
- एम.सी. पांडेय
देहरादून के साल के जंगलों में इन दिनों होप्लो (साल-बोरर या होप्लोसेरेंबिक्स स्पाइनीकोर्निस) नाम के एक कीट ने कोहराम मचाया हुआ है. साल के पेड़ की मजबूती के बारे में कहा जाता है: साल सौ साल खड़ा, सौ साल पड़ा, यानी सौ साल तक खड़े और सौ साल तक पड़े रहने के बाद भी इसकी लकड़ी खराब नहीं होती. लेकिन साल बोरर ने इसे परास्त कर दिया है.
यह कीट साल के वृक्ष से निकलने वाले रेजिन या सैप को चूसने के लिए इसके भीतर घुस जाता है. इस तरह यह धीरे-धीरे पूरे जंगल की हरियाली को लील जाता है. अब इस खतरे के चलते साल के 19 हजार पेड़ों को काटने के लिए राज्य सरकार के वन महकमे ने केंद्र सरकार से अनुमति मांगी है. राज्य के वन मंत्री सुबोध उनियाल ने बताया कि विभाग को देहरादून के थानो, आशारोड़ी और झाझरा रेंज में साल के पेड़ों के खराब होने की सूचना मिली थी.
इसके बाद भारतीय वन अनुसंधान संस्थान (एफआरआइ) की टीम ने इसकी जांच की, जिसमें 19,170 पेड़ों के होप्लो से संक्रमित होने की पुष्टि हुई. उनियाल ने बताया कि इनमें से कुछ पेड़ तो अपनी ऊपरी डालियों तक सूख चुके हैं. मॉनसून के मौसम में बाकी बचे पेड़ों की सुरक्षा के लिए पेड़ों पर 'ट्री ट्रैप ऑपरेशन' चलाया जाएगा.
इस प्रक्रिया में 'साल' के कुछ स्वस्थ पेड़ों को काटकर चार-चार फुट लंबे लट्ठों में बदल दिया जाता है, जिन्हें फिर बारिश के पानी में रख दिया जाता है. इन साल के लट्ठों से निकलने वाली महक 'होप्लो' कीड़ों को अपनी ओर खींचती है. फिर इन कीड़ों को चिमटी की मदद से पकड़कर मिट्टी के तेल (केरोसिन) में डाल दिया जाता है, जिससे वे मर जाते हैं. यह एक बड़े पैमाने पर चलाया जाने वाला अभियान है, जिसमें अक्सर महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों की मदद ली जाती है.
भारतीय वन अनुसंधान संस्थान (एफआरआइ) के विशेषज्ञ अरुण प्रताप का कहना है कि होप्लो कीट का लार्वा, साल के पेड़ के तने के अंदर मौजूद 'जाइलम' ऊतकों को काटकर सुरंग बना देता है. इसके खोखला किए जाने से पेड़ सूखने लगता है. जाइलम वह ऊतक होता है, जो जड़ों द्वारा सोखे गए पानी और खनिज लवणों को पौधे के विभिन्न हिस्सों तक पहुंचाता है. इस संक्रमण के चलते कई पेड़ों की हालत इतनी खराब है कि वे ऊपर (कैनोपी) तक पूरी तरह सूख चुके हैं, जिन्हें काटना अब अनिवार्य हो गया है.
विशेषज्ञों का ये भी मानना है कि वन प्रभाग में इतनी बड़ी संख्या में पेड़ों का 'होप्लो' कीट से प्रभावित होना, पारिस्थितिक संतुलन के नजरिए से एक गंभीर चिंता का विषय है. प्रसिद्ध कीट विशेषज्ञ और तितली वैज्ञानिक पीटर स्मेटसेक के मुताबिक, यह कीट कठफोड़वा पक्षियों के लिए भोजन का एक प्राकृतिक स्रोत है और इस तरह यह साल के पेड़ों पर होने वाले हमलों को रोकने में मदद कर सकता है. लेकिन समस्या यह है कि जब एक बार होप्लो का लार्वा पेड़ों के तने को भेद उसमें प्रवेश कर जाए तो कठफोड़वा पक्षियों के लिए भी उसका भक्षण करना संभव नहीं हो पाता.
केवल एक उपाय बचता है: कीट द्वारा साल के तने के अंदर घुसने के लिए छेदे गए स्पॉट का पता लगाया जाए. उसके बाद इस छेद के भीतर रुई के फाहे में क्लोरीन लगाकर उसे बंद किया जाए तो कीट वृक्ष के भीतर मर सकता है. लेकिन यह प्रक्रिया उतनी कारगर नहीं हो सकती.
इससे पहले, 1990 के दशक की शुरुआत में भी वन प्रभाग के 'थानो रेंज' में होप्लो कीटों का ऐसा ही प्रकोप देखने को मिला था. मगर इसके तरह व्यापक प्रकोप की क्या वजह है, इसका पता अभी तक न लगाया जा सका है. हालांकि, विशेषज्ञ यह कयास लगा रहे हैं कि स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र में आए किसी बदलाव या जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से ऐसा हो सकता है. पिछले साल उत्तराखंड में असाधारण रूप से भारी बारिश हुई थी और विशेषज्ञों के अनुसार, अत्यधिक वर्षा को 'होप्लो' कीटों के प्रकोप के लिए जिम्मेदार कई कारकों में से एक माना जाता है.
वन मंत्री सुबोध उनियाल ने भी 'होप्लो' के प्रकोप के पीछे के कारणों की जांच करने और इसके संभावित समाधानों की पहचान करने के लिए एक व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता पर जोर दिया है. देहरादून वन प्रभाग के डीएफओ नीरज कुमार के अनुसार, होप्लो संक्रमण का पता तब लगता है जब यह कीट पेड़ के भीतर प्रवेश कर उसके जेलम का भक्षण करने लगता है, जिसके बाद वह अवशेष पदार्थ को बुरादे के रूप में बाहर निकालना शुरू कर देता है.

यह बुरादा ही पेड़ के संक्रमित होने की पुष्टि करता है. तीन से सात सेंटीमीटर लंबे इस कीट को साल 1897 में मध्य प्रदेश के बालाघाट के साल के जंगलों में रिकॉर्ड किया गया था. यह कीट लालिमा लिए हुए कुछ हद तक काले रंग का दिखता है. जून से जुलाई के बीच यह अंडे देता है जो तीन से सात दिन तक लार्वा बनाते हैं. इसका लार्वा जुलाई से अप्रैल के दौरान 294 दिन से 307 दिन तक रहता है. इसके बाद ये प्यूपा बन जाता है.
प्यूपा के रूप में 39 से लेकर 62 दिन तक रहने के बाद यह एडल्ट कीट के रूप में दस से चौदह दिन का जीवन जीकर मर जाता है. इसी दौरान एक कीट हजारों अंडे देकर अपनी तादाद को बढ़ाने का भी काम कर जाता है. इन अंडों से निकलने वाला लार्वा नरम हिस्से से साल वृक्ष में घुसकर उसे संक्रमित कर डालता है. नीरज कुमार बताते हैं कि जंगल से इस कीट को बाहर निकालने के लिए साल के वृक्ष को काटकर जंगल के बीच छोड़ा जाता है.
इसके रेजिन या सैप की खुशबू से आकर्षित हो ये कीट उसे खाने के लिए यह कटे हुए पेड़ की तरफ आकर्षित होता है. इसी दौरान इनको पकड़कर एक साथ नष्ट किया जाता है. कुमार के मुताबिक, जो 19 हजार साल के पेड़ इससे संक्रमित हैं, वे पूरे जंगल के बड़े इलाके में फैले हुए हैं इसलिए उन पेड़ों के गिराने की अनुमति से जंगल के नष्ट होने का खतरा फिलहाल नहीं है. लेकिन जिस तरह से इसका प्रकोप बढ़ा है, इस समस्या को हल्के में नहीं लिया जा सकता.
इसी के चलते वन विभाग ने संक्रमित वृक्षों को कटाने की अनुमति मांगी है. साथ ही बड़ा ऑपरेशन चलाने के लिए अपने विभागीय उच्चाधिकारियों के साथ बैठक भी की है. देहरादून वन प्रभाग के एसडीओ अभिषेक मैठाणी कहते हैं, ''साल वृक्ष की किसी टहनी पर संक्रमित होने का अगर कोई लक्षण दिख जाए तो उसको काटकर, उसे किसी राजपत्रित अधिकारी के सामने जलाकर नष्ट करना तय विभागीय प्रक्रिया है.'' वे यह भी बताते हैं कि मध्य प्रदेश के बालाघाट के जंगलों में भी इस कीट के बढ़ते प्रकोप की खबरें इंटरनेट में दिखाई दी हैं. अब इन पेड़ों को नष्ट कर देना ही जंगल को बचाने का इकलौता रास्ता दिखता है.
अब पढ़िए इंडिया टुडे हिंदी पर उत्तराखंड के वन मंत्री सुबोध उनियाल की बातचीत-'
• होप्लो कीट के प्रकोप को कितनी गंभीरता से ले रही सरकार?
सरकार इसे अत्यधिक गंभीरता से ले रही है. इसी कारण विभाग ने इसके संक्रमित वृक्षों के कटान की अनुमति के लिए केंद्र को प्रस्ताव भेजा है.
• इसका बचाव करने को क्या एक्शन लेने की तैयारी है?
कटान की अनुमति मिल जाने पर इसके लिए ट्री-ट्रैप मेथड पर काम किया जाएगा. इस विधि में मॉनसून की पहली बारिश के बाद, हवा से गिरे या कम उपयोगी साल के लट्ठों को 'चारा' बनाकर कीटों को आकर्षित किया जाता है और फिर उन्हें इकट्ठा करके नष्ट कर दिया जाता है, जिससे स्वस्थ पेड़ों का संक्रमण रुक सके. यह प्रभावी, गैर-विषाक्त और पर्यावरण के लिहाज से सुरक्षित है.
• प्रदेश में अन्य जगहों पर भी क्या इस कीट का प्रकोप देखने को मिला है?
अभी तक तो यह केवल शिवालिक क्षेत्र में मौजूद साल के जंगलों में देखने को मिला है. विभाग इसको लेकर सजग है और जांच जारी है.
• इसके कारण और निवारण को लेकर क्या सरकार कोई शोध कराएगी?
इसके निवारण का प्रयास वैज्ञानिकों की सलाह से किया जा रहा है. वन अनुसंधान संस्थान इसको लेकर शोध करता रहता है. राज्य का कुल वन आवरण लगभग 34,651 वर्ग किमी से 37,999 वर्ग किमी के बीच है, इसमें से साल प्रमुख प्रजातियों में से एक है.

