
दिसंबर 1995 में बिहार के तत्कालीन वित्त आयुक्त वी.एस. दुबे ने विभागीय खातों की समीक्षा के दौरान भारी विसंगतियां पाई थीं. 27 जनवरी, 1996 को पश्चिमी सिंहभूम जिले के चाईबासा में पशुपालन विभाग के कार्यालयों पर एक साथ छापेमारी की गई, जिसके बाद हुआ चारा घोटाले का पर्दाफाश इतिहास में दर्ज हो गया.
ठीक 30 साल बाद, अप्रैल के पहले सप्ताह में झारखंड के कोषागारों से ऐसा ही इतिहास दोहराया जाता दिखा. इस बार वेतन मद में घोटाला पकड़ा गया है. हजारीबाग और बोकारो जिले की ट्रेजरी के निरीक्षण के बाद प्रधान महालेखाकार इंदु अग्रवाल की ओर से फर्जी निकासी की गोपनीय रिपोर्ट वित्त सचिव प्रशांत कुमार को भेजी गई. उसी के बाद यह मामला सामने आया.
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने 15 अप्रैल को ऐलान किया कि राज्य की सभी 33 ट्रेजरियों के 26 साल के ट्रांजैक्शन की जांच की जाएगी. तभी से राज्य भर के सरकारी कर्मियों और अधिकारियों में हड़कंप मचा हुआ है. फिलहाल छह लोगों की गिरफ्तारी हुई है लेकिन आने वाले दिनों में इस संख्या में खासा इजाफा होने का अनुमान है. इस बीच संदिग्ध विभागों (पुलिस और पशुपालन) और जिलों के हजारों कर्मचारियों का वेतन फिलहाल रोक दिया गया है.
जांच में पता चला है कि केवल दो नहीं, बल्कि सात जिलों में वेतन के नाम पर 150 करोड़ रुपए से ज्यादा की अवैध निकासी की गई है. अनुमान है कि आंकड़ों और जिलों की संख्या में जांच-दर-जांच बढ़ोतरी होगी. इस घोटाले को अंजाम देने वाले कोई बाहरी नहीं, बल्कि वही अधिकारी और कर्मचारी हैं, जिन पर पैसों की निगरानी करने की जिम्मेदारी थी. रिपोर्ट में कहा गया है कि ट्रेजरी इंस्पेक्शन और डेटा एनालिसिस के दौरान पेरोल प्रोसेसिंग, पे एंटाइटलमेंट और वैलिडेशन में बड़े पैमाने पर कंट्रोल गैप पाए गए हैं.
ऐसे हुई छेड़छाड़
दरअसल, झारखंड सरकार ने जे-कुबेर पोर्टल नाम की एक वेब-आधारित एकीकृत वित्तीय प्रबंधन प्रणाली को विकसित किया है. इसका काम वित्त विभाग के कोष कार्यों, फंड प्रबंधन और सरकारी लेन-देन को डिजिटल और पारदर्शी बनाना है. यह मुख्य रूप से डीडीओ (डिपार्टमेंटल ड्रॉइंग ऐंड डिसबर्सिंग ऑफिसर) को बिल एंट्री, फंड आवंटन और ट्रेजरी संबंधी ऑनलाइन काम करने की सुविधा देता है.
इसी पोर्टल की मदद से घोटाले को अंजाम दिया गया. मूल रूप से गया निवासी शंभू कुमार बाल सिपाही के रूप में साल 2011 में झारखंड पुलिस में बहाल हुआ. शंभू अकाउंट्स विभाग में बिल टाइप करने, उसे जे-कुबेर पोर्टल पर फीड करने जैसे काम करता था. यहां उसने कथित तौर पर रिटायर हो चुके कर्मियों की जन्मतिथि में बदलाव कर उन्हें सेवारत दिखाया.
मसलन, जुलाई 2016 में रिटायर हो चुके उपेंद्र सिंह को कागजों पर दोबारा नौकरी में दिखाया गया. यहां तक कि उनकी सैलरी को भी चार गुना दिखाकर निकासी हुई. साथ ही, ट्रांसफर हो चुके कर्मियों को पुराने जिले में दिखाकर, उनके बैंक अकाउंट की जगह निजी और परिजनों के बैंक अकाउंट जोड़ लिए. 12-13 ऐसे लोग सैलरी ले रहे थे, जो नौकरी करते ही नहीं थे. कई बार तो एक ही आदमी के नाम पर एक ही महीने में चार बार वेतन निकासी की गई.
कथित तौर पर, ऐसा साल 2013 से लगातार होता आ रहा था. शुरुआत में शंभू अकेले यह काम कर रहा था. बाद में इसकी जानकारी रजनीश और धीरेंद्र सिंह नाम के कर्मियों को भी हुई, जिसके बाद उन्हें भी इस घोटाले में राजदार बना लिया गया. बीते 13 साल में इन लोगों ने पुलिस ट्रेनिंग से खुद को अलग रखा, ताकि ट्रेनिंग प्राप्त हो जाने पर न ही उन्हें प्रमोशन मिले और न ही ट्रांसफर की नौबत आए.

पुलिस की पूछताछ में शंभू ने स्वीकार किया है कि 2014 से अब तक उसने 30 करोड़ रुपए से ज्यादा की अवैध निकासी की है. बताया जा रहा है कि बोकारो ट्रेजरी से एक रिटायर्ड पुलिसकर्मी के नाम पर 4.29 करोड़ रुपए से ज्यादा की अवैध निकासी हुई. नवंबर 2023 से मार्च 2026 के बीच पिछले 25 महीनों में कुल 63 बार फर्जी तरीके से वेतन निकाला गया. एक अन्य आरोपी कौशल पांडेय और उसकी पत्नी के बैंक खातों में बड़ी रकम जमा हुई है. कौशल की पत्नी अनु पांडेय के एसबीआइ खाते में 58 लाख रुपए और कौशल के खाते में 33 लाख रुपए मिले हैं. संबंधित सभी खातों को तत्काल फ्रीज कर दिया गया है.
ट्रेजरी कोड के अनुसार वेतन भुगतान से पहले सात स्तरों पर जांच का प्रावधान है. बिल क्लर्क, अकाउंटेंट, डीडीओ, ट्रेजरी जांच, रजिस्टर एंट्री, ट्रेजरी अकाउंटेंट और ट्रेजरी अफसर. हर स्तर पर यह पक्का करना होता है कि कर्मचारी वास्तविक है, बिल सही है और बैंक डिटेल प्रमाणित है. इसके बावजूद इस पूरे मामले में किसी स्तर पर गड़बड़ी नहीं पकड़ी गई. अब तक कुल छह लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है.
मामला बाहर आने के बाद वित्त सचिव प्रशांत कुमार ने आदेश जारी किया कि तीन साल से एक ही जगह जमे अधिकारियों-कर्मचारियों का तत्काल तबादला किया जाए. यह तबादला वहां नहीं होना चाहिए, जहां यह पहले नियुक्त रह चुके हैं. इसके अलावा, उन्होंने कहा कि जिन सात जिलों (बोकारो, हजारीबाग, पलामू, जमशेदपुर, देवघर, रामगढ़ और रांची) की ट्रेजरी से वेतन के नाम पर निकासी हुई है, उनके ट्रेजरी, सब ट्रेजरी, पेंशन और लेखा कार्यालय और स्टेट ऑडिट में लंबे समय से तैनात कर्मचारियों की भूमिका संदिग्ध रूप से सामने आ रही है. इसलिए इनमें कार्यरत संदिग्ध कर्मचारियों को फौरन हटाया जाए. सरकार का मानना है कि तीन साल से जमे कर्मियों को हटाने से पुराने सिंडिकेट की कड़ियां बिखरेंगी.

फिलहाल शक की सुई डीडीओ और ट्रेजरी अफसर के अलावा स्टेट ऑडिट के सीनियर ऑडिटर, ऑडिट अफसर, लेखा निदेशालय के लेखा सहायक, वरीय लेखा सहायक और ट्रेजरी के लिपिक तथा कंप्यूटर ऑपरेटर पर है. सरकार ने मामले की विस्तृत जांच के लिए उत्पाद विभाग के प्रधान सचिव अमिताभ कौशल की अध्यक्षता में आठ सदस्यीय उच्चस्तरीय समिति बनाई है. इस समिति ने जांच शुरू कर दी है.
इधर मुख्य आरोपी शंभू के बारे में हर दिन चौंकाने वाली खबरें सामने आ रही हैं. उसके पास फॉर्च्यूनर, एक्सयूवी 500 और थार गाड़ियां मिली हैं. हजारीबाग के अपने घर पर वह अक्सर लोगों को महंगी शराब पिलाता था. बेटी के जन्मदिन की पार्टी में लाखों रुपए खर्च करता था. शहर के ब्रांडेड दुकानदारों के पास जब भी कोई नया और महंगा प्रोडक्ट आता था, वे तत्काल शंभू को इसकी जानकारी देते थे.
गया और हजारीबाग में उसके नाम जमीन और करोड़ों के मकान मिले हैं. वह लोगों को एसपी का रीडर बताता था, साथ ही पैसे वालों को कोयले में निवेश करने को कहता था, इस वादे के साथ कि पुलिस के स्तर पर जिस भी अनुमति की जरूरत होगी, वह दिलवा देगा. ऐसे लोगों से भी वह पैसे ऐंठ लेता था. दूसरे आरोपियों ने भी जमीन और मकान में निवेश कर रखा है.
पूरे मामले पर राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने 15 अप्रैल को कहा, ''जांच के दौरान पता चला है कि ट्रेजरी में गलत तरीके से निकासी हो रही है. चीजों को चिह्नित भी कर लिया गया है. सरकार ने इस बात को बहुत गंभीरता से लिया है. जहां-जहां से पैसे की निकासी होती है, उन सभी जगहों और विभागों की जांच चल रही है. कई और लोग पकड़े जाएंगे.''
वहीं वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने भी मुस्तैदी दिखाते हुए जांच के आदेश दिए हैं. उन्होंने कहा, ''मैंने वित्त सचिव को निर्देश दिया है कि मुख्यालय स्तर से वरीय अधिकारियों की टीम बोकारो भेजी जाए. यह टीम जांच करेगी कि किन-किन लोगों की संलिप्तता रही और किन लापरवाहियों या चूक के कारण निकासी हुई.
जिलाधिकारियों को साल में एक बार ट्रेजरी का निरीक्षण करना होता है. ट्रेजरी निदेशक को हर दो साल में समीक्षा करनी होती है.'' उन्होंने यह भी कहा, ''मैंने निर्देश दिया है कि अधिकारियों ने अपनी तय जिम्मेदारियों का निर्वहन किया या नहीं, इसकी जांच की जाए. रिपोर्ट आने के बाद दोषी अफसरों पर कार्रवाई करेंगे.'' फिलहाल, जांच पूरी होने तक अप्रैल माह के बिलों के भुगतान पर रोक लगा दी गई है.
तेरह वर्षों तक चले इस फ्रॉड ने सरकारी खजाने से रक्त की तरह पैसे बहाए लेकिन किसी को इसकी भनक तक न लगी. यह सुनकर तो ऐसा लगता है कि संबंधित विभाग एक घोटाले को खुद ही न्योता देकर बैठे थे.

