
सिलिकोसिस. एक ऐसी लाइलाज बीमारी, जिस पर राजस्थान में एक और लाइलाज दिखती बीमारी भारी पड़ गई. सरकारी भ्रष्टाचार. सिलिकोसिस के कारण जिन मरीजों के फेफड़े धीरे-धीरे पत्थर बन रहे हैं, सरकारी कारिंदों ने उनके हिस्से की मदद भी लूट ली.
प्रदेश के 10 जिलों में हजारों असली मरीज आज भी सरकारी सहायता के इंतजार में दम तोड़ रहे हैं, जबकि जिम्मेदारों ने स्वस्थ लोगों को 'बीमार’ साबित कर करोड़ों रुपए हड़प लिए. एक साल में जितने मरीज पूरे राजस्थान में नहीं थे, उससे ज्यादा फर्जी मरीज तो अकेले दौसा जिले में बना दिए गए थे.
दौसा में 1,613 फर्जी प्रमाण पत्र जारी हुए जिनमें से 413 के नाम पर मुआवजा भी निकाल लिया गया. करीब 12.39 करोड़ रुपए का यह घोटाला सिर्फ एक जिले तक सीमित नहीं था. जोधपुर जिले में 531 फर्जी सिलिकोसिस कार्ड बनाकर 54 लाख रुपए उठा लिए गए.
जोधपुर के 10 सिलिकोसिस केंद्रोंं पर जून, 2025 तक 40,000 आवेदन आए थे जिनमें से 2,389 मरीजों को सिलिकोसिस प्रमाण पत्र बांट दिए गए. जब इनकी जांच हुई तो 1,482 मरीजों में ही सिलिकोसिस की पुष्टि हुई और 531 प्रमाण पत्र फर्जी होने के कारण निरस्त कर दिए गए. करौली जिले की नादौती तहसील में 75 और जोधपुर जिले के बिलाड़ा में 67 फर्जी सर्टिफिकेट जारी किए गए जिनके जरिए चार करोड़ रुपए से ज्यादा का घोटाला हुआ.

राजस्थान सरकार की ओर से कराई गई जांच में करौली, भीलवाड़ा, जैसलमेर, पाली, जोधपुर, सीकर, अलवर और जयपुर जिलों में महज 10 माह में 5,318 सिलिकोसिस के फर्जी कार्ड पाए गए. इतनी बड़ी तादाद में सिलिकोसिस मरीज सामने आने के बाद सरकार को शक हुआ तो जांच कमेटी बनाई गई. इस कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर सरकार ने इन जिलों में बनाए गए 2,210 फर्जी कार्ड निरस्त किए. दरअसल, 2019 में सिलिकोसिस नीति अमल में लाए जाने के बाद यह खेल शुरू हुआ और 2024 में घोटाला सामने आने तक जारी रहा.
इस मामले में पूरे प्रदेश में 22 कर्मचारियों की मिलीभगत सामने आई थी जिसमें 13 लोग अकेले दौसा जिले के थे. जांच में यह खुलासा हुआ कि इस घोटाले का तरीका भी उतना ही भयावह था जितनी की यह बीमारी. एक ही एक्स-रे का इस्तेमाल कई लोगों के फर्जी प्रमाण पत्र बनाने में किया गया. जो वास्तव में बीमार थे, उनके एक्स-रे से स्वस्थ लोगों को 'मरीज’ बना दिया गया ताकि इस बीमारी के मुआवजे के तौर पर मिलने वाली 3 लाख की राशि पर हाथ साफ किया जा सके.
श्रीजी खेड़ा में 80 घरों में 80 विधवाएं हैं. इस गांव में पुरुष या तो सिलिकोसिस के शिकार होकर मर चुके हैं या बूढ़े और लाचार हैं और विधवाएं साहूकारों की कर्जदार हैं.
अयोध्या के राम मंदिर और देश-विदेश में बने स्वामीनारायण मंदिरों की पत्थरों की नक्काशी करने वाले कारीगरों वाले राणीधरा फला गांव की हालत भी श्रीजी खेड़ा जैसी ही है. सिरोही जिले के पिंडवाड़ा कस्बे से सटे इस गांव में मातम छाया है. हर महीने गांव में किसी न किसी की मौत होती है. इस गांव में 30 घर हैं और 28 विधवा महिलाएं. इस गांव में 25 से ज्यादा लोगों की मौत सिलिकोसिस से हुई है. यहां 55 साल से ज्यादा उम्र के सिर्फ दो ही बुजुर्ग जीवित हैं जीवा राम और चंपाराम.
श्रीजी खेड़ा की 65 वर्षीय राधा देवी की कहानी इस त्रासदी का एक चेहरा है. 2017 में पति की मौत के बाद उन्हें न कोई मुआवजा मिला, न सहारा. इलाज के लिए लिया गया कर्ज 4 लाख रुपए का कर्ज अब भी बाकी है.
राजस्थान के 19 जिलों में यही हाल है, जहां सैंडस्टोन माइनिंग होती है. सही जांच न होने के कारण मरीजों का इलाज टीबी के नाम पर होता रहा, तब तक बहुत देर हो चुकी थी.

सिरोही जिले के खारी फला गांव के चार सगे भाई कमलेश, सुरेश, कालू और पोसराम को सिलिकोसिस की बीमारी निगल गई. ये चारों भाई पिंडवाड़ा के इंडस्ट्रियल एरिया में 10 साल से पत्थरों की नक्काशी का काम कर रहे थे. डूंगरपुर जिले के सागवाड़ा कस्बे में सिलिकोसिस बीमार से हीरालाल के तीन बेटों की मौत हो गई. नियम इतने पेचीदा हैं कि सिलिकोसिस की जांच लंबित होने के कारण इन्हें समय पर मुआवजा भी नहीं मिल पाया.
भीलवाड़ा के कोदू कोटा गांव के रामलाल और प्रतापपुरा के श्रवण तथा प्रेम सिंह इन्हीं नियमों की मार झेल चुके हैं. कोदू कोटा का रामलाल पत्थर की खदानों में काम करते हुए इस बीमारी की चपेट में आ गया. परिवार का एक मात्र सहारा बेटा भी छिन गया मगर मुआवजे के तौर पर एक फूटी कौड़ी नहीं मिली. प्रताप पुरा गांव के 45 साल के श्रवण 11 साल तक इस बीमारी की चपेट में रहे और आखिरकार जिंदगी की जंग हार गए. खदान में पत्थर तोड़ने वाले श्रवण को मुआवजे के तौर पर एक लाख रुपए मिले मगर उनके इलाज पर छह लाख रुपए से ज्यादा खर्च हो चुके हैं.
दौसा जिले के उदेरवाड़ी गांव में 28 साल के धर्मेंद, 32 साल के राजू सैनी इस बीमारी के कारण जिंदगी की जंग हार गए. दोनों भाई 15 साल से मानपुर में पत्थर गढ़ाई का काम करते थे. धांधोलाई गांव में पांच सगे भाई सिलिकोसिस की चपेट में आ गए जिनमें से दो की मौत हो गई चुकी है और तीन भाई कैलाश, सुरेश तथा राधेश्याम सिलिकोसिस बीमारी से जूझ रहे हैं.
बड़े भाई कैलाश की हालत तो इतनी खराब है कि उन्हें 24 घंटे ऑक्सीजन सपोर्ट पर रहना पड़ता है. सरकार ने कैलाश और राधेश्याम का सिलिकोसिस कार्ड ब्लॉक कर दिया. महंगे इलाज के कारण इनकी पुस्तैनी जमीन बिक गई और बच्चों की पढ़ाई बीच में ही छूट गई. इस गांव में 50 से ज्यादा लोगों की सिलिकोसिस बीमारी के कारण मौत हो चुकी है.
सिलिकोसिस पर काम करने वाले माधव शर्मा कहते हैं, ''प्रदेश के कई हिस्सों में सिलिकोसिस के कारण मृत्यु हो जाने के बाद भी इन्हें मुआवजे के तौर पर कुछ नहीं मिला.’’ सरकार ने 2019 में न्यूमोकोनियोसिस नीति लागू कर राहत का वादा किया था. इस नीति के तहत मरीज में सिलिकोसिस बीमारी की पुष्टि होने पर 3 लाख और मौत पर परिजनों को 2 लाख रुपए की आर्थिक सहायता दी जाती है. मगर हजारों मरीजों को यह मदद अब तक नहीं मिल पाई है.
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ (एनआइएच) की ओर से करौली जिले के सिलिकोसिस मरीजों को लेकर किए गए एक अध्ययन में यह सामने आया कि सिर्फ 60 फीसद मरीजों को ही मुआवजा मिला. जिनको मुआवजा मिला भी, उनमें से अधिकांश ने वह पैसा इलाज पर नहीं, बल्कि जरूरी खर्चों जैसे बेटियों की शादी, घर बनाने या पशु खरीदने में खर्च कर दिया.
सरकारी आंकड़ों के अनुसार 31 मार्च 2026 तक राजस्थान में सिलिकोसिस के पंजीकृत मरीजों की संख्या 1.99 लाख है जिनमें से 6,565 मरीजों की मौत हो चुकी है तथा 11,193 मामलों की जांच अभी लंबित है. 2025-2026 के दौरान प्रदेश में सिलिकोसिस बीमारी के 5,983 मामले सामने आए हैं.
यहां सवाल सिर्फ संख्या या मुआवजे का ही नहीं बल्कि उस व्यवस्था का भी है जो मरते हुए लोगों के हक पर भी डाका डालने से नहीं चूकती.

