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आग की लपटों में अब तीसरा कोण भी

संकटग्रस्त राज्य में किसी तरह बना नाजुक संतुलन जानलेवा रॉकेट हमले के बाद फिर बिगड़ा. मणिपुर के जातीय संघर्ष की आग ने अब नगा पक्ष को भी लपेटे में लिया

बिष्णुपुर में 7 अप्रैल को मैतेई इलाके में ग्रेनेड गिरने के बाद हुए विरोध प्रदर्शन में जलाए गए टैंकर
अपडेटेड 12 मई , 2026

- हृजय दास कानूनगो

मणिपुर में कोई महफूज नहीं. वर्दीधारी भी नहीं. अप्रैल की 7 तारीख को पौ फटने से पहले तोप के दो गोलों ने बिष्णुपुर की पहाड़ियों के आसमान में मेहराब तान दी. उनकी उड़ान के पूरे रास्ते पर संपूर्ण तबाही लिखी थी. मणिपुर की अशांत जातीय सरहद के उस तरफ का ट्राँगलाओबी गांव मैतेई समुदाय का है. और नजदीक की पहाड़ी ढलानें? वे कुकी-जो समुदाय के इलाके.

एक गोला बीएसएफ के जवान के घर पर गिरा, जो बिहार में ड्यूटी पर थे. उनका पांच साल का बेटा और पांच महीने की बेटी नींद में सोते हुए मारे गए, मां बुरी तरह घायल हो गईं. सुबह तक इंफाल घाटी सड़कों पर थी. चलता-फिरता गुस्सा सड़कों पर भीड़ की शक्ल में उतर आया. उन्होंने टायर जलाए और यहां तक कि सीआरपीएफ की एक चौकी को भी तहस-नहस कर दिया.

फिर क्या था, जल्द ही गेलमोल के करीब अर्धसैनिक बलों की तरफ से बदले में की गई गोलीबारी में तीन और मैतेइयों की लाशें बिछ गईं. मुख्यमंत्री युमनाम खेमचंद सिंह के 4 फरवरी को शपथ लेने बाद जो थोड़ी-बहुत शांति कायम हुई थी, उसे एक सुबह ने तार-तार कर दिया. मणिपुर में 7 से 27 अप्रैल के बीच कुछ और भी सामने आया.

कुल 11 लोग मारे गए, जिनमें बिष्णुपुर के दो लोग और टकराव के कारण अपने घर से बेघर हुई सात साल की एक लड़की भी शामिल थी. राष्ट्रीय राजमार्गों पर वाहन फूंके गए, नागरिकों ने सुरक्षाकर्मियों की टटोल-टटोलकर तलाशी ली, और मणिपुर के एक पुलिस कॉन्स्टेबल को अपने ही साथियों पर पत्थरबाजी करने के लिए गिरफ्तार किया गया. महिलाओं की अगुआई में सात दिनों का बंद आयोजित किया गया, जिसने घाटी को ठप कर दिया. इसमें पहाड़ों पर कुकी और नगाओं की तरफ से अलग से आयोजित बंद भी जुड़ गया.

नगा बंद से तीन साल पुराने इस टकराव का एक नया और चिंताजनक पहलू सामने आया. कुकी-बहुल गांव मुलम पर पौ फटने से पहले हुआ एक हमला. और एनएच-202 पर घात लगाकर किए गए हमले में नगा रेजिमेंट के एक सेवानिवृत्त सिपाही की मौत. इससे पता चला कि 3 मई, 2023 को पहली बार उभरा जख्म अभी भरा नहीं है. इसके बजाए इसने फूट की एक नई लकीर खींच दी है.

बैकफुट पर प्रशासन

मैतेई समुदाय के उदार खेमचंद को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठाकर भाजपा ने सोचा था कि एन. बीरेन सिंह की कथित पक्षपाती हुकूमत के बाद बना माहौल ठंडा पड़ जाएगा. 2027 की शुरुआत में होने वाले विधानसभा चुनाव के पहले कुछ वक्त भी शायद मिल जाए. समावेशी मंत्रिमंडल बनाया गया. कुकी नेमचा किपगेन और नगा लोसी दिखो को उपमुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गई.

मगर हिंसा जारी है. 2023 का टकराव बुनियादी तौर पर मैतेई-कुकी मसला था. नगा पहाड़ियां ज्यादातर इससे दूर थीं. फरवरी की 7 तारीख को उखरुल में तांगखुल के आदमी पर हमला और संदिग्ध कुकी लड़ाकों तथा नगा विलेज वॉलंटियरों के बीच गोलीबारी के बाद वह भी बदल गया. दो कुकी और एक नगा मारे गए.

खेमचंद ने शांति की बहुतेरी कोशिशें कीं. उखरुल के गांवों का दौरा किया, एनडीए के बहु-जातीय विधायक दल को सक्रिय किया, सिविल सोसाइटी को बातचीत के लिए बुलाया. उन्होंने 22 अप्रैल को वांगजिंग-टेंथा में एक सभा में कहा, ''बातचीत से सारे मुद्दे हल हो सकते हैं.'' लेकिन उनकी बात आखिरी पड़ाव तक नहीं पहुंच रही. प्रदर्शनकारियों ने उनके रास्ते में अवरोध खड़े कर दिए और उन्हें हेलिकॉप्टर से जाने के लिए मजबूर कर दिया. सारे कदम उठाना उनके बस में भी नहीं था. सीआरपीएफ के करीब 8,500 जवान पश्चिम बंगाल में चुनाव ड्यूटी के लिए हटा लिए गए. इसी बीच मणिपुर फट पड़ा. अब बारूदी सुरंगों और घात लगाकर किए जाने वाले हमलों से सुरक्षित वाहन और सीआरपीएफ की कोबरा बटालियनें लगाई जाएंगी.

मैतेई ट्राँगलाओबी के हमले को जंग की तरह पेश कर रहे हैं. वे चाहते हैं कि 25 कुकी-जो मिलिशिया के साथ हुए युद्धविराम को खत्म किया जाए और म्यामांर से आए 'अवैध चिन-कुकी' को निशाना बनाते हुए असम की तर्ज पर एनआरसी हो. कुकी भी 24 अप्रैल को अपने गांवों पर हुए हमले को 'युद्ध की साफ घोषणा' करार दे रहे हैं. कोई भी पक्ष वर्दी पर भरोसा नहीं करता. इसके लिए रणनीतिक टालमटोल से कुछ ज्यादा की दरकार होगी. 

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