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अंग्रेजी में तालीम पर पढ़ाएगा कौन

शिक्षकों के विरोध और अफसरशाही की ठंडी प्रतिक्रिया के बावजूद हिमाचल सरकार शिक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव लाने को तैयार. इसका लक्ष्य बच्चों को अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा के जरिए बेहतर रोजगार पाने लायक बनाना. पर बदलाव अपनाने में शिक्षकों के हाथ-पैर फूले हुए हैं

सीएम सुक्खू ने प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को रोजगारपरक और आधुनिक बनाने का बीड़ा उठाया
अपडेटेड 7 अप्रैल , 2026

- रचना गुप्ता

अपनी 20 बरस की नौकरी में भगत राम ने हिमाचल प्रदेश के स्कूलों में बच्चों को त्रिज्या, चर्तुभुज जैसे शब्दों में ही गणित पढ़ाया. लेकिन अब सरकार ने अपनी स्कूली शिक्षा में द्विभाषी यानी अंग्रेजी में भी पढ़ाने के नियम बना दिए हैं इसलिए उन्हें पहले खुद एक एग्जाम प्रक्रिया से गुजरना होगा ताकि यह पता लगे कि क्या वे वाकई 'ट्रायऐंगल', 'क्वाड्रिलेटरल' जैसे शब्दों में बच्चों को स्तरीय शिक्षा दे पाएंगे?

जो शिक्षक परीक्षा में अव्वल रहेंगे, उन्हें प्राइम जगहों और बेहतरीन स्कूलों में पोस्टिंग मिलेगी. इसके विपरीत, नामी स्कूलों के जो शिक्षक खुद को साबित नहीं कर पाएंगे, उनकी रुखसती होगी. राजनैतिक या प्रभावशाली संपर्कों से मनमानी पोस्टिंग पाए शिक्षकों के लिए यह अच्छी खबर नहीं है क्योंकि अब सिफारिश की जगह काबिलियत वाले शिक्षक ही हिमाचल के स्कूलों में पढ़ा पाएंगे.

इस बड़े बदलाव के अलावा, स्कूलों को शिक्षा बोर्ड के साथ, सीबीएसई के मानदंडों पर खरा उतरना होगा. यह नई व्यवस्था हिमाचल प्रदेश में स्कूली शिक्षा को गुणवत्तापूर्ण बनाने के लिए है. लेकिन शिक्षकों को इस पर ऐतराज है क्योंकि वे अपने घर के पास मिली आरामदायक पोस्टिंग छोड़ना नहीं चाहते. संभवत: इसीलिए, या परीक्षा में असफल रहने के डर से राज्य के करीब 60,000 शिक्षकों में से मात्र 9,800 ने ही 21 मार्च को परीक्षा दी.

इस व्यवस्था परिवर्तन के पीछे का तर्क यह दिया गया कि वर्तमान पढ़ाई प्रतिस्पर्धा के हिसाब से छात्रों को तैयार नहीं कर पा रही थी. बच्चे अंग्रेजी और गणित में कमजोर हो रहे थे. नई व्यवस्था का लक्ष्य शिक्षा को गुणवत्ता के साथ रोजगार से जोड़ना है.

शिक्षा विभाग का तर्क है कि राज्य के गठन के 55 वर्षों बाद शिक्षा व्यवस्था में ये व्यावहारिक परिवर्तन उस समय किए गए हैं, जब शिक्षा प्रणाली और नौकरियों का स्वरूप भी बदल चुका है. लगभग तीन वर्षों की लंबी कसरत और गहन चिंतन-मंथन के बाद मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व में यह हुआ.

दरअसल, लंबे समय से प्रदेश के कुछ स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या नगण्य थी जबकि शिक्षकों की संख्या ज्यादा. कई जगह नए दाखिले ही नहीं हो रहे थे. ऐसे में अभिभावकों ने निजी स्कूलों का रुख करना शुरू कर दिया और सरकारी स्कूलों में छात्र संख्या लगातार घटती गई. कई स्थानों पर लड़कों और लड़कियों के अलग-अलग स्कूल होने के कारण सह-शिक्षा का अभाव रहा, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित हुई. विषय-विशेष के शिक्षकों का न होना भी एक बड़ा मसला रहा. 

मुख्यमंत्री सुक्खू ने विशेष टीम से इस विषय पर विस्तृत अध्ययन करवाया. सूत्रों के अनुसार, प्रारंभिक दौर में अफसरशाही इस बदलाव के पक्ष में नहीं थी, लेकिन मुख्यमंत्री ने पहाड़ी क्षेत्रों की वास्तविक चुनौतियों को समझते हुए स्कूलों में ही प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की व्यवस्था शुरू करने का निर्णय लिया. पिछले तीन वर्षों में करीब डेढ़ हजार स्कूल या तो मर्ज या बंद किए गए और उनकी जगह ऐसे स्कूल विकसित किए गए, जहां गुणवत्ता पर विशेष जोर दिया गया.

इसी प्रक्रिया में 21 कॉलेजों का भी विलय किया गया. जिन विद्यार्थियों को स्कूल तक पहुंचने के लिए दो किलोमीटर से ज्यादा दूरी तय करनी पड़ती है, उनके लिए सरकार ने बस टिकट की व्यवस्था की. प्रदेश के कई स्कूलों को सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकंडरी एजुकेशन से जोड़ा गया है. कुछ चिन्हित स्कूलों में अंग्रेजी माध्यम और डिजिटल शिक्षा की शुरुआत की गई है.

शिक्षा निदेशालय से मिली जानकारी के अनुसार, फिलहाल प्रदेश में 1,970 सरकारी वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय हैं, जिनमें लगभग 60,000 शिक्षक पढ़ा रहे हैं. इनमें प्राथमिक, मिडिल और हाइ स्कूल स्तर के शिक्षक शामिल हैं. अब सरकार इन 60,000 शिक्षकों में से लगभग 10 फीसद यानी करीब 6,146 शिक्षकों की मेरिट सूची तैयार कर रही है. ये शिक्षक उन 145 स्कूलों में पढ़ाएंगे जिन्हें हिमाचल प्रदेश स्कूल बोर्ड से बदलकर सीबीएसई से एफिलिएट किया गया है. इनमें से कई स्कूल जनजातीय क्षेत्रों में भी होंगे.

बदलाव से पहले सरकार ने शिक्षा विभाग के दो निदेशालय—प्राथमिक और उच्च शिक्षा—को मर्ज किया. तीन वर्षों में लगभग 1,250 स्कूलों को मर्ज किया गया. इनमें से करीब 450 ऐसे स्कूल थे जहां शिक्षक तो थे, लेकिन कोई विद्यार्थी नहीं था. कई जगह छात्र संख्या बेहद कम थी. इसी तरह वर्ष 2022 के बाद खोले गए 17 डिग्री कॉलेजों को भी छात्र संख्या कम होने के कारण बंद करना पड़ा, साथ ही दो संस्कृत कॉलेज भी बंद किए गए. मर्जर के पीछे का मुख्य कारण यह पाया गया कि विद्यार्थी निजी और सीबीएसई पाठ्यक्रम वाले स्कूलों की ओर जा रहे थे.

अब सवाल था कि क्या मौजूदा टीचर इस नई व्यवस्था में पढ़ाने योग्य हैं? शिक्षा निदेशक आशीष कोहली के अनुसार, ''योग्यता पक्की करने के लिए ही सीटीईटी की तर्ज पर प्रदेश बोर्ड ऑफ स्कूल एजुकेशन ने शिक्षकों की परीक्षा ली. हालांकि, 60 हजार शिक्षकों में से लगभग 12 हजार ने ही पंजीकरण किया. इनमें से भी मात्र 80 फीसद ने ही परीक्षा दी. जो शिक्षक यह परीक्षा पास नहीं कर पाएंगे, उनकी पोस्टिंग इन 145 सीबीएसई स्कूलों में नहीं होगी.'' सरकार का कहना है कि नए कैडर में शामिल होने से शिक्षकों की वरिष्ठता प्रभावित नहीं होगी.

आवश्यकता पड़ने पर नई भर्तियां भी की जाएंगी. कोहली के अनुसार, अब हिमाचल में प्राथमिक स्तर से ही कई विषय अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाए जाएंगे. पहले जहां केवल 17 व्यावसायिक विषय थे, वहीं अब विदेशी भाषाओं सहित 42 वोकेशनल विषय पढ़ाए जाएंगे. इससे विद्यार्थियों को अपने भविष्य के लिए अधिक विकल्प मिलेंगे.

पूरी प्रक्रिया में सबसे बड़ी चुनौती शिक्षकों की रही है. पिछले 20 वर्षों में पैरा टीचरों की भर्ती बिना किसी लिखित परीक्षा के की गई थी. अब सरकार ने इनके लिए भी परीक्षा की व्यवस्था कर दी है. यही कारण है कि कई शिक्षक नई व्यवस्था का विरोध कर रहे हैं. हिमाचल स्कूल प्रवक्ता संघ राज्य अध्यक्ष अजय नेगी का कहना है कि नई परीक्षा और उससे जुड़े मानदंड लागू करना गंभीर चिंता का विषय है.

उन्होंने कहा कि मेरिट निर्धारण, वरिष्ठता की सुरक्षा, वेतन, सेवा की निरंतरता, पदोन्नति और स्थानांतरण जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर अब तक कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं हैं, जिससे शिक्षकों में असमंजस और असुरक्षा का माहौल बन रहा है. उनका कहना है कि मौजूदा पारदर्शी स्थानांतरण नीति को यथावत रखा जाए और किसी भी शिक्षा सुधार में शिक्षकों के अनुभव, सम्मान और समानता का विशेष ध्यान रखा जाए.

उनके मुताबिक, ''कई शिक्षक न केवल लोक सेवा आयोग की परीक्षा पास कर चुके हैं, बल्कि कई ने विभागीय परीक्षाएं भी उत्तीर्ण की हैं और दोबारा टेस्ट लेना उनकी पेशेवर विश्वसनीयता पर सवाल है. विवाद अब न्यायालय तक पहुंच चुका है और मामले की सुनवाई हिमाचल प्रदेश हाइकोर्ट में जारी है, जहां शिक्षकों ने सरकार की नीति को चुनौती दी है.''

संघ की मांग है कि इस प्रक्रिया के नाम पर प्राइमरी शिक्षकों से लेकर प्रवक्ताओं तथा प्रिंसिपल कैडर तक की दोबारा परीक्षा लेना पूरी तरह अनुचित और अव्यावहारिक है. अगर सरकार को सीबीएसई पाठ्यक्रम के अनुरूप विशेष शैक्षणिक दक्षता की आवश्यकता है, तो इसके लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था की जानी चाहिए. उनके मुताबिक, अनुभवी प्रवक्ता प्रशिक्षण के माध्यम से नई प्रणाली को प्रभावी ढंग से लागू करने में सक्षम हैं.

बहरहाल, हिमाचल स्कूल प्रवक्ता संघ के सुझाव और मामले की अदालत में सुनवाई के बीच राज्य सरकार ने शिक्षा में सुधार की अपनी योजना लागू कर दी है. 

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