पटना के एक नशामुक्ति केंद्र में पिछले दिनों 27-28 साल के नंदू (बदला हुआ नाम) मिले. चेहरे पर सर्जरी के लंबे निशान थे. कहने लगे, ''एक्सीडेंट हो गया था.’’ वे स्मैक के आदी हैं और नशे की हालत में बाइक चला रहे थे. यह बताते हुए ठंड के माहौल में भी उनके माथे पर पसीने की बूंदें दिख रही थीं.
वे जब अपनी बात कहते हैं तो वाक्य टूटने लगते हैं. पूरा वाक्य कहने की क्षमता वे खो चुके हैं. नंदू अपनी लत के बारे में बताते हैं, ''मैं अब इसे छोड़ना चाहता हूं. मेरे तीन दोस्तों की मौत बारी-बारी से मेरे सामने हो गई. सबकी मौत नशे के ओवरडोज की वजह से हुई. मैं खुद हेपेटाइटिस बी और सी का मरीज हो गया हूं. इसी वजह से यहां आया हूं. मगर अभी तक भरोसा नहीं हुआ है कि मेरी नशे की आदत छूट पाएगी.’’
नंदू अच्छे-खासे कारोबारी पिता के पुत्र हैं. 2016 में जब शराबबंदी हुई थी, तब वे दोस्तों के साथ बीयर पार्टी किया करते थे, कभी-कभार शराब भी पी लेते थे. नंदू के ही शब्दों में, ''शराबबंदी हुई तो नए नशे की तलाश में हम लोगों ने गांजा ट्राइ किया. फिर गांजे की लत लग गई.
इसी दौरान एक दोस्त हमें एक दिन स्मैक के अड्डे पर लेकर गया. वहां ऐसा किक मिला कि गांजा तो छूट गया लेकिन अब दिन में दो बार स्मैक न मिले तो हम लोग तड़पने लगते हैं. स्मैक की पुड़िया सूंघने से शुरू होकर अब हम लोग इसका इंजेक्शन लेने तक पहुंच गए हैं. नीतीश जी ने शराबबंदी यह सोचकर की होगी कि हमारे जैसे नौजवान नशे की आदत से मुक्त हो जाएंगे. लेकिन देखिए, इस शराबबंदी के बाद हमारा क्या हो गया?’’
वैसे तो बिहार में शराबबंदी के दस साल बाद भी हर जगह आसानी से शराब उपलब्ध होने की खबरें आती रहती हैं. बीते दिनों विधान परिषद सदस्य सुनील कुमार सिंह ने तो दावा कर दिया कि वे विधान मंडल के परिसर में भी जब चाहें शराब मंगवा सकते हैं. मगर इस नाकाम होती शराबबंदी के बीच नंदू बिहार के उन युवाओं का प्रतिनिधि चेहरा हैं, जो गांजा, स्मैक, डोडा, चरस, कोडीनयुक्त कफ सिरप और दूसरे ड्रग्स की चपेट में आ गए हैं.
इनकी संख्या का कोई अनुमान नहीं है मगर ये बिहार की हर गली में, हर गांव के बाग-बगीचों, नहर-तालाब के पास और हर चौराहे पर मिलने लगे हैं. घरवाले इनके नशे की लत से परेशान हैं, तो दूसरे लोग इनकी उधार मांगने या चोरी-छिनैती करने की आदत से. बिहार में इसे सूखा नशा बोलते हैं. कहा जाने लगा है कि उड़ता पंजाब की तरह अब यह प्रदेश भी 'उड़ता बिहार’ हो गया है.
विधानसभा में चर्चा
इस मुद्दे पर बिहार में बीते बजट सत्र में कई बार चर्चा हुई. पक्ष-विपक्ष दोनों तरफ के विधायक सहमत थे कि बिहार अब पूरी तरह इस सूखे नशे की चपेट में आ गया है. 11 फरवरी को विधान परिषद में रवींद्र प्रसाद सिंह ने ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के दौरान यह मुद्दा उठाया. इस प्रस्ताव पर कई सदस्यों ने अपनी राय रखी.
एक सदस्य ने पूछा कि जिस बड़े पैमाने पर राज्य के युवा इस नशे के आदी हो रहे हैं, क्या राज्य में उनके इलाज के लिए समुचित संख्या में नशामुक्ति केंद्र हैं? इस पर भाकपा-माले की सदस्य शशि यादव ने सदन को एक दिल दहलाने वाली घटना सुनाई कि कैसे राजधानी पटना के एक नशामुक्ति केंद्र ने बिहार सरकार में सचिव स्तर के एक अधिकारी के बेटे की जान ले ली. नशे के आदी उस युवक के साथ वहां काफी मार-पीट की जाती थी.
शशि यादव का कहना था कि नशामुक्ति केंद्र तो जरूरी हैं ही, उसके साथ उनकी गुणवत्ता और निगरानी भी जरूरी है. बाद में इंडिया टुडे से बातचीत में उन्होंने कहा कि उनका एक रिश्तेदार नशे का ऐसा आदी हो गया था कि डोज न मिलने पर उसने सिरिंज से कैरोसिन तेल लेने की कोशिश की. इस कोशिश में उसका हाथ काटने की नौबत आ गई थी. उनका दावा है कि ''नेपाल से सटा उत्तर बिहार का पूरा इलाका इस सूखे नशे की गंभीर चपेट में है. इसे रोकने के लिए अगर अभी कुछ नहीं किया गया तो बिहार की नई पीढ़ी को बचाना मुश्किल होगा.’’
इस बात की तस्दीक सुपौल के रहने वाले कृष्णा मिश्र भी करते हैं. वे बताते हैं, ''पहले हमारे गांवों में कुछ नौजवान शराब पीते थे और एकाध अधेड़ भांग और गांजे के शौकीन होते थे. नशे के नाम पर मुख्यत: ताड़ी पी लेते थे. मगर अब तो लगभग हर परिवार में सूखा नशा करने वाले नौजवान मिल जाते हैं. यह भीषण स्थिति है. अगर अभी कुछ नहीं किया गया तो संभालना मुश्किल होगा.’’
कृष्णा के छोटे भाई इस नशे की चपेट में आ गए थे, उन्होंने बहुत मुश्किल से उसे बचाया है. वे कहते हैं, ''मुझे अपने भाई के बारे में उस वक्त पता चला, जब मेरे दोस्तों ने बताया कि वह उनसे उधार लेने लगा है. फिर उसने एक रोज मुझसे रेसिंग बाइक दिलाने की डिमांड की. तब मेरा दिमाग खटका. ऐसी बाइक तो हमारे इलाके में सिर्फ मोबाइल और चेन की झपटमारी करने वाले करते हैं. नशे के चन्न्कर में भाई की नौकरी छूट गई थी. हम लोग उम्मीद छोड़ चुके थे.’’
सूखा नशा-बढ़ता अपराध
प्रदेश में हाल के दिनों में घटी तीन जघन्य अपराध की घटनाओं का संबंध सूखे नशे से बताया जाता है. इनमें फारबिसगंज में बीच सड़क पर एक व्यक्ति का गला काटने वाला सत्तू विक्रेता हो, पटना के मसौढ़ी में अपनी तीन वर्षीया भतीजी को बेचने वाला हो या जहानाबाद के एक हॉस्टल में एक बच्चे से रेप करने वाला सिक्योरिटी गार्ड. ये तीनों आरोपी सूखा नशा करने के आदी थे.
करीब 35 साल से पटना में नशा मुक्ति केंद्र चला रहीं राखी सिंह बताती हैं कि उनकी एक दोस्त का बेटा तीन बार उनके सेंटर में एडमिट हुआ. सेंटर में रहता तो ठीक रहता, घर लौटते ही फिर से शुरू हो जाता. वह दरअसल नशे के लिए खून बेचने लगा था. उसका हीमोग्लोबिन कम हो जाता और उसे बार-बार खून चढ़ाना पड़ता. उस लड़के ने राखी को बताया था कि एक रोज उसके एक दोस्त ने उसके कहने पर एक ही दिन में तीन बार खून बेचा. इस चक्कर में उसकी मौत हो गई.
राखी कहती हैं, ''जब हमने शुरू किया था, तब बिहार में बहुत कम नशा मुक्ति केंद्र हुआ करते थे. 2016 तक बमुश्किल 13-14 सेंटर ही हुआ करते थे. अब तो 20-25 सेंटर सिर्फ पटना में हैं.’’ बिहार में समाज कल्याण विभाग 39 नशा मुक्ति केंद्रों का संचालन करता है. इसके अलावा हर सदर अस्पताल में नशा मुक्ति केंद्र के बेड हैं. हाल ही कुछ जेलों में भी नशा मुक्ति केंद्र खोले गए हैं. वैसे निजी और सरकारी मिलाकर राज्य में 200 के करीब नशा मुक्ति केंद्रों के संचालन का अनुमान है.
राखी सूखे नशे की लत का एक पैटर्न बताती हैं: ''शराबबंदी के बाद एक-दो साल के लिए हमारे पास मरीज आने काफी कम हो गए, मगर उसके बाद हमारे पास गांजे के पेशेंट आने लगे, फिर स्मैक वालों की भीड़ बढऩे लगी. हमें लगा कि शराबबंदी हुई तो युवा लोग पहले गांजा की तरफ शिफ्ट हुए, फिर उन्हें स्मैक की लत लगी. अब कोरेक्स, गांजा, इंजेक्शन, स्मैक के पेशेंट आते हैं.’’
नशीले पदार्थों की जब्ती
इस पैटर्न की पुष्टि बिहार में नशीले पदार्थों की जब्ती के आंकड़ों से भी होती है. 2015 में बिहार में सिर्फ 14.37 किलो गांजा, 1.12 किलो हेरोइन और 1.97 किलो अफीम जब्त हुआ था. लेकिन 2025 तक यह आंकड़ा कई हजार गुना बढ़ गया है. इस साल बिहार में लगभग 28,000 किलो गांजा, 2,400 किलो अफीम और पॉपी स्ट्रॉ, 3.25 लाख कोडीनयुक्त कफ सिरप की बोतलें और 3.48 लाख नशीले टैबलेट की बरामदगी हुई है. (आंकड़ों और पैटर्न के लिए देखें बॉक्स) यह रिपोर्ट लिखे जाने के दौरान ही 20 अप्रैल को राजधानी पटना के एक गोदाम से सवा करोड़ के नशीले इंजेक्शन और कफ सिरप बरामद हुए थे.
इन आंकड़ों से साफ है कि 2016 के बाद बिहार में गांजा-हशीश, पॉपी स्ट्रॉ, कोकीन, कोडीनयुक्त कफ सिरप और नशे के टैबलेट की बिक्री में अभूतपूर्व तेजी आई है. बरामदगी के आंकड़े महज सांकेतिक हैं, क्योंकि इससे कई गुना नशीला पदार्थ बिहार में खप रहा है. जानकार इसे शराबबंदी का असर मानते हैं. लेखक-मनोचिकित्सक एवं वर्ल्ड साइक्याट्रिक एसोसिएशन के बोर्ड मेंबर डॉ. विनय कुमार कहते हैं, ''यह वैश्विक समझ है कि दुनिया में कुछ संख्या में लोग नशे के आदी होते ही हैं.
इसे खत्म नहीं किया जा सकता. आनंद की चाह और जोखिम लेने की प्रवृत्ति किशोरों और युवाओं को नशे की तरफ आकर्षित करती है. ऐसे में अगर एक नशे पर रोक लगाया जाए तो वे दूसरे नशे की तरफ भागते हैं. मेरे पास आने वाले मरीजों की बातचीत से समझ आया कि शराब पर रोक लगने के बाद कई युवा गांजा और दूसरे खतरनाक नशे की तरफ शिफ्ट हुए हैं.’’
एडिक्शन काउंसलर प्रीतम आनंद सीमांचल के इलाके में सक्रिय हैं.
उनका भी आकलन है कि ''शराब के मुकाबले सूखे नशे का खतरा कई गुना ज्यादा है. शराब का असर शरीर, समाज और हमारी आर्थिक स्थिति पर धीरे-धीरे होता है. ड्रग्स एक झटके में तीनों को बर्बाद करना शुरू कर देता है. ज्यादातर ड्रग एडिक्ट का रोज का खर्चा डेढ़ से दो हजार रुपए का होता है, इतने पैसे उसके पास होते नहीं. लिहाजा उसके पास दो रास्ते होते हैं: पहला चोरी-छिनैती जैसे अपराध, दूसरा ड्रग पेडलर बन जाना और ड्रग माफिया के कारोबार में उसकी मदद करना ताकि उसे रोज का डोज फ्री में मिलता रहे.’’
लेकिन राज्य में ड्रग्स का प्रकोप शराबबंदी के बाद या शराबबंदी के कारण हुआ है, इस बात को सरकारी महकमा स्वीकार नहीं करता. स्टेट नारकोटिक्स ब्यूरो के एक सीनियर अफसर कहते हैं, ''अगर ऐसा है तो दूसरे राज्यों में जहां शराबबंदी नहीं है, वहां क्यों ड्रग्स का प्रकोप है? हमारे हिसाब से तो कोविड के बाद बड़ी संख्या में युवाओं के बिहार लौटने की वजह से नशे की प्रवृत्ति बढ़ी है.’’ उनकी दलील में दम है क्योंकि नशेड़ियों की संख्या बढ़ने के बारे में अभी तक कोई पुष्ट अध्ययन नहीं है.
सरकार की कार्रवाई
भले ही अब तक कोई पुष्ट अध्ययन न हो मगर शहर-गांव में नशे के आदी युवाओं को देखते हुए यह धारणा मजबूत हो रही है कि राज्य में सूखे नशे की चपेट में काफी लोग आ गए हैं. सरकार इससे निबटने के प्रति खुद को सक्रिय बताती है. जैसा कि पूर्व मंत्री अशोक कुमार चौधरी ने विधान परिषद में एक अधूरे आंकड़े के साथ साबित करने की कोशिश की थी.
उनके मुताबिक, बिहार में 2016 से 2025 के बीच सिर्फ 15,800 किलो गांजा, 240 किलो अफीम, 3.5 किलो चरस और 40,000 लीटर कफ सिरप ही बरामद हुआ है. इसके बरअक्स खुद तत्कालीन गृह मंत्री, और अब राज्य के मुख्यमंत्री, सम्राट चौधरी ने पांच दिन बाद विधानसभा में जानकारी दी कि सिर्फ 2025 में लगभग 28,000 किलो गांजा और कफ सिरप की 3.25 लाख बोतलें जब्त की गईं.
सम्राट का कहना था कि ''सरकार ने सूखे नशे के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की है. चाहे ब्राउन शुगर हो, स्मैक हो, हेरोइन हो, कोकीन या अफीम हमने इन्हें रोकने के लिए कड़े कदम उठाए हैं. 2025 में सरकार ने 2,161 मामले दर्ज किए और 3,520 लोगों को गिरफ्तार किया. हमने इसके लिए स्टेट लेवल की एक यूनिट भी खड़ी की है. सीमावर्ती इलाकों में भी हमने डीआइजी स्तर के अधिकारी की तैनाती की है, ताकि इसे रोका जा सके. जहां से भी हमें ड्रग्स से संबंधित सूचना मिलेगी, कार्रवाई की जाएगी.’’
यह सच है कि बिहार में सितंबर, 2025 में स्टेट नारकोटिक्स ब्यूरो का गठन किया गया मगर उस संस्था ने अभी ठीक से काम करना शुरू नहीं किया है. अभी भी राज्य में नशीले पदार्थों की तस्करी रोकने का जिम्मा केंद्र सरकार के नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो की बिहार इकाई के पास ही है.
बजट सत्र के दौरान जब सूखे नशे पर लगातार सवाल उठे तो 23 फरवरी को राज्य के मुख्य सचिव प्रत्यय अमृत ने नारकोटिक्स कोऑर्डिनेशन कमेटी की बैठक बुलाई और निर्देश दिए कि राज्य स्तर पर ऐसी बैठकें हर तीन महीने पर बुलाई जाए और जिला स्तर पर हर महीने. हैरत की बात है कि इस कमेटी की पिछली बैठक एक जुलाई, 2024 में हुई थी. अब तक सरकार इसे सालाना भी आयोजित नहीं कर पाई थी.
अब देखना यह है कि सरकार अपने इस दृढ़ निश्चय पर कितना कायम रहती है. डॉ. विनय कहते हैं, ''सरकार को ड्रग पेडलर्स पर काबू करने के उपाय सोचने ही होंगे क्योंकि ड्रग्स पर नियंत्रण के दो ही तरीके हैं. इसकी आवक रोकें और लोगों को इससे बचने के लिए जागरूक करें. न तो सिर्फ जागरूकता से ड्रग्स रुकेगा, और न ही सिर्फ इसकी आवक रोकने की कोशिश से. दोनों दिशा में गंभीर प्रयास करने होंगे.’’
काउंसलर आनंद कहते हैं, ''अगर बिहार में ड्रग एडिक्शन को खत्म या कम करना है तो दो स्तर पर काम करना होगा. पहला ड्रग सप्लाइ चेन को तोड़ना, जो नारकोटिक्स ब्यूरो और पुलिस का काम है. दूसरा, जागरूकता और नशा मुक्ति. यह काम हम लोग कर सकते हैं. मगर दिक्कत है कि यह काम ठीक से हो नहीं रहा.
अभी नशा मुक्ति के लिए ज्यादातर एडिक्ट को निजी नशा मुक्ति केंद्रों में जाना पड़ता है, जो काफी महंगे हैं. हमें पंजाब और पूर्वोत्तर से इस मामले में सीखना चाहिए. वहां प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में भी नशा मुक्ति की दवाएं फ्री में मिलती हैं. हमें भी एक लेवल आगे बढ़कर कुछ करना होगा.’’
बहरहाल, भले ही राज्य में सूखे नशे के शिकार युवाओं की संख्या बढ़ने की धारणा मजबूत है लेकिन इस समस्या को पुष्ट करने के लिए अभी तक कोई अध्ययन नहीं किया गया है. और समाधान के लिए पहली शर्त यह है कि सरकार इसे समस्या माने.

