गोवा में ऐतिहासिक तनाव फिर से उभर आए हैं. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए इन्हें खारिज करना मुश्किल हो रहा है. भाषाई जंग गोवा जितनी ही पुरानी है.
कभी राज्य में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रमुख चेहरा रहे पर बाद में उससे असहमत होकर बाहर निकले सुभाष वेलिंगकर इस आग को हवा दे रहे हैं.
उन्होंने मराठी को सह-आधिकारिक दर्जा देने की मांग को लेकर आंदोलन छेड़ दिया है. उन्होंने चेताया कि मांग पूरी न हुई तो 2027 के राज्य चुनाव में मराठी वोटबैंक भाजपा के खिलाफ वोट देगा.
जवाब में कोंकणी एक्टिविस्ट भी उठ खड़े हुए हैं. उन्होंने चेतावनी दी है कि गोवा की पहचान भाषा पर टिकी है और मराठी का दर्जा बढ़ाने का वादा करने वाली किसी भी पार्टी को कोंकणीभाषियों के भारी विरोध का सामना करना पड़ेगा. मुख्यत: कैथोलिकों वाला एक धड़ा चाहता है कि रोमन लिपि में लिखी जाने वाली कोंकणी को, जिसे रोमी कोंकणी या कोंकणिम कहा जाता है, आधिकारिक लिपि के तौर पर मान्यता दी जाए.
दो वर्षों के आंदोलन के बाद 1987 में देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली कोंकणी को गोवा की आधिकारिक भाषा का दर्जा दिया गया. यह भी प्रावधान है कि मराठी का प्रयोग 'सभी या किसी भी सरकारी उद्देश्य के लिए' किया जा सकता है.
2011 की जनगणना में 9,64,000 मूल कोंकणीभाषी दर्ज किए गए. वहीं 1,59,000 ने मराठी को मातृभाषा बताया. मगर मराठी व्यापक रूप से बोली-पढ़ी जाती है. कई गोवावासी हिंदू मराठी अखबार पढ़ते हैं. दो सहोदर भाषाओं के बीच इस भाषाई सहजता को कइयों के अलावा 1963 में सत्ता में आई महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी (एमजीपी) ने भी बढ़ावा दिया.
मूल औपनिवेशिक
मगर अस्तित्व से जुड़ी बेचैनी के चलते वह सहजता धीरे-धीरे नदारद हो गई. मराठी इस पुरानी दलील के लिए भी सेतु का काम करती है कि गोवा को महाराष्ट्र का हिस्सा बना देना चाहिए था. एमजीपी ने तब इस विचार की हिमायत की. 1967 में हुए एक जनमत संग्रह ने इस मत को खारिज कर दिया. यह औपनिवैशिक नजरिया गोवावासियों को चिढ़ाता है. इसके हिसाब से कोंकणी पूरी तरह स्वायत्त भाषा नहीं, 'मराठी की एक बोली' भर है.
प्रमोद सावंत सरकार के लिए अब यह एक चुनौती है. सत्तारूढ़ भाजपा ने 2016 में जब आर्कडायोसीस के हाथों संचालित स्कूलों समेत अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों को अनुदान की मंजूरी दी, तो वेलिंगकर उसके खिलाफ थे. राज्य के 2017 के चुनाव में उनके टूटकर अलग हुए धड़े ने एमजीपी, शिवसेना आदि से हाथ मिलाया. वह फला-फूला तो नहीं मगर उस अभियान ने भाजपा कार्यकर्ताओं के मनोबल को तोड़ा. नतीजा हार के रूप में निकला. तब मुख्यमंत्री लक्ष्मीकांत पार्सेकर और पांच मंत्री चुनाव हार गए.
अब वेलिंगकर फिर वैसा ही करने आमादा हैं. उनकी मराठी राजभाषा निर्धारण समिति ने अगले विधानसभा सत्र में मराठी का आधिकारिक दर्जा बढ़ाने के लिए प्रस्ताव लाने की मांग की है. उन्होंने आगाह किया कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो 'मराठी और हिंदू वोट बैंक' भाजपा को राजगद्दी से उतार देंगे. वे कहते हैं, ''मराठी महाराष्ट्र से आयातित नहीं है. यह गोवा में ही विकसित हुई.''
जाति का पहलू इस पेच को और उलझा देता है. मराठी पक्ष का कहना है कि मानकीकृत कोंकणी पुर्तगाली से उधार लिए गए अपने शब्दों के साथ सारस्वत ब्राह्मणों और कैथोलिकों के सामाजिक दबदबे का औजार है और इससे वे पिछड़े अलग-थलग हो जाते हैं जिनका 'मराठी से गहरा नाता' है. भाषाई कार्यकर्ता जी.आर. धवलीकर सबूत के तौर पर पंचायतों में पारित मराठी समर्थक प्रस्तावों का हवाला देते हैं. उनके साथी प्रदीप घाड़ी अमोणकर 2027 की जनगणना में मराठी को मातृभाषा बताने के पक्ष में ज्यादा मत देने का आग्रह कर रहे हैं.
उलट लामबंदी
इसके उलट कोंकणी धड़े मराठी समर्थक पार्टियों के बहिष्कार की धमकी दे रहे हैं. ऐसे में भाजपा के प्रतिद्वंद्वियों को गुंजाइश दिख रही है. आप की प्रतिमा कोटिन्हो कहती हैं, ''भाजपा सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कर रही है.'' ग्लोबल रोमी लिपि अभियान के केनेडी अफोंसो कहते हैं, ''मराठी स्कूल भी अंग्रेजी की ओर जा रहे हैं.'' वे रोमी कोंकणी को मान्यता देने और इसे स्कूलों में पढ़ाने की मांग करते हैं. आरएसएस के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि इस झगड़े का उत्तर गोवा के 40 विधानसभा क्षेत्रों में असर पड़ सकता है. पर विश्लेषक राजू नायक मानते हैं, ''युवाओं के बड़े हिस्से का इस भाषाई राजनीति से लेना-देना नहीं.''

