
किशनगंज जिले के धनतोला पंचायत में घुसते ही एक मंदिर दिखता है, जहां अष्टयाम कीर्तन चल रहा है. थोड़ी दूर जाने पर एक टोले में पेड़ों के नीचे एक पंचायत बैठी है. वहां लोगों की बातचीत का विषय बांग्लादेशी घुसपैठ है.
पूर्व पंचायत सदस्य तेजनारायण गिरी बताते हैं, ''2001 में जब यहां पंचायत चुनाव हुआ था तो शेरशाहबादी सिर्फ 935 वोटर थे, पिछले चुनाव में 3,600 वोटर हो गए.
बीस साल में चार गुना. ये लोग कहां-कहां से आते हैं, और हमारे पंचायत में बसते चले जा हैं. इन लोगों ने यहां कम से कम 100 एकड़ सरकारी जमीन पर कब्जा किया हुआ है. बहुत जल्द हम लोग ही यहां अल्पसंख्यक हो जाएंगे.’’ यहां हिंदू कितने हैं? तेजनारायण बताते हैं, ''8,500 वोटर, 1,700 परिवार.’’
सन् 2001 में यहां के मुखिया रहे नजरुल इस्लाम, जिन्हें दूसरे लोग बांग्लादेशी बताते हैं, कहते हैं, ''यह सच है कि इस गांव में हमारी आबादी बढ़ी है, मगर इसकी वजह घुसपैठ नहीं है. हमारे लोग परिवार नियोजन का इस्तेमाल करना गैर मजहबी मानते हैं, इसलिए हर घर में 10-12 बच्चे हो गए हैं. हमें जमीन खरीदने का जुनून रहता है, तो कई बार गलत जमीन भी खरीद लेते हैं. मगर इसे हमें बदनाम करने का जरिया नहीं बनाना चाहिए. हम इसी देश के हैं. बंगाली बोलते हैं, इसका मतलब यह नहीं कि बांग्लादेशी हैं.’’
नेपाल की सीमा से बिल्कुल सटे धनतोला पंचायत को किशनगंज का सबसे ज्यादा घुसपैठ प्रभावित क्षेत्र बताया जाता है. भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष अभिनव मोदी दिघलबैंक प्रखंड के ऐसे नौ गांवों की सूची देते हैं, जहां सबसे ज्यादा घुसपैठ हुई है. इनमें लक्ष्मीपुर, मोहामारी, बालूबाड़ी, तेलीभीट्ठा, बैरबन्ना, करेलाबाड़ी, दो गिरजा, श्रीपुर और सतकौआ हैं. ठाकुरगंज के जद (यू) विधायक गोपाल अग्रवाल जो इन दिनों बांग्लादेशी घुसपैठ को लेकर सबसे मुखर हैं. वे भी कमोबेश इन्हीं गांवों का नाम गिनाते हैं.
अग्रवाल कहते हैं, ''इस क्षेत्र में बांग्लादेशी घुसपैठ लगातार जारी है. 2010 के बाद इनके आने की गति में तेजी आई है. ये सरकारी जमीन, भूदान की और सैरात की जमीन पर धड़ल्ले से कब्जा करते हैं. मैंने किशनगंज जिला प्रशासन को ऐसी 1,600 एकड़ जमीन की सूची दी है. हम लोग 2,000 एकड़ जमीन की दूसरी सूची भी तैयार कर रहे हैं. मेरे पास 500 एकड़ ऐसी जमीन की शिकायतें हैं, जो लोगों की निजी जमीन है. विवादित थी और इन लोगों ने खरीद ली.’’
उनके आरोप इतने पर खत्म नहीं होते. वे कहते हैं, ''बांग्लादेशी घुसपैठिए हमारे इलाके में लव जेहाद भी कर ही रहे हैं. मैंने 137 लड़कियों को लव जेहाद का शिकार होने से बचाया है. इसके अलावा ये लोग गो तस्करी, और जाली नोट के कारोबार और ड्रग्स के धंधे से भी जुड़े हैं.’’
माहौल गरम
दरअसल, इन दिनों बिहार के सीमांचल का इलाका घुसपैठ के सवाल को लेकर गरमाया हुआ है. इसकी वजह है फरवरी के आखिर में गृह मंत्री अमित शाह की सीमांचल यात्रा के दौरान दिया गया यह बयान: ''बिहार को घुसपैठियों से मुक्त कराने का अभियान सिर्फ मतदाता सूची से नाम हटाने तक सीमित नहीं रहेगा. भारत भूमि से एक-एक घुसपैठिए को बाहर किया जाएगा. इसकी शुरुआत सीमांचल से जल्द होगी.’’
इसके बाद उन्होंने भारत-नेपाल सीमा से सटे दस किमी के दायरे में सभी अवैध ढांचों, अतिक्रमण और अनधिकृत बस्तियों की सूची बनाने के निर्देश दिए. उनका खासा जोर अवैध धार्मिक ढांचों पर था. वे गुजरात मॉडल का जिक्र कर रहे थे, जहां सीमा और तटीय इलाकों से अतिक्रमण हटाए गए थे.
दरअसल, इसे उस 'हाइ पावर्ड डेमोग्राफी मिशन’ का हिस्सा माना जा रहा है, जिसकी घोषणा 15 अगस्त, 2025 को अपने भाषण के दौरान पीएम मोदी ने की थी. इस दौरान उन्होंने सीमावर्ती क्षेत्रों में घुसपैठ और अवैध प्रवासन के कारण उत्पन्न जनसांख्यिकीय असंतुलन के खतरों को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चुनौती बताया था.

कौन है घुसपैठिया
घुसपैठिया आखिर है कौन? अभिनव मोदी कहते हैं, ''यहां का बच्चा-बच्चा जानता है कि बांग्लादेशी घुसपैठिया कौन है. वे अपनी भाषा, वेशभूषा और घर बनाने के तरीके से ही पहचान में आ जाते हैं. उन्होंने अपने समुदाय का नाम शेरशाहबादी रख लिया है और उन्हें ईबीसी आरक्षण भी मिला है, जाति प्रमाणपत्र भी बनता है. जो खुद को शेरशाहबादी कहते हैं, वे सौ फीसद बांग्लादेशी घुसपैठिए हैं.’’
राज्य में 2023 में हुई जाति आधारित गणना के मुताबिक, शेरशाहबादी समुदाय की कुल आबादी 13 लाख से कुछ ज्यादा है. इसे राज्य की कुल आबादी का 0.99 फीसद बताया गया है. उनकी सबसे बड़ी आबादी कटिहार जिले के अमदाबाद, मनिहारी, प्राणपुर और बरारी प्रखंडों में है.
इसके बाद किशनगंज जिले के किशनगंज, ठाकुरगंज और दिघलबैंक प्रखंडों में ये सघन रूप से बसे हैं. इनकी आबादी पूर्णिया, अररिया और सुपौल जिले में छिटपुट है, तो कुछ लोग बेहतर मौके की तलाश में दूसरे जिलों में भी बस गए हैं. 1999 में इन्हें अति पिछड़ा आरक्षण भी दिया गया.
भाजपा और संघ से जुड़े लोग कहते हैं कि इस इलाके में हिंदुओं में राजवंशी, संथाल, गनगई और मुसलमानों में सुरजापुरी और कुल्हैया स्थानीय हैं. शेरशाहबादी आकर इन लोगों की जमीन और अवसर हथिया रहे हैं.
शेरशाहबादी खुद को बंगाल के मालदा-मुर्शिदाबाद जिले का रहनेवाला बताते हैं. सीमावर्ती इलाकों के लोग बताते हैं कि 1960 के बाद से ही बांग्लादेश (तब पूर्वी पाकिस्तान) से हिंदू और मुसलमान दोनों आते रहे. बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के बाद उनके आने की गति तेज हो गई. यह सिलसिला 1993 तक जारी रहा, जब तक उन इलाकों में सीमा पर बाड़बंदी नहीं हुई.
नब्बे के दशक में भी अभियान
दरअसल सीमांचल के इलाके में घुसपैठ का मुद्दा नया नहीं है. अभिनव मोदी बताते हैं, ''1983-84 में जब यहां सबसे ज्यादा घुसपैठ हो रही थी, तभी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद इस इलाके में घुसपैठ के खिलाफ सक्रिय हो गई थी. उस अभियान के नेता सुशील मोदी और हरेंद्र प्रताप थे. उस वक्त सुशील जी ने किशनगंज जिले में गांव-गांव घूमकर 45,000 बांग्लादेशी घुसपैठियों की सूची तैयार की थी और उसे किताब के रूप में छपवाया भी था.’’
वे कहते हैं, ''जब देश आजाद हो रहा था तब किशनगंज अनुमंडल ही था. तब यहां 51 फीसद हिंदू और 49 फीसद मुसलमान थे. इसलिए इसे भारत का हिस्सा बनाया गया. नहीं तो 14 अगस्त को तो इसे पाकिस्तान का हिस्सा मानकर मुस्लिम लीग ने यहां अपना झंडा फहरा ही दिया था. 1965-70 के आसपास पूर्वी पाकिस्तान से यहां जनसंख्या की बाढ़ आनी शुरू हुई तो उसे आज तक रोका नहीं जा सका.’’
वहीं अग्रवाल इस इलाके में घुसपैठ को मुद्दा बनाने का श्रेय अपने पिता ताराचंद धानुका को देते हैं, जो 1984 में भाजपा के टिकट पर किशनगंज लोकसभा का चुनाव लड़े थे. उनके मुताबिक उनके पिता ने उसी साल विजयवाड़ा के भाजपा अधिवेशन में बांग्लादेशी घुसपैठ के मुद्दे को उठाया था.
मगर हैरत की बात है कि न मोदी और न ही अग्रवाल अमित शाह के इस अभियान से संतुष्ट हैं. मोदी कहते हैं, ''प्रशासन कुछ नहीं कर रहा. सिर्फ कुछ लोगों को नोटिस दिए गए हैं.’’ वहीं अग्रवाल कहते हैं, ''मुझे अब भी लगता है कि भाजपा इस मुद्दे पर वोट की राजनीति कर रही है. पहले अमित शाह को यह पता करना चाहिए था कि इस इलाके में कौन लोग शुरुआत से इस मुद्दे पर सक्रिय हैं. उनसे सलाह लेनी चाहिए थी. आज शाह उस नेता (उनका इशारा दिलीप जायसवाल की तरफ था) के साथ हैं, जो तस्लीमुद्दीन के बाद इस समाज का सबसे बड़ा संरक्षक है.’’
दरअसल इस इलाके के बड़े भाजपा नेता जायसवाल, जो अमित शाह के करीबी हैं, के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने शेरशाहबादी बिरादरी के एक बड़े नेता अब्दुर रहमान को भाजपा के टिकट पर दो बार विधायक का चुनाव लड़वाया है. हाल तक भाजपा के सदस्य रहे अब्दुर रहमान अभी किसी पार्टी में नहीं. मगर वे खुद को आज भी दिलीप जायसवाल का आदमी कहते हैं.
'एसआइआर में घुसपैठिया नहीं’
अग्रवाल के आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए इंडिया टुडे से बातचीत में अब्दुर रहमान कहते हैं, ''इनके आरोप हंड्रेड परसेंट बेबुनियाद हैं. हमें तो लगता है ये खुद बांग्लादेशी हैं और इनके पूर्वजों को वहां की सरकार ने गद्दारी के आरोप में देश से भगाया है. जब मुझे भाजपा से टिकट मिला था, तब भी ऐसे लोगों ने मुझे घुसपैठिया कहा था. मगर हमारे लोग बांग्लादेश से नहीं आए हैं. हम लोग मालदा-मुर्शिदाबाद के रहने वाले हैं, वहां कटाव के कारण विस्थापित होकर यहां आए. 1990 के बाद तो शायद ही कोई आया है.’’
वे कहते हैं, ''जमीन कब्जे की बात तो सरासर गलत है. हमारे लोग भूमिहीन थे तो जमीन खरीदने की उनमें होड़ रहती है. इस चक्कर में इन्होंने कुछ गलत या भूदान की जमीन खरीद ली होगी. मगर मेरा दावा है कि हमारे लोगों की 99 फीसद जमीन शुद्ध है. ये हमारे तौहीद ट्रस्ट पर आरोप लगाते हैं, मगर सच यही है कि तौहीद ट्रस्ट की मदद से ही ये एमएलए बने हैं. और दूसरी बात तौहीद ट्रस्ट पूरी तरह जकात के पैसों से चलता है. सरकार इसके खातों की जांच करा सकती है.’’
अब्दुर रहमान ऑल बिहार शेरशाहबादी एसोसिएशन से जुड़े हैं. इस संगठन के अध्यक्ष सईदुर रहमान की सुनें, ''कहा जाता है कि बांग्लादेशी यहां आकर बस गया है, लेकिन एसआइआर में कितने घुसपैठिये मिले? यहां भी तो हमारा विरोध करने वाले राजस्थान या बांग्लादेश से आए हैं, वे क्या घुसपैठिए हैं? हम बांग्लाभाषी हैं, इसका मतलब यह तो नहीं कि हम बांग्लादेशी हैं? यह तो सरासर बदमाशी है और वोट की राजनीति है. सीमांचल का माहौल बिगाड़ने की साजिश है.’’
धीमी है प्रशासनिक कार्रवाई
जहां इस मुद्दे को लेकर राजनीति तेज है, वहीं जमीन पर डेमोग्राफी मिशन को लेकर वैसी प्रशासनिक सक्रियता नहीं दिखती. इसे लेकर कुछ बैठकें जरूर हुई हैं. पिछले दिनों मुख्य सचिव प्रत्यय अमृत ने भी बैठक कर इन कार्रावाइयों का जायजा लिया.
किशनगंज के डीएम विशाल राज कहते हैं, ''हमने सर्वेक्षण कराया तो पता चला कि हमारे जिले में नो मेन्स लैंड में छह और सीमा के 15 किमी के भीतर 15 अवैध अतिक्रमण के मामले थे.
उन्हें हमने हटा दिया है.’’ विधायक अग्रवाल की 1,600 एकड़ जमीन की सूची के बारे में पूछने पर वे कहते हैं, ''हम उस पर भी काम कर रहे हैं. मगर वह लंबी कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है. वे मामले अदालत में जाएंगे.’’ अररिया में सिर्फ सिकटी प्रखंड में अतिक्रमण हटाने का अभियान चलने की खबर है, वह भी इसलिए कि वहां शाह जाने वाले थे.
'सीमांचल को विकास चाहिए’
टाटा सामाजिक संस्थान के पूर्व प्राध्यापक पुष्पेंद्र कहते हैं, ''लंबे अरसे तक भारत सरकार की ऐसी नीति रही है कि वे पूर्वी पाकिस्तान से हर तरह के शरणार्थियों को आने देते थे. उसमें हिंदू भी आए और मुसलमान भी. हालांकि जिनकी बात हो रही है, वे बांग्लादेश से आए हैं या नहीं, यह मैं नहीं कह रहा.
दूसरी बात सीमांचल में कोई घुसपैठिया है भी, यह बात एसआइआर में तो सामने नहीं आई. बीस साल से राज्य में एनडीए की सरकार है और 12 साल से केंद्र में भाजपा की सरकार. ऐसे में घुसपैठ को रोकना उनकी जिम्मेदारी है.’’ वे यह भी कहते हैं कि अभी जिस डेमोग्राफी मिशन की बात कही जा रही है, ''मुझे लगता है, उसका मकसद घुसपैठ रोकना कम, हिंदू-मुस्लिम तनाव को उबाल पर रखना ज्यादा है.’’
पुष्पेंद्र कहते हैं, ''बिहार एक पिछड़ा राज्य है, सीमांचल बिहार का सबसे पिछड़ा इलाका. अभी सरकार को वहां विकास के काम पर फोकस करना चाहिए. सीमांचल की जरूरत विकास है, घुसपैठ के खिलाफ आंदोलन या डेमोग्राफी मिशन नहीं.’’ एसआइआर के बाद यकीनन गरीबी और पिछड़ेपन से लड़ने को प्राथमिकता मिलनी चाहिए क्योंकि अतिक्रमण के आरोप ''लंबी कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा’’ हैं और उन पर अदालतें अपना फैसला सुनाएंगी.

