 की लड़ाई सिर्फ पुराने समीकरणों से नहीं जीती जा सकती, इसके लिए नए चेहरों और नई ऊर्जा की जरूरत होगी.

जाट-मुस्लिम समीकरण 
ईकड़ी गांव को समाहित करने वाली सिवालखास जैसी सीटों पर मुस्लिम मतदाता निर्णायक रहे हैं. मौजूदा विधायक गुलाम मोहम्मद के जरिए रालोद का इस वर्ग से सीधा संपर्क बना हुआ है, लेकिन भाजपा के साथ गठबंधन के बाद इस रिश्ते में असहजता भी आई है. ईकड़ी रैली में मुस्लिम समुदाय की अच्छी भागीदारी को इसी संदर्भ में देखा जा रहा है. मेरठ कॉलेज में अर्थशास्त्र विभाग के प्रोफेसर मनोज सिवाच बताते हैं, ''जयंत की रणनीति तीन स्तरों पर काम कर रही है:

पहला, मुस्लिम वोटरों को यह भरोसा दिलाना कि रालोद अब भी उनके हितों की आवाज है; दूसरा, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस की ओर उनके पूर्ण ध्रुवीकरण को रोकना; और तीसरा, खुद को एनडीए के भीतर एक 'सेतु पार्टी' के रूप में स्थापित करना.'' पर यह संतुलन आसान नहीं. एक तरफ गठबंधन की मजबूरी है, दूसरी तरफ पारंपरिक आधार को बनाए रखने की जरूरत. इसलिए जयंत बार-बार 'भाईचारे' की बात कर रहे हैं: एक ऐसा नैरेटिव जो 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों के बाद टूटे सामाजिक रिश्तों को जोड़ने की कोशिश करता है.

रालोद की राजनीति का मूल आधार जाट-मुस्लिम गठजोड़ रहा है. 2013 के बाद इस समीकरण में आई दरार को भरने के लिए अजित सिंह ने 'भाईचारा अभियान' चलाया था. अब वही रणनीति नए संदर्भ में जीवित होती दिख रही है. फर्क इतना है कि अब परिस्थितियां ज्यादा जटिल हैं: भाजपा के साथ गठबंधन और बदली हुई राजनैतिक ध्रुवीकरण की स्थिति. बकौल सिवाच, ''जयंत का जोर इस पर है कि जाटों के बीच पकड़ बनी रहे, और मुस्लिम वोट पूरी तरह हाथ से न निकलें. इसके लिए वे किसानों और ग्रामीण मुद्दों को फिर से केंद्र में ला रहे. यह वही जमीन है, जहां से चौधरी चरण सिंह की राजनीति खड़ी हुई थी.''

गठबंधन की चुनौती
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाल के महीनों में राजनीति तेजी से बदली है. मेरठ के सकौती में 29 मार्च को जाट राजा सूरजमल की प्रतिमा के अनावरण से शुरू हुआ विवाद, फिर 13 अप्रैल को मुजफ्फरनगर में योगी आदित्यनाथ और जयंत की संयुक्त सभा, इन घटनाओं ने इलाके की सियासत को नई दिशा दी है. इस दौरान जयंत ने एक और दिलचस्प कदम उठाया. उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और चरण सिंह को एनडीए का वैचारिक आधार बताया. बयान सीधे तौर पर भाजपा के साथ वैचारिक सामंजस्य दिखाने को था. वहीं दूसरी तरफ, जाट राजनीति में उबाल पैदा करने वाली घटनाओं पर रालोद ने आक्रामक रुख भी अपनाया. संदेश गया कि पार्टी अपने मूल सामाजिक आधार को लेकर अब भी संवेदनशील है.

रालोद ने अब अपने बूते मेरठ की सिवालखास सीट से चुनावी अभियान की शुरुआत की, जिसे पश्चिमी यूपी में सियासी रूप से अहम माना जाता है. इसके बाद पार्टी प्रमुख जयंत ने 3 मई को बागपत जिले की बड़ौत विधानसभा सीट पर बलैनी गांव में रैली कर मौजूदगी दर्ज कराई. यह इलाका जाट, गुर्जर और त्यागी समुदाय के प्रभाव वाला क्षेत्र है, जहां सामाजिक समीकरण चुनावी परिणामों को सीधे प्रभावित करते हैं. सिवालखास सीट पर फिलहाल रालोद के विधायक गुलाम मोहम्मद हैं, जबकि बड़ौत सीट भाजपा के खाते में है, जहां से कृष्णपाल मलिक प्रतिनिधित्व करते हैं.

वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में इस सीट पर तगड़ा मुकाबला देखने को मिला था, जब मलिक ने रालोद उम्मीदवार जयवीर को महज 300 वोटों से हराया था. तब रालोद समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में था और मुस्लिम वोटों के एकजुट होने से भाजपा को कड़ी टक्कर मिली थी. इसके बाद रालोद ने सपा से दूरी बनाकर भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन का हिस्सा बनने का फैसला किया.

राजनैतिक विश्लेषक मानते हैं कि भाजपा के साथ गठबंधन के बाद मुस्लिम वोटरों का एक हिस्सा रालोद से दूरी बना सकता है. यही वजह है कि जयंत बार-बार भाईचारे की बात करते हैं और रैलियों में मुस्लिम भागीदारी को अहमियत देते हैं. सवाल है कि क्या यह रणनीति काम करेगी? इसका जवाब अभी भविष्य के गर्भ में है. मुस्लिम वोट पूरी तरह सपा-कांग्रेस के साथ चला जाता है, तो रालोद के लिए चुनौती बढ़ सकती है. वहीं अगर वह कुछ हद तक भी साथ बना रहता है, तो ब्राह्मण-त्यागी और दूसरे वर्गों के साथ मिलकर रालोद संतुलन बना सकती है. 

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