राजस्थान की बहुप्रतीक्षित एचपीसीएल रिफाइनरी आखिरकार उद्घाटन की दहलीज पर है, लेकिन इस प्रोजेक्ट की कहानी बहुत ही उतार-चढ़ाव से भरी है. 2005 में राजस्थान में रिफाइनरी लगाए जाने की घोषणा हुई, और जिस परियोजना को तीन साल में महज 12 हजार करोड़ रुपए में पूरा करने का सपना दिखाया गया था, वह आज लगभग 80 हजार करोड़ रु. तक पहुंच चुकी है और तय समय से करीब 18 साल पीछे चल रही है.
इस दौरान सरकारें बदलीं, समझौते बदले, डेडलाइन बदली मगर हर बदलाव के साथ रिफाइनरी की कीमत और इंतजार दोनों बढ़ते गए. आखिरकार अब 21 अप्रैल, 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसके उद्घाटन के लिए आ रहे हैं. हर सरकार ने अपनी सियासी सहूलत के आधार पर इस प्रोजेक्ट का दोहन किया.
एचपीसीएल राजस्थान रिफाइनरी की डेडलाइन भी अपने आप में एक कहानी बन चुकी है: 2008, 2017, 2022, 2024, 2025 और अब 2026. इस समयावधि में प्रदेश में पांच सरकारें बदलीं और लगभग हर सरकार ने नई तारीख दी.
2005 में वसुंधरा राजे सरकार ने इसका ऐलान किया और 2008 तक इसे पूरा करने का लक्ष्य रखा मगर तीन साल बाद भी तय नहीं हो पाया कि रिफाइनरी आखिर लगेगी कहां? इसी बीच सत्ता बदल गई.
2008 में अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार आई तो शुरुआती एक दो साल तो आरोप-प्रत्यारोप में गुजर गए. इस दौरान काम की रफ्तार वहीं ठहरी रही. गहलोत ने भी अपनी सरकार के अंतिम साल में चुनावी आचार संहित लागू होने से ठीक पहले 22 सितंबर, 2013 को यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी के हाथों रिफाइनरी की आधारशिला रखवाई, दिसंबर 2017 नई डेडलाइलन घोषित कर दी.
2013 में सरकार और एचपीसीएल के बीच जो समझौता हुआ उसके तहत राज्य सरकार को रिफाइनरी के लिए एचपीसीएल को 15 साल तक हर साल ब्याज मुक्त ऋण के रूप में 3,736 करोड़ रुपए देने थे. यह राशि 56,540 करोड़ रुपए थी और रिफाइनरी में राजस्थान की हिस्सेदारी 26 फीसद रखी गई.
दिसंबर 2013 में सूबे में फिर सत्ता बदली और वसुंधराराजे के नेतृत्व वाली नई सरकार ने गहलोत के इसी समझौते पर सवाल उठाते हुए इस प्रोजेक्ट को करीब चार साल तक ठंडे बस्ते में डाले रखा. वसुंधरा राजे सरकार ने 2017 में एक नया समझौता किया. वसुंधरा राजे सरकार ने कार्यकाल के अंतिम साल यानी, जनवरी 2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों दूसरी बार रिफाइनरी का शिलान्यास करवाया. इस बार इस प्रोजेक्ट को पूरा करने की डेडलाइन दिसंबर 2022 रखी गई.
मगर इसी बीच 2018 में प्रदेश में फिर कांग्रेस की वापसी हुई और केंद्र-राज्य के टकराव ने इस परियोजना को और उलझा दिया. एक तरफ राज्य सरकार केंद्र पर काम अटकाने के आरोप लगाती रही तो दूसरी तरफ केंद्र सरकार लागत बढ़ने और देरी का ठीकरा राज्य पर फोड़ती रही. इस खींचतान के बीच रिफाइनरी का काम चला जरूर, मगर उस रफ्तार से नहीं, जिसकी उम्मीद की जा रही थी.
अशोक गहलोत सरकार ने इसकी डेडलाइन दिसंबर 2022 से बढ़ाकर मार्च 2024 कर दी मगर इसी बीच प्रदेश में एक बार फिर सरकार बदल गई और दिसंबर 2023 में भजनलाल शर्मा के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार बनी. भजनलाल सरकार भी इस प्रोजेक्ट की डेडलाइन चार बार बदल चुकी है.
अब जबकि 21 अप्रैल उद्घाटन की तारीख तय हो चुकी है, तब भी यह सवाल पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है कि यहां से उत्पादन पूरी क्षमता के साथ कब शुरू होगा? हालांकि, एचपीसीएल की ओर से यह तर्क दिया जा रहा है कि यहां से वाणिज्यिक उत्पादन जुलाई 2026 तक शुरू हो जाएगा.
पिछले 21 साल में तारीख के अलावा सबसे ज्यादा बदला इस प्रोजेक्ट का बजट. 2005 में शुरुआती अनुमान करीब 12 हजार करोड़ रुपए माना गया था जो 2013 तक बढ़ते-बढ़ते 37 हजार करोड़ रु. पहुंच गया. 2018 में यह 43 हजार करोड़ रु. हुआ और फरवरी 2023 में 73 हजार करोड़ रुपए. 8 अप्रैल, 2026 को केंद्र सरकार के आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति ने प्रोजेक्ट का बजट 79 हजार 459 करोड़ रु. तय कर दिया.
राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत कहते हैं, ''रिफाइनरी परियोजना को जो सेटबैक लगा उसकी जिम्मेदार भाजपा है. भाजपा ने 2014 से 2018 तक इस प्रोजेक्ट को लटकाए रखा. तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को मिसगाइड किया गया कि हमारी भागीदारी 26 फीसद ही क्यों है? जबकि उन्हें यह पता होना चाहिए कि रिफाइनरी में राज्यों की भागीदारी होती ही नहीं. घाटा तो काम बंद करने से हुआ.''
भाजपा प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ का कहना है, ''अशोक गहलोत कहते हैं 2014 से 2018 तक काम बंद रहा तो वे यह बताएं कि 2018 में जब उनकी सरकार बन गई थी तब उन्होंने काम क्यों नहीं किया. गहलोत ने सोनिया गांधी को बुलाकर उद्घाटन तो करा दिया मगर प्रोजेक्ट के लिए वित्तीय प्रावधान नहीं किया. हमारी सरकार ने प्रोजेक्ट का पूरा किया है.''
बदलेगी राजस्थान की तस्वीर?
देरी और लागत बढ़ने के बावजूद 90 लाख मीट्रिक टन सालाना (एमएमटीपीए) क्षमता वाली यह रिफाइनरी न सिर्फ प्रदेश की ऊर्जा जरूरतों को मजबूती देगी, बल्कि इसके साथ विकसित हो रहे पेट्रोकेमिकल हब से 50 हजार रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे. बोरावास और कलावा में नए औद्योगिक क्षेत्र विकसित किए गए हैं.
रेगिस्तान का बाड़मेर और बालोतरा जैसा इलाका, जो सीमित औद्योगिक गतिविधियों के लिए जाना जाता था, वह अब एक बड़े इंडस्ट्रियल हब के रूप में उभर चुका है. यह रिफाइनरी देश की सबसे आधुनिक बीएस-6 मानकों वाली रिफाइनरी होगी.
राजस्थान एचपीसीएल रिफाइनरी देश की 24वीं और सार्वजनिक क्षेत्र की 20वीं रिफाइनरी है. यह देश की ऐसी 9वीं रिफाइनरी होगी जिसमें तेल शोधन के साथ ही पेट्रोकेमिकल्स इकाइयां भी लगेंगी. गुजरात के जामनगर में निजी क्षेत्र की रिफाइनरी देश की सबसे ज्यादा क्षमता वाली रिफाइनरी है जिसकी तेल शोधन क्षमता 66 मिलियन मीट्रिक टन प्रति वर्ष (एमएमटीपीए) है.
इसके बाद गुजरात की वडिनार रिफाइनरी का नंबर आता है जिसकी क्षमता 20 एमएमटीपीए है. केरल की कोच्चि रिफाइनरी देश की तीसरी सबसे बड़ी (15.5 एमएमटीपीए) रिफाइनरी है. देश में 15 एमएमटीपीए वाली तीन रिफाइनरी पानीपत (हरियाणा), मंगलूरू (कर्नाटक) और पारादीप (ओडिशा) में स्थित हैं.
देश की सबसे पुरानी रिफाइनरी असम के डिगबोई में स्थित है जो 1901 में बनाई गई थी. भारत में सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की रिफाइनरी में सालाना 258.22 एमएमटीपीए तेल का शोधन होता है.
घट रहा है तेल का भंडार
बाड़मेर बेसिन में तेल के घटते उत्पादन को राजस्थान रिफाइनरी के लिए गंभीर खतरे के तौर पर देखा जा रहा है. 2004 में बाड़मेर बेसिन में केयर्न ने तेल की खोज की और 2005 में यहां रिफाइनरी की कवायद शुरू हुई. बाड़मेर के मंगला, ऐश्वर्या और भाग्यम फील्ड से तेल उत्पादन 2009 से 2013 के बीच शुरू हुआ.
2009 से 2013 तक यहां से हर रोज 1.75 लाख बैरल तेल का उत्पादन हुआ जो 2014 में बढ़कर 225 बैरल हो गया मगर अब यह वापस घटकर 80 बैरल प्रति दिन पर आ गया है. जैसलमेर के बागेवाला फील्ड से 1,205 बैरल प्रति दिन तेल का उत्पादन हो रहा है. केयर्न-वेदांता की ओर से यह जानकारी दी गई कि तेल उत्पादन बढ़ाने की लगातार कोशिश हो रही हैं.
कंपनी अब कुओं की सतह पर चिपके हुए अतिरिक्त तेल को निकालने की तकनीक पर भी काम कर रही है. केयर्न-वेदांता के चेयरमैन अनिल अग्रवाल का कहना है, ''जब हमारी धरती पर तेल भंडार मौजूद हैं तो उद्यमियों को इस क्षेत्र में काम करने की पूरी स्वतंत्रता देनी चाहिए.''
राजस्थान में सबसे ज्यादा तेल उत्पादन बाड़मेर से ही हो रहा है. अगर यहां मौजूद तेल के कुओं की बात करें तो कई रिपोर्ट में बताया गया कि यहां करीब 300 कुओं से तेल उत्पादन किया जा रहा है. राजस्थान के बाड़मेर-सांचोर, जैसलमेर, बीकानेर-नागौर बेसिन में करीब 2.2 अरब डॉलर का क्रूड ऑयल भंडार होने की अनुमान है.
राजस्थान सरकार को 2010-11 में तेल उत्पादन से 1,858 करोड़ रुपए का राजस्व मिलता था जो 2014-15 में अपने उच्चतम शिखर 5,000 करोड़ रुपए तक पहुंच गया था मगर अब राजस्व घट गया है. कोविड महामारी के कारण साल 2020-21 में तेल व गैस से राजस्व घटकर 1,905 करोड़ रुपए रह गया था जो उसके बाद 2022-23 में 4,889 करोड़ रुपए तक पहुंच गया.

