- रचना गुप्ता
हिमाचल में दलबदल के दबाव में चलती रही कांग्रेस सरकार ने अपनी पार्टी से धोखा करने वाले नेताओं को निष्कासन के अलावा आर्थिक नुक्सान का भी प्रावधान किया है. अब जीत के बाद किसी विधायक ने दल बदला तो निष्कासन के साथ ही पेंशन भी बंद हो जाएगी. इस बजट सत्र में कांग्रेस सरकार ने पेंशन भत्ता विधेयक में संशोधन किया.
यह बिल 31 मार्च, 2026 को सदन में आया था. विधानसभा (सदस्यों के भत्ते और पेंशन) संशोधन विधेयक, 2026 के पारित होने के साथ ही राज्य ने दलबदल के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया. इस पूरे घटनाक्रम की जड़ें 2024 के राज्यसभा चुनाव में हैं. उस चुनाव में कांग्रेस के छह विधायकों ने पार्टी लाइन से हटकर मतदान किया.
परिणामस्वरूप कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी को हार का सामना करना पड़ा और भाजपा के हर्ष महाजन विजयी रहे. इस चुनावी घटना ने हिमाचल की राजनैतिक स्थिरता को झकझोर दिया और सवाल उठा कि क्या वर्तमान दलबदल विरोधी कानून वास्तव में पर्याप्त है?
राज्यसभा चुनाव के दौरान हिमाचल प्रदेश की राजनीति में जो उथल-पुथल हुई, उसका केंद्र कांग्रेस के छह विधायक— सुजानपुर से राजेंद्र राणा, धर्मशाला से सुधीर शर्मा, बड़सर से इंद्रदत्त लखनपाल, लाहौल-स्पीति से रवि ठाकुर, गगरेट से चैतन्य शर्मा और कुटलैहड़ से देवेंद्र कुमार भुट्टो थे. ये सभी विधायक राज्य की 14वीं विधानसभा के सदस्य थे और इन्होंने पार्टी व्हिप के बावजूद क्रॉस वोटिंग या अनुपस्थिति के माध्यम से अपनी सरकार को असहज स्थिति में डाल दिया.
इसके बाद दसवीं अनुसूची के तहत इन सभी को अयोग्य घोषित करके पार्टी से भी निष्कासित कर दिया गया. इसी कारण ये छह विधायक अपने-अपने क्षेत्रों में दोबारा भाजपा से चुनाव लड़े. उपचुनाव में राजनैतिक तस्वीर और भी दिलचस्प रही, जहां धर्मशाला से सुधीर शर्मा और बड़सर से इंद्र दत्त लखनपाल भाजपा के टिकट पर जीतकर वापस विधानसभा पहुंचे, बाकी चार सीटों पर कांग्रेस दोबारा जीत गई.
हालांकि, 10 अप्रैल, 2026 को हिमाचल प्रदेश हाइकोर्ट ने पूर्व विधायकों राजेंद्र राणा और रवि ठाकुर को बड़ी राहत देते हुए उनकी पेंशन और एरियर का भुगतान एक माह के भीतर करने का निर्देश दिया है. कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि विधानसभा में पारित कोई भी संशोधन विधेयक पिछली तारीख से लागू नहीं किया जा सकता, इसलिए पहले से मिल रही पेंशन को रोका नहीं जा सकता.
न्यायालय ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि यदि निर्धारित समय सीमा में भुगतान नहीं किया गया तो बकाया राशि पर 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा. यह फैसला उन पूर्व विधायकों के लिए महत्वपूर्ण रहा जिनकी पेंशन संशोधन के कारण प्रभावित हुई थी.
नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर इस पर कहते हैं, ''यह कांग्रेस सरकार का राजनैतिक प्रतिशोध का औजार है.'' दूसरी तरफ मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू विधेयक के पक्ष में कहते हैं, ''यह कदम जनादेश की रक्षा और लोकतांत्रिक मूल्यों को बचाने के लिए आवश्यक है.''
हालांकि, कई बार सरकारें केवल इसलिए गिरती रही हैं क्योंकि विधायकों की निष्ठा विचारधारा से अधिक अवसरों से जुड़ी रही है. ऐसे में अगर आर्थिक दंड के माध्यम से इस प्रवृत्ति को रोका जा सकता है तो इसे लोकतंत्र को मजबूत करने की दिशा में एक कदम भी कहा जा सकता है. हिमाचल का यह प्रयोग एक बड़े राष्ट्रीय विमर्श की शुरुआत कर सकता है. अगर यह मॉडल सफल होता है, तो अन्य राज्य भी इसी दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं.

