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दमदार है इस बार भाजपा का दांव

बूथ स्तरीय समितियां ज्यादा मजबूत हुईं, गुटबाजी घटी और पार्टी संगठन पर भरोसा भी बढ़ा. पर बंगाल में गहरी जड़ें जमाए तृणमूल कांग्रेस को उखाड़ फेंकने के वास्ते क्या इतना ही पर्याप्त होगा भारतीय जनता पार्टी के लिए?

 assembly polls: west bengal
अमित शाह, शुभेंदु अधिकारी और रासबिहारी सीट के उम्मीदवार स्वपन दासगुप्ता 2 अप्रैल को कोलकाता में एक रोड शो के दौरान
अपडेटेड 22 अप्रैल , 2026

अमित शाह दो अप्रैल को जब भवानीपुर में एक रैली को संबोधित कर रहे थे तो उनका अंदाज काफी नपा-तुला नजर आया. वह तेजी और आक्रामकता इस बार नहीं थी, जो 2021 में दिख रही थी जब केंद्रीय गृह मंत्री (294 सदस्यीय विधानसभा में) पार्टी के 200 से ज्यादा सीटें जीतने की भविष्यवाणी कर रहे थे. इस बार नेता विपक्ष और यहां से पार्टी उम्मीदवार शुभेंदु अधिकारी के लिए वोट मांगते हुए शाह ने लक्ष्य को घटाकर 'कम से कम 170 सीटें’ कर दिया.

दावे में सीटों की संख्या भले घटा दी गई हो लेकिन आत्मविश्वास में कतई कमी नहीं आई है. बंगाल में लंबे समय से कमजोर संगठन को लेकर आलोचनाएं झेलती रही भाजपा का मानना है कि उसने बूथ स्तर से खुद को फिर खड़ा कर लिया है. नंदीग्राम से उम्मीदवार अधिकारी का दूसरी सीट भवानीपुर से भी पर्चा भरना—जहां वे मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष ममता बनर्जी को उनके ही गढ़ में चुनौती दे रहे हैं—जाहिर तौर पर पार्टी की इसी आक्रामक सियासी रणनीति का हिस्सा है.

बंगाल में वर्षों तक भाजपा ने घाटे में दिखते हुए शुरुआत की है. यहां लगभग 30 फीसद मतदाता मुसलमान हैं, और यह तबका तृणमूल के पीछे लामबंद रहा है. भाजपा की चुनौतियां यहीं तक सीमित नहीं थीं. हिंदू-बहुल इलाकों में भी पार्टी अक्सर खुद को बूथ-स्तर पर कमजोर स्थिति में पाती थी. 2021 के विधानसभा चुनाव, खासकर चुनाव के बाद की हिंसा ने, इस कमजोरी को खुलकर सामने ला दिया. दूसरे राज्यों से जो नेता आए थे, वे चुनाव के तुरंत बाद चले गए और स्थानीय नेताओं तक पहुंचना आसान न था.

भाजपा के जमीनी स्तर के तमाम कार्यकर्ताओं को लगा कि उन्हें ऐसे ही छोड़ दिया गया है; इसका गहरा मनोवैज्ञानिक असर हुआ. कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटा, नेटवर्क भी खत्म हो गया. लेकिन पार्टी का वोट बैंक पूरी तरह खत्म नहीं हुआ. 2023 के पंचायत चुनाव में हिंसा के व्यापक आरोपों के बावजूद भाजपा ने 9,700 से ज्यादा ग्राम पंचायत सीटें जीतीं (63,000 से ज्यादा कुल सीटों में से 15 फीसद से ज्यादा). इसने संकेत दिया कि मतदाताओं का एक तबका डराने-धमकाने की घटनाओं के बावजूद भाजपा का पुरजोर समर्थन करता है.
 
बंसल का ब्लूप्रिंट
राज्य इकाई में बड़े बदलाव का जिम्मा पार्टी महासचिव सुनील बंसल को सौंपा गया था, जिन्हें अगस्त 2022 में बंगाल के लिए केंद्रीय पर्यवेक्षक बनाया गया. उनसे पहले इस पद पर मध्य प्रदेश के नेता कैलाश विजयवर्गीय थे, जो विवादों में घिरे रहे हैं. तृणमूल छोड़कर पार्टी में शामिल होने वालों को टिकट देने की उनकी रणनीति की पार्टी के भीतर ही खासी आलोचना हुई थी. पार्टी में संगठनात्मक बिखराव और 2021 की हार के लिए भी उन्हें ही जिम्मेदार ठहराया गया था.

बंसल का नजरिया एकदम अलग था. महीनों तक उन्होंने पूरे बंगाल का दौरा किया, तमाम स्तरों पर बैठकें कीं, पार्टी के भीतर गुटों की परस्पर खींचतान को समझा और संगठन की खूबियों-खामियों को चिन्हित किया. हालांकि, इस काम में असली तेजी 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद आई. उसी साल अक्तूबर में शाह ने बंगाल में महत्वाकांक्षी सदस्यता अभियान की शुरुआत की, जिसके तहत 15 जनवरी, 2026 तक एक करोड़ नए सदस्य बनाने का लक्ष्य रखा गया. हालांकि, उनका यह लक्ष्य पूरा नहीं हो पाया. पार्टी सूत्रों के मुताबिक, फिलहाल सदस्यों की संख्या करीब 80 लाख के आसपास है. लेकिन यह पूरी कवायद उनके लिए कार्यकर्ताओं को जोड़ने और उनसे संवाद स्थापित करने की व्यवस्थित संगठनात्मक प्रणाली हासिल करने में कहीं ज्यादा मददगार साबित हुई.

जो भी 100 प्राथमिक सदस्यों को भर्ती कर लेता, उसे सक्रिय सदस्य घोषित कर दिया जाता. आज पार्टी का दावा है कि उसके पास ऐसे 60,000 सक्रिय सदस्य हैं. इस बहुस्तरीय संरचना ने जवाबदेही और स्थानीय जुड़ाव सुनिश्चित किया. अभियान अलग-अलग नेताओं की अगुआई में कई चरणों में चलाया गया. राज्यसभा सांसद और मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने शुरू में इस मुहिम का नेतृत्व किया, फिर पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री सुभाष सरकार और उसके बाद प्रदेश उपाध्यक्ष प्रबाल राहा ने कमान संभाली.

प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना नेतृत्व की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा था. इस पूरे अभियान के दौरान, इसमें शामिल लोगों को हर रात 10 बजे वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए अपने सदस्यों की संख्या के बारे में रिपोर्ट देनी होती थी. बंसल और दूसरे केंद्रीय नेताओं ने इन सत्रों पर बारीकी से नजर रखी. सूत्रों की मानें तो उनका अंदाज 'नापा-तोला’ था. एक बैठक में तो बंसल ने कथित तौर पर यह तक कह दिया था कि अपने गृह राज्य उत्तर प्रदेश में वे काम न करने वालों को बाहर का रास्ता दिखाने के लिए 'कुख्यात’ हैं.

सरकार इसे कूटनीतिक अंदाज में कहते हैं: ''नेतृत्व ने कार्यकर्ताओं के बीच प्रतिस्पर्धा की भावना जगाई जिसके नतीजे भी नजर आए.’’ इसके साथ ही, कभी तृणमूल के कद्दावर नेताओं में शुमार रहे अधिकारी जैसे प्रमुख नेताओं को 'शक्ति केंद्रों’ की जिम्मेदारी सौंपी गई; ये शक्ति केंद्र पंचायत समिति जैसी छोटी-छोटी संगठनात्मक इकाइयां हैं. उन्होंने बड़े पैमाने पर दौरे किए, बैठकें कीं और पार्टी कार्यकर्ताओं में जोश भरा.

गुटबाजी के मोर्चे पर केंद्रीय नेतृत्व ने सीधे तौर पर दखल दिया और नेताओं से दो-टूक कह दिया कि उन्हें आपसी मतभेद भुलाने होंगे. जमीनी स्तर पर यह बदलाव साफ दिख रहा है. पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और संघ के अनुभवी नेता दिलीप घोष, जिनकी पहले अधिकारी से कतई नहीं पटती थी, नंदीग्राम में अधिकारी की नामांकन रैली में मौजूद थे.

बदले में अधिकारी भी घोष की सीट खड़गपुर सदर में आयोजित उनकी रैली में शामिल हुए. सदस्यता अभियान के बाद 1,326 मंडलों में संगठनात्मक चुनाव कराए गए. चुनाव केवल उन्हीं मंडलों में हुए, जहां कम से कम 50 फीसद बूथों पर सक्रिय समितियां थीं. हर बूथ समिति में 12 सदस्य होते हैं, जिनमें एक अध्यक्ष शामिल है. पार्टी का दावा है कि बंगाल के 80,000 बूथों में से करीब 68,000 बूथों पर अब ऐसी समितियां बनाई जा चुकी हैं.

जांच और पुष्टि
पहले बूथ समितियों संबंधी दावों का ऑडिट करना मुश्किल होता था, और अक्सर संख्याएं बढ़ा-चढ़ाकर बताई जाती थीं. इस समस्या को दूर करने के लिए ही पार्टी की आइटी टीम ने अपने अंदरूनी वेब ऐप्लिकेशन 'सरल’ में एक खास फीचर जोड़ा. इसमें पार्टी कार्यकर्ता हर संभावित सदस्य के घर जाते, जहां उनकी एक तस्वीर ली जाती.

यह पक्का करने के लिए कि तस्वीर पहले से मौजूद किसी सोर्स से अपलोड नहीं की गई है, सिस्टम में यह शर्त जोड़ी गई कि व्यक्ति अपनी पलकें झपकाए; इससे तस्वीर रियल टाइम में लेना पुष्ट होता. इसके बाद, उस व्यक्ति के मोबाइल नंबर पर एक वन-टाइम पासवर्ड भेजा जाता. इस कदम से संपर्क विवरणों की प्रामाणिकता की पुष्टि होती थी. कामकाज की निगरानी के लिए रोजाना की रिपोर्टिंग व्यवस्था, सदस्यों के नामांकन की डिजिटल ट्रैकिंग और केंद्रीय स्तर पर निगरानी ने यह पक्का किया कि पूरा संगठन एक तालमेल के साथ काम करे.


अप्रैल 2025 में बंसल ने बूथ मजबूत करने का लक्ष्य निर्धारित किया. नौ माह तक यह कार्यक्रम तीन चरणों में चलाया गया. 'बूथ चलो अभियान’ में लोगों तक पैठ बनाने पर जोर दिया गया; 'बूथ सशक्तीकरण अभियान’ का मकसद संगठन के ढांचे को मजबूत करना था; और 'बूथ विजय अभियान’ संगठन की ताकत को चुनावी जीत में बदलने के लिए तैयार किया गया था. यह कार्यक्रम मुस्लिम-बहुल बूथों तक भी पहुंचा, जो सीधे तौर पर इसका संकेत था कि पार्टी अपने पारंपरिक जनाधार से आगे बढ़कर विस्तार की कोशिश कर रही है. 

अनसुलझे मुद्दे
बहरहाल, आत्मविश्वास के पीछे कई अनसुलझी चुनौतियां भी छिपी हैं. विभिन्न जिलों में कामकाज का स्तर काफी अलग-अलग है. अधिकारी के अपने गढ़ पूरब मेदिनीपुर को अक्सर सांगठनिक कौशल के आदर्श मिसाल के तौर पर पेश किया जाता है. इसके उलट, हावड़ा और हुगली जैसे जिले इस मामले में काफी पीछे हैं. सूत्रों का मानना है कि बूथ समिति के कई सदस्य उतने सक्रिय नहीं, जितनी उनसे उम्मीद की जाती है.

उम्मीदवार चयन ने भी पार्टी के अंदर मतभेदों को उजागर किया है. इस आश्वासन के बावजूद कि पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता दी जाएगी, कई उम्मीदवारों को औपचारिक तौर पर पार्टी में शामिल होने से पहले ही मैदान में उतार दिया गया; जैसे जगद्दल से पूर्व आइपीएस अधिकारी राजेश कुमार. इसको लेकर कई निर्वाचन क्षेत्रों में विरोध प्रदर्शन तक हुए, जिसके बाद पार्टी को कम से कम चार सीटों पर उम्मीदवार बदलने पड़े.

यह विरोधाभास एक गहरी सचाई को भी रेखांकित करता है. भाजपा का सामना तृणमूल जैसे एक जबरदस्त प्रतिद्वंद्वी से है, जिसका सांगठनिक ढांचा बेहद मजबूत है. ऐसे में लड़ाई केवल आंकड़ों की नहीं, बल्कि चुनावी रणनीति सफलता से लागू करने की भी है. पार्टी अब भी 'बाहरी, गैर-बंगाली’ होने के उस ठप्पे से जूझ रही है, जो तृणमूल ने बड़ी चालाकी से उसके साथ जोड़ दिया है.


फिर भी, बंगाल में भाजपा के बदले चेहरे को नजरअंदाज करना मुश्किल है. अधिकारी की रैली में शाह के ये शब्द—कि ''अगर हम भवानीपुर जीत गए, तो हम पूरा बंगाल जीत जाएंगे’’—इसी बदलाव को दर्शाते हैं; वैसे तो यह एक सीधा-सपाट बयान ही नजर आता है लेकिन इसकी जड़ें पार्टी के सांगठनिक भरोसे में गहराई से जमी हैं. 4 मई को यह साफ हो जाएगा कि पार्टी का यह भरोसा मतदाताओं की कसौटी पर खरा उतर पाया या नहीं.ठ्ठ

सूत्रों के मुताबिक, बंसल का अंदाज एकदम नापा-तोला था. एक बैठक में उन्होंने यह तक कहा बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में वे काम न करने वालों को बाहर का रास्ता दिखाने के लिए 'कुख्यात’ हैं. संदेश साफ था.

नामांकन अभियान के दौरान कार्यकर्ताओं को हर रात अपने आंकड़े केंद्रीय नेताओं के साथ होने वाली बैठकों में प्रस्तुत करने होते थे, इससे प्रतिस्पर्धा बढ़ी. 

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