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पिछड़े वोटर ही करेंगे बेड़ा पार

उत्तर प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग के वोटबैंक साधने की कवायद में जुटी भाजपा के सामने सवर्ण असंतोष, पीडीए नैरेटिव और बदलते जातीय समीकरणों की कठिन चुनौती

राष्ट्रीय पिछड़ा आयोग की अध्यक्ष साध्वी निरंजन ज्योति
अपडेटेड 7 अप्रैल , 2026

उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2024 के लोकसभा चुनाव एक टर्निंग पॉइंट की तरह सामने आए थे. लंबे समय तक सोशल इंजीनियरिंग के सहारे सत्ता का रास्ता तय करने वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को पहली बार साफ तौर पर एहसास हुआ कि उसका सबसे भरोसेमंद आधार—गैर-यादव ओबीसी—अब पूरी तरह उसके साथ नहीं रहा.

समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस के 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) नैरेटिव ने जिस तरह इस वर्ग में पैठ बनाई, उसने भाजपा का चुनावी गणित बिगाड़ दिया. यही वजह है कि अब 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा एक बार फिर उसी सामाजिक आधार को मजबूत करने में जुट गई है. लेकिन इस बार इसके लिए रणनीति ज्यादा व्यापक, बहुस्तरीय और कहीं अधिक सावधानी से तैयार की जा रही है.

इस नई रणनीति की ताजातरीन और प्रतीकात्मक मिसाल है 18 मार्च को साध्वी निरंजन ज्योति को राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (एनसीबीसी) के अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया जाना. निषाद समुदाय से आने वाली ज्योति को इस संवैधानिक संस्था के शीर्ष पर बैठाकर भाजपा ने एक साथ कई तरह के राजनैतिक संदेश देने की कोशिश की है—सामाजिक प्रतिनिधित्व, वैचारिक प्रतिबद्धता और इन सबके अलावा संगठनात्मक संतुलन.

चौबीस का झटका और बदली रणनीति
2024 के आम चुनाव के नतीजों ने भाजपा को समझा दिया कि सिर्फ हिंदुत्व और विकास का ही एजेंडा पर्याप्त नहीं. सामाजिक न्याय और राजनैतिक हिस्सेदारी जैसे मुद्दे पहले से ज्यादा निर्णायक हो चुके हैं. 'पीडीए' नैरेटिव ने खासकर गैर-यादव ओबीसी और अति पिछड़े वर्गों के बीच यह धारणा बनाने में सफलता पाई कि उनकी राजनैतिक भागीदारी सीमित है.

राजनैतिक विश्लेषक मानते हैं कि यही वह बिंदु था जहां भाजपा की रणनीति में बदलाव की शुरुआत हुई. लोकसभा चुनाव के बाद पार्टी ने अपनी आंतरिक समीक्षा में पाया कि पूर्वांचल, अवध और कुछ हद तक बुंदेलखंड में गैर-यादव ओबीसी वोटों का आंशिक झुकाव विपक्ष की ओर हुआ.

मौर्य, कुशवाहा, निषाद, कश्यप, सैनी, पाल, राजभर जैसे समुदायों में पहले जैसी एकजुटता नहीं रही. इसके संकेत 2022 के विधानसभा चुनाव में भी दिखाई दिए थे. तब भाजपा ने 255 विधानसभा सीटें जीतकर सरकार बनाई थी लेकिन पार्टी के ओबीसी विधायकों की संख्या में काफी गिरावट दिखी थी.

अप्रैल 2022 में भाजपा शीर्ष नेतृत्व को यूपी से भेजी गई विधानसभा चुनाव की रिपोर्ट में यह बात सामने आई थी कि सहयोगी दल निषाद पार्टी और अपना दल (एस) से गठबंधन का लाभ पार्टी को नहीं मिला था. रिपोर्ट के मुताबिक, यूपी की फरेंदा, सिराथू समेत करीब दर्जन भर से ज्यादा ऐसी विधानसभा सीटें थीं जहां कुर्मी वोट भाजपा को नहीं मिले जबकि कुर्मी वोट बैंक की राजनीति करने वाला अपना दल (एस) भाजपा के साथ था.

इस दल ने 17 सीटों पर चुनाव लड़ा था और उनमें से 12 सीटों पर जीत दर्ज की. उसके प्रत्याशी इनमें दो सीटों पर 2,000 से कम और एक सीट पर 5,000 से कम अंतर से जीते. चार सीटें वह 5,000 से ज्यादा और एक सीट उससे भी कम वोटों के अंतर से हारा. वहीं, पूर्वांचल की कुछ सीटों पर निषाद समाज का वोट भी पूरी तरह भाजपा को नहीं मिला.

निषाद पार्टी ने नौ सीटों पर चुनाव लड़ा था, जिसमें से छह सीटें जीतीं. शाहगंज से निषाद पार्टी के रमेश सिंह सिर्फ 719 वोटों से जीते. रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया था कि सातवें चरण में आजमगढ़, मऊ, गाजीपुर में सपा ने भाजपा को इसलिए टक्कर दी क्योंकि इन जिलों में भाजपा को राजभर और दूसरे समाजों का वोट नहीं मिला. इन जिलों में मुसलमानों और यादवों के बाद निषाद और कुर्मी मतदाता भी बड़ी संख्या में हैं.

पिछड़ा के साथ हिंदुत्व की रणनीति
भाजपा का पारंपरिक फॉर्मूला 'सॉफ्ट हिंदुत्व' और सामाजिक प्रतिनिधित्व का संयोजन रहा है. साध्वी निरंजन ज्योति इस रणनीति का आदर्श चेहरा हैं. निषाद समुदाय से आने वाली साध्वी ने महाराष्ट्र की चंद्रपुर लोकसभा सीट से चार बार सांसद रहे हंसराज गंगाराम अहीर की जगह ली है. राजनैतिक विश्लेषकों का कहना है कि भाजपा गैर-यादव ओबीसी वोट बैंक को मजबूत करना चाहती है; यह वह वर्ग है जिसे समाजवादी पार्टी जैसी यादव-बहुल पार्टियों में अपनी पर्याप्त नुमाइंदगी न होने का एहसास होता रहा है.

भाजपा के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार, एनसीबीसी में नियुक्ति के जरिए पार्टी का मकसद साध्वी निरंजन ज्योति को एक बार फिर से सक्रिय करना है. वे एक वरिष्ठ नेता हैं जो मोदी मंत्रिमंडल में मंत्री के तौर पर भी काम कर चुकी हैं, लेकिन चुनावी राजनीति में चमक फीकी पड़ने के बाद से वे खुद को कुछ हद तक हाशिए पर महसूस कर रही थीं.

2024 के लोकसभा चुनाव में वे अपनी फतेहपुर लोकसभा सीट सपा के नरेश उत्तम पटेल (जो एक कुर्मी हैं) से 30,000 वोटों से हार गई थीं. विश्लेषकों के अनुसार, पिछड़ी जातियों के हितों की रक्षा करने वाले एक संवैधानिक निकाय के तौर पर राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग का अपना प्रतीकात्मक महत्व है लेकिन इसके शीर्ष पर एक राजनैतिक रूप से जुड़ी हस्ती को बिठाकर भाजपा पिछड़े वर्गों के प्रति अपनी संस्थागत जवाबदेही का संदेश देना चाहती है.

इस तरह राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़ी पृष्ठभूमि, संत परंपरा से संबंध और अति पिछड़े निषाद समाज से आने का सामाजिक आधार—इन सबका मेल भाजपा के उस मॉडल को मजबूत करता है जिसमें पहचान और विचारधारा दोनों साथ-साथ चलते हैं.

विपक्ष की रणनीति बनी चिंता
प्रदेश में ओबीसी राजनीति को समझना हो तो यह मानना होगा कि यह एकसमान वर्ग नहीं है. यादवों के अलावा दर्जनों जातियां हैं जिनकी अलग-अलग सामाजिक पहचान और राजनैतिक अपेक्षाएं हैं. भाजपा ने 2014 के बाद इन्हीं गैर-यादव ओबीसी समूहों को जोड़कर मजबूत वोटबैंक तैयार किया था. लेकिन 2024 में यही समीकरण कमजोर पड़ गया.

'पीडीए' ने इन समुदायों के भीतर यह संदेश दिया कि भाजपा में उनकी हिस्सेदारी सीमित है, जबकि सपा उन्हें ज्यादा प्रतिनिधित्व देने को तैयार है. यही वजह है कि अब भाजपा की रणनीति का केंद्र फिर वही गैर-यादव ओबीसी बन गए हैं. रणनीति का अहम स्तंभ हैं पंकज चौधरी, जिन्हें भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया.

कुर्मी समुदाय से आने वाले चौधरी का चयन एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है. यह समुदाय राज्य की ओबीसी आबादी का करीब 7 फीसद माना जाता है और पूर्वी तथा मध्य यूपी में इसका खासा प्रभाव है. 2024 के चुनाव में इस समुदाय के एक हिस्से का झुकाव सपा-कांग्रेस गठबंधन की ओर देखने को मिला, जिसका खामियाजा भाजपा को हुआ.

ऐसे में सात बार के सांसद और केंद्र सरकार में वित्त राज्यमंत्री पंकज चौधरी की नियुक्ति के जरिए भाजपा ने इस वर्ग को फिर साधने की कोशिश की है. लखनऊ के एक कॉलेज में राजनीति विज्ञान के वरिष्ठ शिक्षक आशुतोष गौतम कहते हैं, ''कुर्मी समुदाय कभी भी पूरी तरह किसी एक पार्टी के साथ नहीं रहा. पंकज चौधरी का प्रदेश अध्यक्ष बनना एक अवसर जरूर है, लेकिन सिर्फ जातीय पहचान के भरोसे वोटों का ध्रुवीकरण नहीं हो सकता. इसके लिए संगठनात्मक मजबूती और ठोस चुनावी संदेश जरूरी होगा.''

केशव प्रसाद मौर्य की बढ़ी अहमियत
भाजपा की ओबीसी रणनीति में सबसे अहम चेहरा हैं केशव प्रसाद मौर्य. वे लंबे समय से पार्टी के सबसे बड़े ओबीसी नेताओं में गिने जाते हैं और मौर्य-कुशवाहा समुदाय में उनकी मजबूत पकड़ है. हाल के महीनों में लगातार राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की जिम्मेदारियां देकर उनकी राजनैतिक प्रोफाइल को पहले के मुकाबले काफी मजबूत किया गया है. फरवरी महीने में जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ निवेश के लिए जापान और सिंगापुर के दौरे पर थे, ठीक उसी वक्त उपमुख्यमंत्री मौर्य जर्मनी में प्रदेश सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे थे.

पिछले वर्ष नवंबर के महीने में भाजपा के संसदीय बोर्ड ने मौर्य को बिहार में पार्टी विधायक दल के नेता के चुनाव के लिए पर्यवेक्षक के रूप में नियुक्त करके भेजा था. इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेष ले करके सुदूर रूस भेजकर पिछड़ी जाति के नेता के रूप में उनकी अहमियत को और भी स्पष्ट कर दिया था.

जातीय जनगणना के मुद्दे पर उनका समर्थन भी ओबीसी वर्ग के बीच उनकी स्वीकार्यता को बढ़ाता है. मौर्य का 'संगठन सरकार से बड़ा है' वाला संदेश भी पार्टी के भीतर खास रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है. इससे वे संगठन के कार्यकर्ताओं और सहयोगी दलों के नेताओं के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ा रहे हैं जो, जाहिर है, चुनाव अभियान में महत्वपूर्ण साबित होगी.

'सामाजिक टोलियां' और रणनीति
भाजपा की नई रणनीति का अहम हिस्सा 'सामाजिक टोलियां' हैं. ये छोटे-छोटे समूह गांवों और कस्बों में जाकर अलग-अलग जातियों के बीच संवाद स्थापित करेंगे. इनका उद्देश्य यह बताना है कि भाजपा सरकार की योजनाओं का सबसे ज्यादा लाभ ओबीसी वर्ग को मिला है.

इसके साथ ही, कश्यप जयंती, निषाद सम्मेलन, लोध समाज के कार्यक्रम जैसे जातीय आयोजनों के जरिए भी पार्टी अपने सामाजिक आधार को मजबूत करने में जुटी है. 5 मार्च को भाजपा के ओबीसी मोर्चे के प्रदेश अध्यक्ष और योगी सरकार में मंत्री नरेंद्र कश्यप ने गाजियाबाद में कश्यप-निषाद अधिवेशन कर पार्टी की रणनीति को जमीन पर उतारने की भरसक कोशिश की थी. 

अप्रैल के महीने में पिछड़ी जातियों के कई सम्मेलन आयोजित करने की योजना भी तैयार है. इसके अलावा 17 मार्च को नगर निकायों में पार्षदों के मनोनयन के जरिए भाजपा ने ओबीसी वर्ग को 40 फीसद से ज्यादा हिस्सेदारी देकर यह संकेत दिया है कि वह स्थानीय स्तर पर भी सामाजिक संतुलन साधना चाहती है.

लखनऊ के प्रतिष्ठित अवध कॉलेज की प्राचार्य बीना राय के शब्दों में, ''2027 के विधानसभा चुनाव में स्थानीय नेतृत्व की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होगी. ऐसे में पंचायत, नगर निकाय और जिला स्तर पर ओबीसी नेताओं को आगे बढ़ाना भाजपा की दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है.''

चौतरफा कठिन चुनौतियां
ओबीसी को साधने की इस रणनीति के साथ भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती सवर्ण वोटबैंक की नाराजगी है. पार्टी लंबे समय से ब्राह्मण-ठाकुर वर्चस्व के आरोपों से घिरी रही है, लेकिन हाल के फैसलों ने सवर्ण वर्ग के भीतर असंतोष को बढ़ाया है. यूजीसी के नए नियमों और ओबीसी केंद्रित नीतियों को लेकर कई नेताओं ने खुलकर नाराजगी जताई है. उनका मानना है कि इससे उनकी राजनैतिक हिस्सेदारी प्रभावित हो रही है.

एक वरिष्ठ राजनैतिक विश्लेषक कहते हैं, ''भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह ओबीसी को साधते हुए सवर्ण वोटबैंक को कैसे संतुष्ट रखे. अगर यह संतुलन बिगड़ा, तो चुनावी समीकरण गड़बड़ा सकता है.'' इसके साथ ही समाजवादी पार्टी का 'पीडीए' नैरेटिव भाजपा के लिए सिर्फ चुनावी नहीं, बल्कि वैचारिक चुनौती भी है. अगर भाजपा से नाराज ओबीसी जातियों का सपा की ओर झुकाव 2024 के लोकसभा चुनाव की तुलना में और बढ़ा तो भगवा दल के लिए गंभीर राजनैतिक संकट पैदा होगा.

इस तरह भाजपा के लिए 2027 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन की परीक्षा भी है. गैर-यादव ओबीसी को फिर से अपने साथ जोड़ना उसकी चुनावी रणनीति का केंद्र है. इसमें सफल हुए बिना 2027 की जंग नहीं जीती जा सकती.

2024 के आम चुनाव ने भाजपा को समझा दिया कि हिंदुत्व और विकास का ही एजेंडा पर्याप्त नहीं. सामाजिक न्याय सरीखे मुद्दे ज्यादा निर्णायक हो चुके हैं.

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